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संपादकीय लेख : मैनेजमेंट के सबसे बड़े गुरु भगवान श्रीकृष्ण

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं, इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं| कर्म करना तेरे हाथ में है। कर्म का फल किसी और के हाथ में है| कर्म करते समय फल की इच्छा मत कर। फल की इच्छा छोड़ने का यह अर्थ नहीं है की तू कर्म करना भी छोड़ दे। यह सिद्धांत जितना उपयुक्त महाभारत काल में अर्थात अर्जुन के लिए था, उससे भी अधिक यह आज के युग में है।

संपादकीय लेख : मैनेजमेंट के सबसे बड़े गुरु भगवान श्रीकृष्ण
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं, इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं| कर्म करना तेरे हाथ में है। कर्म का फल किसी और के हाथ में है| कर्म करते समय फल की इच्छा मत कर। फल की इच्छा छोड़ने का यह अर्थ नहीं है की तू कर्म करना भी छोड़ दे। यह सिद्धांत जितना उपयुक्त महाभारत काल में अर्थात अर्जुन के लिए था, उससे भी अधिक यह आज के युग में हैं, क्योंकि जो व्यक्ति कर्म करते समय उस के फल पर अपना ध्यान लगाते ही वे प्रायः तनाव में रहते हैं। यही आज की स्थिति है। जो व्यक्ति कर्म को अपना कर्तव्य समझ कर करते हैं, वे तनाव-मुक्त रहते हैं। ऐसे व्यक्ति फल न मिलने पर निराश नहीं होते। तटस्थ भाव से कर्म करने करने वाले अपने कर्म को ही पुरस्कार समझते हैं| उन्हें उसी में शान्ति मिलती है। इस श्लोक में एक प्रकार से कर्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

गीता के तीसरे अध्याय का नाम ही कर्म योग है। इस में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि निष्काम कर्म ही कर्मयोग की श्रेणी में आता है। असल में भगवान श्रीकृष्ण कर्म के ही देव थे। उनका ज्ञान आज भी युवाओं के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उस समय अर्जुन के लिए था। ये ज्ञान आज के इस युग में सक्सेस मंत्र से कम नहीं। कर्म के अलावा भगवान कृष्ण ने मुश्किल घड़ी में पांडवों का साथ देकर ये साबित कर दिया कि दोस्त वही अच्छे होते हैं जो कठिन से कठिन परिस्थिति में आपका साथ देते हैं। दोस्ती में शर्तों के लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए आपको भी ऐसे ही दोस्त अपने आस-पास रखने चाहिए जो हर मुश्किल परिस्थिति में आपका संबल बनें। अगर पांडवों के पास भगवान श्रीकृष्ण की स्ट्रैटजी न होती तो उनका युद्ध में जीतना असंभव था, इसलिए किसी भी प्रतियोगिता से पहले स्ट्रैटजी बनाना आवश्यक होता है। इसके अलावा श्रीकृष्ण हर मोर्चे पर क्रांतिकारी विचारों के धनी रहे हैं। वे कभी किसी बंधी-बंधाई लीक पर नहीं चले, मौके के अुनसार उन्होंने अपनी भूमिका बदली और अर्जुन के सारथी बनने से भी परहेज नहीं किया। इससे सीख मिलती है कि अपना रास्ता खुद बनाओ। भगवान श्रीकृष्ण मैनेजमेंट के सबसे बड़े गुरु भी हैं।

उन्होंने अनुशासन में जीने, व्यर्थ चिंता न करने और भविष्य की बजाय वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने का मंत्र दिया। जो कामयाबी का पहला सिद्धांत है। श्रीकृष्ण के अनुसार जब हमारे विरोधियों का पलड़ा भारी हो तो हमें कूटनीति का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि तब सीधे रास्ते से विजय नहीं मिल सकती, इसलिए श्रीकृष्ण को एक महान कूटनीतिज्ञ भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार अपने गरीब मित्र सुदामा की मदद कर उसकी झोपड़ी को महल बना दिया उसी प्रकार दोस्ती में कभी अमीरी गरीबी को नहीं देखना चाहिए। सच्चाई और ईमानदारी से दोस्ती निभानी चाहिए। आज जन्माष्टमी का त्योहार है। देशभर ही नहीं विदेशों में भी भगवान श्रीकृष्ण के भक्त उत्सव मनाने में मशगूल हैं। मंदिरों को सजाया गया है। कृष्ण लीलाओं की झांकियां निकाली जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में भगवान श्रीकृष्ण का उल्लेख किया है। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि भगवान सीमा नंदन श्रीराम के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी भारत की धरती पर हुआ। यही कारण है कि देश के कण-कण में धर्म के साथ-साथ कर्म का संदेश भी विद्यामान है। एक ओर जहां हम श्रीकृष्ण के प्रेम से ओतप्रोत हैं वहीं दूसरी तरफ उनके कर्म के संदेश के भी वाहक हैं। जहां हम तकनीक को उन्नति का मार्ग बना सकते हैं, जरूरत पड़ने पर सुदर्शन चक्र भी उठा सकते हैं। आज इशारे-इशारे में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बिना नाम लिए नापाक पड़ोसी पाकिस्तान को भी यही संदेश दिया है।

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