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आलोक पुराणिक का लेख : भारत-अमेरिका दोनों के हित गहरे जुड़े

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम आने के बाद भी इस सवाल पर माथापच्ची लगातार चलती रहेगी कि व्हाइट हाउस की स्थितियों का क्या असर भारत-अमेरिका के संबंधों पर पड़ेगा। यह सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है, क्योंकि भारत अमेरिका के रणनीतिक, रक्षा क्षेत्र के समझौतों की गति और प्रगति हाल में बहुत तेज रही है। भारत और अमेरिका के रिश्तों के बीच कई आर्थिक आयाम हैं और वो आयाम बदलती हुई दुनिया में बहुत तेजी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो रहे हैं। अभी दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के उच्चतर आयाम वक्त की जरूरत है।

आलोक पुराणिक का लेख : भारत-अमेरिका दोनों के हित गहरे जुड़े
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

अमेरिका के राष्ट्रपति के निवास व्हाइट हाउस में अब बिडेन रहेंगे या ट्रंप, यह सवाल कुछ ही समय में हल हो जाएगा। इस सवाल पर माथापच्ची लगातार चलती रहेगी कि व्हाइट हाउस की स्थितियों का क्या असर भारत-अमेरिका के संबंधों पर पड़ेगा। यह सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है, क्योंकि भारत अमेरिका के रणनीतिक, रक्षा क्षेत्र के समझौतों की गति और प्रगति हाल में बहुत तेज रही है। रक्षा क्षेत्र में दोनों देश बहुत नजदीक आ रहे हैं, उसकी साफ वजह यह है कि चीन से मिल जुलकर भिड़ना एक रणनीतिक आवश्यकता है। पर बात सिर्फ इतनी ही नहीं है।

भारत और अमेरिका के रिश्तों के बीच कई आर्थिक आयाम हैं और वो आयाम बदलती हुई दुनिया में बहुत तेजी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो रहे हैं। एक समय था जब चीन के साथ अमेरिका ने आर्थिक संबंधों को बहुत प्रगाढ़ किया। चीन को इसका बहुत लाभ मिला। चीन की विश्व में जो आर्थिक हैसियत है, उसमें अमेरिका का बहुत बड़ा योगदान है। चीन के लिए अपने बाजार अमेरिका ने खोले। चीन में जाकर अमेरिकी कंपनियों ने बहुत सामान बनाया और विश्वभर में बेचा। एप्पल फोन जो दुनियाभर में बिकते हैं, उनका बड़ा हिस्सा चीन में ही तैयार होता है। कुल मिलाकर अमेरिका का आकलन यह था कि चीन जैसे-जैसे विश्व की मुख्यधारा से जुड़ेगा, वैसे-वैसे चीन के रुख में उदारता आएगी और चीन का अपने पड़ोसियों के साथ व्यवहार लोचपूर्ण होगा। चीन का अपने लगभग हर पड़ोसी देश के साथ सीमा विवाद है। चीन के रुख में आक्रामकता कम होगी, ऐसा अमेरिका का आकलन था। चीन और अमेरिका की आर्थिक साझेदारी का परिणाम यह हुआ कि चीन तो लगातार संपन्न होता गया और संपन्नता के साथ चीन की आक्रामकता में भी बढ़ोत्तरी होती गई। अब दुनिया के सामने एक संपन्न और ज्यादा आक्रामक चीन है। इस संपन्नता के सूत्र अमेरिका के बाजारों तक चीन की पहुंच में छिपे हैं। यह बात ट्रंप ने बहुत साफ तौर पर समझी। ट्रंप ने तमाम तरह की बंदिशें लगाई चीन पर, पर मामला अब दूसरा हो गया है। चीन की स्थिति अब पहले वाली कमजोर नहीं है। फिर अमेरिका में राजनीतिक हालात बहुत तेजी से बदले।

चीन व्हाइट हाउस से ट्रंप की विदाई देखकर खुश होगा, पर बिडेन के लिए यह अब यह आसान नहीं होगा कि वह अपनी मनमर्जी से चीन के प्रति सकारात्मक रुख कर ले। मोटे तौर पर चीन के साथ अमेरिका को आक्रामक रवैया रखना होगा, वर्ना चीन विश्व और अमेरिका के लिए बड़ा खतरा बना रहेगा। चीन के प्रति आक्रामक रवैया सिर्फ राजनीति और रणनीतिक नहीं हो सकता, उसके आर्थिक आयाम हैं, इसलिए भारत-अमेरिका के आर्थिक रिश्ते नए स्वरूप में ढलेंगे, भले ही व्हाइट हाउस में कोई हो।

बिडेन की राजनीति आम तौर पर भारत के अनुकूल नहीं है। कश्मीर की स्थिति पर बिडेन के बयान भारत के अनुकूल नहीं रहे हैं। ट्रंप पाकिस्तान पर ज्यादा आक्रामक रहे हैं, पर यह सच्चाई भी अपनी जगह है कि भारत को साथ लिये बगैर चीन के खिलाफ आर्थिक और रणनीतिक मोर्चाबंदी संभव नहीं है। चुनाव से पहले कोई नेता चाहे कुछ भी बोल ले, पर सत्ता में आने के बाद हितों का विश्लेषण अलग तरह से होता है। बिडेन की राजनीति भले ही भारत को अनुकूल न पड़े पर उनका अर्थशास्त्र भारत को अनुकूल पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि चीन से जो अमेरिकी कंपनियां बाहर जाएंगी उनका एक ठिकाना भारत भी हो सकता है। बिडेन इस बात को समझते हैं कि चीन के प्रति उदारता एक हद तक ही जा सकती है। बिडेन खुद चीन के विरोध में दिखे हैं हालिया चुनावों में। चीन के विरोध का जो रुख बिडेन का है, वह भारत के अनुकूल है। बिडेन अमेरिका को बेहतरी की ओर लेकर जाना चाहेंगे, तो भारत की तरफ उन्हें देखना होगा। आम तौर पर आर्थिक हितों के मसले दूसरे हितों पर असर डालते हैं।

ट्रंप लगभग धमकी के अंदाज में भारत से बात करते थे कि भारत ने अमेरिकी मोटरसाइकिलों पर बहुत टैक्स लगा रखा है। ट्रंप ने हैरले डेविडसन मोटरसाइकिल पर भारत द्वारा लगाए कर की निंदा की थी। हैरले डेविडसन का कारोबार भारत में उतना बेहतर नहीं चला, जितनी उम्मीद इस कंपनी को थी। अब यह कंपनी भारतीय कंपनी हीरो मोटोकोर्प्स के साथ मिलकर नए सिरे से अपने कारोबार को पुन-संयोजित करने में जुटी है। प्रधानमंत्री मोदी ने विदेशी निवेशकों को अपने एक संबोधन में बताया कि भारत में तमाम साजो सामान की मांग भी है और यहां लोकतंत्र भी है। यह इशारा कहीं न कहीं चीन की तरफ भी था, दुनिया के कई देश हैं, जहां मांग हो सकती है पर वहां लोकतंत्र नहीं है। तमाम निवेशकों को लोकतंत्रविहीन देशों में काम करने में दिक्कत आती है। उदाहरण के लिए चीन एकतरफा कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगा सकता है, पर भारत में तमाम मसलों के लिए अदालतें हैं, तमाम प्लेटफार्म हैं। अमेरिकन कंपनियों के लिए भारत का कानूनी वातावरण ज्यादा बेहतर है। यह बात अमेरिकन कंपनियां समझ रही हैं और वो चीन से अपना कारोबार उठाकर भारत लाने पर गंभीरता से विचार कर रही हैं।

ट्रंप की शिकायत रही है कि भारत अमेरिका में अपना माल ज्यादा बेचकर जाता है और अमेरिका के माल को अपने यहां कम जगह देता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार 2018-19 में भारत-अमेरिका के व्यापार में भारत का व्यापार अधिशेष 16.86 अरब डालर का था। 2019-20 की अप्रैल-नवंबर अवधि में यह 10.91 अरब डालर का रहा। ट्रंप इससे परेशान थे, वह भारत को और माल बेचना चाहते थे। अमेरिका भारत को तमाम डेयरी उत्पाद बेचना चाहता है। यह बात स्वीकार करना भारत के लिए आसान नहीं है। डेयरी कारोबार भारत में बहुत संवेदनशील है, लाखों छोटे किसानों, कारोबारियों की आजीविका इससे जुड़ी है, इसलिए डेयरी कारोबार में अमेरिकन कंपनियों की खुली प्रविष्टि आसान नहीं होगी, पर तमाम ऐसे उद्योग हैं, जहां अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश कर सकती हैं और अपने मुनाफे बढ़ा सकती हैं। चीनी कंपनियां, कोरियन कंपनियां तेज रफ्तार से अपनी कारें भारतीय बाजारों में बेच रही हैं, उन्होने भारतीय बाजार की जरूरतों के हिसाब से अपनी कारों को ढाला है। अमेरिकी कंपनियों को भी ऐसा करना चाहिए। अमेरिकी कंपनियों को भारतीय कंपनियों के साथ भागीदारी करके अपनी बाजार पहुंच को बढ़ाना चाहिए। भारत सरकार अमेरिकी कंपनियों को भारत में पहुंच का अधिकार दे सकती है, पर बाजार में कामयाबी या नाकामी तो कंपनी के उत्पादों पर निर्भर होती है। हैरले डेविडसन मोटरसाइकिल को कामयाबी नहीं मिली और अब वह अपना कारोबार नए हिसाब से संयोजित कर रही है। कुल मिलाकर भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंधों के उच्चतर आयाम वक्त की जरूरत है।

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