Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

नरेंद्र सिंह तोमर का लेख : पर्यावरण के प्रहरी हमारे अन्नदाता

पर्यावरण दिवस केंद्र सरकार की पहल पर, इस बात पर मंथन करने का एक विशेष अवसर है कि देश कैसे कई संस्कृतियों व परंपराओं पर आधारित कार्यक्रमों के साथ पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकता है, जो हमारे जीवन का एक हिस्सा हैं। इसमें उन बातों को भी शामिल करना आवश्यक है, जिन्हें हम भूल चुके हैं। साथ ही स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी जरूरी हैं। बहाली कई तरह से हो सकती है। एक पारिस्थितिकी तंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस करना हमेशा संभव नहीं होता है। हमें अभी भी उस जमीन पर खेत और बुनियादी ढांचे की जरूरत है, जो कभी जंगल था और यही प्रकृति की जरूरत है।

union agriculture Minister narendra tomar
X

नरेंद्र सिंह तोमर

नरेंद्र सिंह तोमर

आज हम विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं। इस दिवस को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर संयुक्त राष्ट्र दशक का शुभारंभ भी हो रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस हमारे लिए केवल एक रस्म-भर नहीं है, बल्कि यह खास दिन पर्यावरण के महत्व को उजागर करने और लोगों को यह याद दिलाने के लिए मनाया जाता है कि प्रकृति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व वाले देश के रूप में भारत के लिए परंपरागत रूप से जीवन जीने का एक तरीका रहा है और कई समुदाय अभी भी प्रकृति को मार्गदर्शक शक्ति के रूप में देखते हैं।

यह दिवस केंद्र सरकार की पहल पर, इस बात पर मंथन करने का एक विशेष अवसर है कि देश कैसे कई संस्कृतियों व परंपराओं पर आधारित कार्यक्रमों के साथ पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकता है, जो हमारे जीवन का एक हिस्सा हैं। इसमें उन बातों को भी शामिल करना आवश्यक है, जिन्हें हम भूल चुके हैं। साथ ही स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी जरूरी हैं। बहाली कई तरह से हो सकती है। एक पारिस्थितिकी तंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस करना हमेशा संभव नहीं होता है। हमें अभी भी उस जमीन पर खेत और बुनियादी ढांचे की जरूरत है, जो कभी जंगल था और यही प्रकृति की जरूरत है। पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के हस्तक्षेप के आर्थिक लाभ निवेश की लागत से कई गुना अधिक हैं। हर पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल किया जा सकता है। आइए, देश में स्वच्छता अभियान की अलख जगाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा की गई कुछ प्रमुख पहलों पर विचार करें। किसी न किसी रूप में भूमि का क्षरण गंभीर चिंता का विषय है, जो कृषि की स्थिरता को खतरे में डालता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश एवं बहते पानी के कारण भूस्खलन और वनों की कटाई, जंगल व अन्य मैदानी क्षेत्रों में अतिचारण और दोषपूर्ण सांस्कृतिक प्रथाओं के कारण मिट्टी, पानी व हवा के कटाव को उजागर करती है। भारत उन 70 देशों में से एक है, जो मरूस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीसीडी) में शामिल हैं, जिसने कन्वेंशन की भूमि क्षरण तटस्थता रणनीति के एक भाग के रूप में वर्ष 2030 तक भूमि क्षरण तटस्थता लक्ष्यों तक पहुंचने का वचन दिया है। यूएनसीसीडी के एक हस्ताक्षरकर्ता के रूप में, भारत ने भूमि क्षरण तटस्थता प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ भूमि क्षरण व मरूस्थलीकरण से निपटने कई नीतियों-कार्यक्रमों को लागू किया है।

सरकार आर्गेनिक, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। परंपरागत कृषि विकास योजना, भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजना, जीरो बजट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे निश्चित ही पर्यावरण को असीमित फायदा होगा। पवित्र गंगा नदी की शुद्धता केंद्र सरकार की प्राथमिकता रही है, गंगा के किनारे जितनी खेती है, उसे आर्गेनिक, प्राकृतिक में बदलने की योजना क्रियान्वित की जा रही है ताकि कोई भी केमिकल- फर्टिलाइजर गंगा नदी में ना जाए, जल-पर्यावरण की दिशा में यह कदम मील का पत्थर हो सकेगा। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के बीच टिकाऊ कृषि के लिए सरकार द्वारा अपनाई जा रही सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में से एक कृषि में जल उपयोग दक्षता में वृद्धि करना है। सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकियों के माध्यम से सटीक जल उपयोग ने खेत के स्तर पर जल पदचिह्न को कम करने में बहुत बड़ा वादा दिखाया है। माइक्रो इरिगेशन का बजट पहले 5 हजार करोड़ रुपये का था, जिसे इस बजट में बढ़ाकर केंद्र सरकार ने दोगुना कर दिया है और अब 10 हजार करोड़ रुपये के बड़े फंड से सूक्ष्म सिंचाई द्वारा खेतों को, अन्नदाताओं को काफी लाभ होगा। इसके कारण, भूमिगत जल कम निकाला जाएगा, जिससे सीधे-सीधे पर्यावरण को अत्यधिक फायदा होगा। बायोस्टिमुलेंट्स को लेकर भी सरकार ने नई पालिसी बनाई है, ताकि केमिकल-खाद का कम उपयोग हो और खेतों की स्थिति सुधरें। मक्का से एथेनाल बनाने की योजना पर काम चल रहा है, जिससे आयात कम होने के साथ पेट्रोल-डीजल की खपत में कमी आने से पर्यावरण की बहुत रक्षा होगी।

खाद्य अपव्यय, पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि करता है, जिससे काफी हद तक बचा जा सकता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने अपनी योजनाओं के माध्यम से फार्म गेट बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्रोत्साहित करके, खाद्य प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने और विभिन्न कृषि-बागवानी उत्पादों की मूल्य श्रृंखला को मजबूत करके, फसल के बाद के नुकसान में कमी की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2 लाख नए उद्यमों को अपग्रेड करने व 9 लाख को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना (पीएमएफएमई) के प्रधानमंत्री औपचारिकीकरण की नई पहल, कृषि और संबद्ध उत्पादों के सतत प्रसंस्करण को बढ़ावा देने और पर्यावरण को आगे बढ़ाने में एक लंबा सफर तय करेगी।

मृदा क्षरण के अलावा अन्य कारक भी हैं, जो मृदा पारिस्थितिकी तंत्र में गिरावट के कारण बनते हैं। गहन खेती के कारण मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी व असंतुलन, विशेष रूप से सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है, मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों में गिरावट आती है। बारिश के पानी के रिसने के कारण गीली स्थिति गंभीर कीटों को आकर्षित करती है। नाइट्रोजन व पानी के उच्च उपयोग ने नाइट्रोजन को जलस्तर तक ले जाने का कारण बना दिया है, जिससे यह लोगों के लिए भी प्रदूषित हो रहा है। इसको दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा लगभग 12 करोड़ मृदा परीक्षण किए गए व भूमि स्वास्थ्य कार्ड का वितरण किया गया है, जिससे संतुलन उर्वरक उपयोग को बढ़ावा मिले। वनों की कटाई दुनिया में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। वन संपदा में गिरावट का मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूप ईंधन की व अन्य लकड़ी की अधिक मांग, विकास परियोजनाओं की अंधाधुंध साइटिंग व जंगल की आग है। हाल के दिनों में वन क्षेत्र में ज्यादा बदलाव नहीं आया क्योंकि गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए इसके मोड़ को कमोबेश वनीकरण द्वारा भरपाई की गई है।

भारत विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों वाला देश है जो विभिन्न प्रकार के जानवरों और पौधों को आश्रय देता है। पौधों की विविधता के मामले में भारत का एशिया व विश्व में उच्चतम स्थान है। जैसे कृषि अधिक व्यावसायिक होती जा रही है, कई पौधे और पशु प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। अंतर-पीढ़ीगत पर्यावरणीय समानता सुनिश्चित करते हुए, प्राकृतिक संसाधन आधार को नष्ट किए बिना सभी को खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से कृषि तथा मत्स्य पालन सहित कृषि से सम्बद्ध सभी क्षेत्रों में और वनों के स्थायी प्रबंधन के लिए अनेक उपाय भारत सरकार द्वारा अपनाए गए हैं और कुल मिलाकर, यह संतोषप्रद स्थिति है कि हमारे अन्नदाता खेतों में पर्यावरण के प्रहरी बन रहे हैं।

( लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री हैं।)

Next Story