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कर्ज सस्ता होने से ही निवेश को लगेगा पंख,ब्याज दरें नहीं घटने से जीडीपी विकास दर प्रभावित

वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस वक्तव्य से असहमत होने की कोई वजह नहीं है कि अगर देश में ब्याज की दरें नहीं घटीं तो इससे जीडीपी विकास दर प्रभावित होगी।

कर्ज सस्ता होने से ही निवेश को लगेगा पंख,ब्याज दरें नहीं घटने से जीडीपी विकास दर प्रभावित
वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस वक्तव्य से असहमत होने की कोई वजह नहीं है कि अगर देश में ब्याज की दरें नहीं घटीं तो इससे जीडीपी विकास दर प्रभावित होगी। देखा जाए तो आज ब्राजील चुनौतियों से जूझ रहा है, यूरोप में सुस्ती है और चीन की विकास दर सिमटकर सात फीसदी के आसपास आ गई है। जबकि वैश्विक हालात भारत के विकास के एकदम अनुकूल है। ऐसे में कर्ज को सस्ता कर निवेश को बढ़ावा देने का यही उचित समय है। देश में कर्ज महंगा होने की वजह से जहां कारोबारी अपने कारोबार का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं, नए उद्यमी अपना उद्यम शुरू नहीं कर पा रहे हैं। वहीं मध्यवर्ग भी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए उपभोक्ता कर्ज नहीं ले पा रहा है।
पिछले वर्ष जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी उसके कुछ ही दिन बाद वेंकैया नायडू ने कहा था कि लोग अपने लिए घर खरीद सकें इसके लिए सरकार उन्हें सस्ते दर पर कर्ज उपलब्ध कराएगी। देखा जाए तो ब्याज की दरें कम होना अर्थव्यवस्था के सभी घटकों मसलन उद्योग, गरीब, किसान, मध्यवर्ग और नए उद्यमी आदि के लिए हितकर होता है। कुलमिलाकर इससे अर्थव्यवस्था को फायदा होता है। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी भरकम नए निवेश की जरूरत है। इसी से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा। नए उद्योग-धंधे लगेंगे तो भारी मात्रा में रोजगार पैदा होगा। इससे लोगों के हाथों में पैसा आएगा तो उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी। फिर मांग पैदा होगी। सात अप्रैल को रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा। उम्मीद है कि रिजर्व बैंक फिर से ब्याज दरों को घटाने का फैसला करे। हालांकि रिजर्व बैंक बीते दो महीने में दो बार रेपो रेट 0.5 फीसदी कम कर चुका है। रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंकों को रिजर्व बैंक की तरफ से कर्ज मिलता है।
लगातार दो बार रेपो रेट घटाने का संदेश साफ है कि अर्थव्यवस्था में सुधार को लेकर रिजर्व बैंक का भरोसा बढ़ा है। यानी अगर कुछ अप्रत्याशित न घट जाए तो हम यह मान सकते हैं कि देश में घटती ब्याज दरों वाले दौर की शुरुआत हो चुकी है। इधर एक लंबे अर्से से हम ब्याज दरों में कटौती के सवाल पर वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक को आमने-सामने खड़ा पा रहे थे। वजह यह थी कि सरकार की चिंता विकास दर बढ़ाने की थी, जबकि रिजर्व बैंक महंगाई दर बढ़ने की चिंता से मुक्त नहीं हो पा रहा था। अभी रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहा है तो इसके पीछे कई कारक सक्रिय हैं। इनमें सबसे बड़ा है वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा पेश किया गया बजट, जिसमें ढांचागत सुधार के कई महत्वपूर्ण कदम शामिल किए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भावों में कमी का फायदा उठाते हुए सरकार का सब्सिडी घटाने और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने का फैसला भी अहम है। महंगाई अभी पूरी तरह नियंत्रण में है। फरवरी से महंगाई शून्य से 2.06 फीसदी नीचे रही है। हालांकि रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट कम करने के बाद भी अभी कई प्रमुख बैंकों ने ब्याज दर नहीं घटाई है। ब्याज दरों में कटौती का बेसब्री से इंतजार है। जाहिर है, बैंकों को अर्थव्यवस्था के उत्पादक सेक्टरों को सस्ता कर्ज देना चाहिए ताकि विकास की गति बढ़ाई जा सके।
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