Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

डॉ. रहीस सिंह का लेख : चीन व पाक की दोस्ती के मायने

कुछ समय पहले जारी की गयी अमेरिकी थिंक टैक की एक रिपोर्ट पर भरोसा करें तो पाकिस्तान प्रथम 10 खतरनाक देशों में से एक है। चीन फिर पाकिस्तान को ऑल व्हेदर फ्रेंड मानता है और दुनिया टुकुर-टुकुर देख रही है, बोलने का शायद अब उसमें साहस नहीं बचा। जब भी कभी पाकिस्तान पोषित आतंकवाद आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में कोई प्रस्ताव लाया जाता है या उस दिशा में पहल की जाती है, चीन उसका विरोध करता है। इस तरह से वह पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठनों को संरक्षण और प्रोत्साहन देने का काम करता है। भारत के शिकंजा कसने के समय चीन हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा रहता है।

डॉ. रहीस सिंह का लेख : चीन व पाक की दोस्ती के मायने
X

डाॅ. रहीस सिंह।  

डॉ. रहीस सिंह

70 वर्ष पूरी कर रही चीन-पाक दोस्ती पर पिछले दिनों चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि, 'यह एक अच्छे इतिहास की प्राप्ति जैसी है, क्योंकि उन दोनों ने चौतरफा सहयोग किया।'क्या यह हास्यास्पद बात नहीं लगती? पाकिस्तान और सहयोग? इसके उदाहरण दिखे क्यों नहीं? फिर इन दोनों को संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला? अजब-गजब सी बात है।एक साम्राज्यवाद को विस्तार दे रहा है और दूसरे ने चरमपंथ को संरक्षण देने और आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के अतिरिक्त और कुछ जाना ही नहीं। चीन को कम से कम कुछ देशों के नाम भी लेने चाहिए थे जिनका सहयोग वह पाकिस्तान के साथ मिलकर कर रहा है। क्या वास्तव में एक ऐसे देश से जो निरंतर दक्षिण एशिया और पूर्वी एशिया में छद्म सहयोग (डेट डिप्लोमेसी) के फंदे में फंसाकर सैन्य प्रभुत्व कायम करने के निरंतर प्रयासों और एशिया में आतंकवाद का प्रसार और पोषण करने वाले देश की दोस्ती जिसका आधार भारत को दुश्मन नंबर एक मानने पर टिका हो, क्या वास्तव में तीसरे देशों के सहयोग के लिए साझेदारी कर सकते हैं?

पिछले काफी समय से इन चीन-पाकिस्तान देशों की दोस्ती के लिए 'ऑल वेदर फ्रेंड्स' और 'आयरन ब्रदर्स' जैसे विशेषण प्रयुक्त किए जा रहे हैं। क्या यह सच है? क्या ऐसा नहीं लगता कि यह स्वाभाविक दोस्ती नहीं है बल्कि 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त' के आधार पर दो आस्वाभाविक मनोदशाओं के सहारे चल रही है ? वैसे चीन स्वयं यह स्वीकार कर रहा है कि दोनों देशों के बीचदोस्ती विन-विन के मूलभूत सिद्धांत पर कार्य कर रही है। यह स्वाभाविक साझेदारी के बजाय अवसरपरस्त दोस्ती की विशेषता अधिक लगती है और इस 'आॅल वेदर फ्रेंडशिप' इर्द-गिर्द इसी अवसरपरस्ती का आवरण है। इसलिए जब तक दोनों के अपने-अपने स्वार्थ थमते रहेंगे तब तक दोस्ती आगे सरकती रहेगी अन्यथा यह भी संभव है कि पाकिस्तान किसी अन्य देश की गोद में बैठ आए या चीन अन्यत्र अधिक लाभ देखकर किसी और की पीठ पर हाथ रख दे? हो तो कुछ भी सकता है। वैसे यह बहुत हद तक भारत की शक्ति और सामरिक गतिविधि पर निर्भर करेगा।

कुछ समय पहले जारी की गयी अमेरिकी थिंक टैक की एक रिपोर्ट पर भरोसा करें तो पाकिस्तान प्रथम 10 खतरनाक देशों में से एक है। चीन फिर पाकिस्तान को आॅल व्हेदर फ्रेंड मानता है और दुनिया टुकुर-टुकुर देख रही है, बोलने का शायद अब उसमें साहस नहीं बचा। जब भी कभी पाकिस्तान पोषित आतंकवाद या आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में कोई प्रस्ताव लाया जाता है या उस दिशा में पहल की जाती है, चीन उसका विरोध करता है। इस तरह से वह पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठनों को संरक्षण और प्रोत्साहन देने का काम करता है। यह जगजाहिर है कि चीन परमाणु बम बनाने से लेकर प्रक्षेपास्त्र और अन्य सैन्य तैयारियों हेतु पाकिस्तान को मदद करता है, ताकि पाकिस्तान भारत के खिलाफ सक्रिय रह सके। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि चीनी-पाक मैत्री कितनी पाक है? इसका तात्पर्य यह नहीं है कि चीन पाकिस्तान के हितों के लिए चिंतित होकर इस तरह का सहयोग कर रहा है। बल्कि इसके पीछे उसके दो उद्देश्य हैं-प्रथम पाकिस्तान के जरिए भारत की पश्चिमी सीमा पर प्रेशर प्वाइंट्स को सक्रिय रखना और भारत के शांतिपूर्ण विकास में निरंतर बाधा डालना। द्वितीय-अब चीन एक परम्परागत हथियारों का एक उभरता विक्रेता बन रहा है। यानि उसकी डिफेंस बाजार पाकिस्तान और इस जैसे अन्य पिछड़े देशों की मांग पर निर्भर करेगा। यह तभी संभव है जब चीन या तो वहां पैठ बनाए अथवा उनमें भय पैदा करे।

इसका सार यह है कि चीन में अब अमेरिका की तरह मिलिट्री इण्डस्ट्रियल काॅम्प्लेक्स निर्मित हो रहा है जो अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता के जरिए एशिया, मध्यपूर्व और अफ्रीकी देशों तक अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है। इस उद्देश्य से चीन दोहरे चरित्र का प्रयोग करता है। वह एशिया और अफ्रीका में 'की क्राइसिस मैनेजर' के रूप में स्वयं को पेश करता है लेकिन वास्तव में वह क्राइसिस मैनेजर नहीं बल्कि 'थ्रेट मैनेजर' की भूमिका निभा रहा होता है। हालांकि दुनिया धीरे-धीरे उसके इस दूसरे चेहरे को पहचानने लगी है, उंगली भी उठ रही है लेकिन वर्तमान समय में कोई वैश्विक ताकत या मंच उपलब्ध नहीं है जो उस पर नियंत्रण स्थापित कर सके या इस तरफ निर्णायक कदम उठा सके। चीन-पाकिस्तान मित्रता के प्रचार हेतु विज्ञापन बैनर पर सबसे बड़ा प्रोजेक्ट सीपेक यानि चाइना पाकिस्तान इकोनाॅमिक काॅरिडोर है जो कि बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का हिस्सा है। सीपेक के जरिए चीन पाकिस्तान में अपने सामरिक और आर्थिक हित पुख्ता करना चाह रहा है। ध्यान रहे कि सीपेक काश्गर से ग्वादर तक जाने वाले एक इकोनाॅमिक काॅरिडोर है। कहने के लिए तो यह आर्थिक महत्व का है लेकिन इसका पाक-अधिकृत कश्मीर से होकर जाना और इसका सुरक्षा में चीनी रेड आर्मी की तैनाती सीपेक के सामरिक महत्व को स्पष्ट करती है।

दरअसल चीन ग्वादर से शुरू होकर सिंहनाक्विलै तक जाने वाली 'स्ट्रिंग'के जरिए एक तरफ हिन्द महासागर में भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है और दूसरी तरफ शिंजियांग से मध्य पूर्व तक व्यापार काॅरिडोर के जरिए हिमालय की तरफ से घेरने की रणनीति बना रहा है। ग्वादर को एक तरफ सड़क मार्ग से कराची व पंजाब होते हुए पेशावर से जोड़ा गया है और दूसरी तरफ कराकोरम राजमार्ग से। ये दोनों ही मार्ग भारत-पाकिस्तान की सामरिक स्थिति में नया असंतुलन उत्पन्न कर सकते हैं। चूंकि यह बंदरगाह होरमुज की खाड़ी से 240 किलोमीटर दूर है इसलिए यह चीन के लिए भू-सामरिक दृष्टिकोण से बड़े महत्व का सिद्ध होगा अर्थात चीन इस बंदरगाह के जरिए मध्य-एशिया और इसके आस-पास के समुद्री क्षेत्र में सैन्य संतुलन अनुकूल बनाने में सफल हो रहा है। फिलहाल चीन-पाकिस्तान बाॅण्डिंग का मुख्य उद्देश्य भारत को घेरना अथवा उसे नीचा दिखाना है। पाकिस्तान की यही मानसिकता कभी अमेरिका के साथ सैन्य संगठन का हिस्सा बनाने की थी। लेकिन क्या हुआ था? वह शीतयुद्ध को दक्षिण एशिया के आंगन तक ले आया था जिसके परिणाम दक्षिण एशिया को भुगतने पड़े।अमेरिकी सैन्य गठबंधन के बाद उसकी गोद में बैठकर वह सैन्य-चरमपंथ गठजोड़ का पोषण करता रहा जिसने दक्षिण एशिया को आतंकवाद का न्यूक्लियस बना दिया। अब वह चीन की गोद में बैठ रहा है। यही वजह है कि चाहे वह संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता का मसला हो, चाहे एनएसजी की सदस्यता का, चाहे सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम्स का या फिर आतंकवादियों पर शिंकजा कसने के भारतीय प्रयासों का, चीन बिना किसी संकोच के भारत के खिलाफ अपने ऑल व्हेदर फ्रेंड पाकिस्तान के साथ खड़ा हो जाता है। शायद यही 70 वर्षों की दोस्ती का असली तोहफा है, शेष तो सब दिखाने के लिए है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story