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प्रमोद भार्गव का लेख : दलित चेहरे से ज्यादा वोट पर नजर

कांग्रेस आलाकामन ने मुख्यमंत्री की कमान चन्नी को सौंपकर सामाजिक राजनीति को दलित वोट की रणनीति का नया स्वरूप जरूर दे दिया है। लेकिन उसकी चिंताएं खत्म नहीं हुई हंै। गोया, कांग्रेस और चन्नी के समक्ष दलित वोट बैंक को साधने की चुनौती तो पेश आएगी ही, अन्य समुदायों के वोट कैसे हासिल हों, यह दूसरी बड़ी चुनौती होगी? देश में सबसे ज्यादा पंजाब में 32 प्रतिशत आबादी दलितों की है। यह आबादी संगठित होकर एक दल को मतदान करें तो निश्चित है, उस दल के जीतने की उम्मीद बढ़ जाएगी। पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें आरक्षित हैं। दोआबा क्षेत्र दलितों का गढ़ माना जाता है। सामान्य सीटों पर भी दलित प्रभावी भूमिका मेंे रहते हैं।

प्रमोद भार्गव का लेख : दलित चेहरे से ज्यादा वोट पर नजर
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प्रमोद भार्गव 

प्रमोद भार्गव

पंजाब में लंबे समय से जो खींचतान चल रही थी, उस पर दलित मुख्यमंत्री के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी को शपथ दिलाकर विराम तो जरूर लगा दिया है, लेकिन इस स्थिरता का कायम रहना मुश्किल है। नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने के साथ ही विभाजन की जो रेखा खींच दी है, उसके दंश से निवर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह उभरने वाले नहीं है। लिहाजा आंतरिक कलह पांच माह बाद होने वाले चुनाव तक देखने में आती रहेगी। कैप्टन ने इस्तीफा देने के साथ ही कह दिया कि उनके लिए सभी विकल्प खुले हैं। अर्थात वे नई पार्टी भी बना सकते हैं और भाजपा का दामन भी थाम सकते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में कांग्रेस की सत्ता वापसी मुश्किल होगी। य

ह कड़वाहट अमरिंदर के शपथ-ग्रहण समारोह में नहीं पहुंचने और पंजाब प्रदेश प्रभारी सुनील जाखड़ व हरीश रावत द्वारा यह आश्वस्त कर देने से कि आगामी चुनाव सिद्धू के ही नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, और बढ़ गई है। साफ है, कांग्रेस के इस अंदरूनी विवाद का लाभ आम आदमी पार्टी, अकाली दल-बसपा का गठबंधन अथवा भाजपा उठा सकते हैं। हालांकि चन्नी ने शपथ के तुरंत बाद तीनों कृषि कानूनों को काले कानून और किसानों के बिजली के बिल माफ करके मतदाताओं को लुभाने की सस्ती शुरुआत जरूर की, लेकिन साथ ही उन पर लगे महिला छेड़छाड़ के आरोप भी सामने आने लगे हैं। तीन साल पुराने एक मामले में एक महिला आईएएस अधिकारी को 2018 में गलत संदेश भेजकर वे मी-टू के आरोप में घिर गए थे। इस महिला ने तो कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई, लेकिन पंजाब महिला आयोग ने राज्य सरकार को नोटिस देकर इस मामले को स्वयमेव संज्ञान में लिया हुआ है। सत्ता पर काबिज होने के बाद राजनेताओं से जुड़े अकसर ऐसे मामले गरमा जाते हैं।

मुख्यमंत्री के इस बदलाव से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की संयुक्त ताकत कांग्रेस में उभरी है। ऐसा माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर की सलाह के बाद यह फैसला सोनिया गांधी से मशविरा करने के बाद लिया गया। दरअसल कांग्रेस नेतृत्व अर्से से अनुभव कर रहा था कि कैप्टन अमरिंदर दबाव की राजनीति करते हुए यह जता रहे हैं कि गांधी परिवार की मदद के बिना भी वे चुनाव लड़ने और जीतने में सक्षम हैं। इसके उलट प्रशांत किशोर ने राहुल-प्रियंका को समझाया कि पंजाब में कैप्टन की साख गिर रही है, नतीजतन उनके नेतृत्व में चुनाव जीतना असंभव है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए राहुल ने तीन सर्वेक्षण कराए और इनमें से एक स्वयं प्रशांत ने किया। इनका निष्कर्ष किसानों की नाराजगी के चलते अमरिंदर के विरुद्ध गया। सर्वे में अकाली दल और आम आदमी पार्टी की झोली में पंजाब सत्ता का जाना बताया गया। गोया, प्रियंका ने सिद्धू को आगे बढ़ाने का सुझाव दिया। राहुल ने इसका समर्थन किया और आखिरकार सिद्धू प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बना दिए गए। इसी कड़ी में कैप्टन के इस्तीफे के बाद चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया गया।

कांग्रेस आलाकामन ने मुख्यमंत्री की कमान चन्नी को सौंपकर सामाजिक राजनीति को दलित वोट की रणनीति का नया स्वरूप जरूर दे दिया है। लेकिन उसकी चिंताएं खत्म नहीं हुई हंै। गोया, कांग्रेस और चन्नी के समक्ष दलित वोट बैंक को साधने की चुनौती तो पेश आएगी ही, अन्य समुदायों के वोट कैसे हासिल हों, यह दूसरी बड़ी चुनौती होगी? देश में सबसे ज्यादा पंजाब में 32 प्रतिशत आबादी दलितों की है। यह आबादी संगठित होकर एक दल को मतदान करें तो निश्चित है, उस दल के जीतने की उम्मीद बढ़ जाएगी। पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें आरक्षित हैं। दोआबा क्षेत्र दलितों का गढ़ माना जाता है। सामान्य सीटों पर भी दलित प्रभावी भूमिका मेंे रहते हैं। यह दलित वोट बैंक अनुसूचित जनजाति, सिख और हिंदू दलितों में बंटा हुआ है। यहां 22 जिलों में से 18 जिलों में सिख बहुसंख्यक हैं। पंजाब में लगभग 2 करोड़ मतदाता हैं। जाहिर है, दलित समाज के विभिन्न उप-धर्मों में बंटा होने के कारण मायावती पंजाब की सत्ता पर काबिज नहीं हो पाईं। दरअसल बसपा को दलितों का शत-प्रतिशत वोट कभी मिला ही नहीं। यही कारण रहा कि वे पंजाब में हमेशा ही सत्ता से दूर रहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को पंजाब में एक भी सीट नहीं मिली। यहां उसका वोट बैंक भी नीचे खिसक कर 3.5 प्रतिशत रह गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में यदि कैप्टन कांग्रेस के साथ खड़े रहते हैं तो कांग्रेस की बल्ले-बल्ले संभव है। कांग्रेस का पंजाब में भविष्य जो भी हो, फिलहाल राहुल-प्रियंका ने दलित कार्ड खेलकर पार्टी में नई जान फूंकने की कोशिश की है। वह भी दलितों के बीच दलितों के माध्यम से। हालांकि राजनीतिक दल, दलितों को सशक्त बनाने की पहल करते रहे हैं। इसके पहले चरण में भीमराव आंबेडकर शामिल थे, जिन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर संविधान लिखने और वंचितों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने में योगदान किया। दूसरा चरण कांशीराम का था, जिन्होंने सशक्तीकरण का उपयोग आरक्षण से संगठन के निर्माण तक किया। इस चरण में मायावती ने भी अहम भूमिका निभाई। देश अब तीसरे चरण से गुजर रहा है, इस परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, 'नेतृत्व का विकास।' कांग्रेस ने पंजाब में दलित मुख्यमंत्री देकर मील का पत्थर गाड़ दिया है। चूंकि कांशीराम पंजाब से थे, वे चाहते थे कि दलित मुख्यमंत्री बने। चन्नी के मुख्यमंत्री बनने से पंजाब में ही नहीं देश में कोग्रेस ने यह संदेश दिया है कि उसने कांशीराम का सपना पूरा कर दिया है। अब भाजपा भी पंजाब में चुनाव के बाद दलित मुख्यमंत्री देने का भरोसा जता रही है। अकाली दल-बसपा और आम आदमी पार्टी भी दलित उपमुख्यमंत्री बनाने का दावा करने लगे हैं। साफ है, यह दलित मुहिम देश में आगे बढ़ेगी। कांशीराम इसीलिए सफल हुए थे, क्योंकि कांशीराम के वैचारिक दर्शन में आंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी ही, दलित और वंचितों को करिश्माई अंदाज में लुभाने की प्रभावी वाणी की ताकत भी थी। यही वजह रही कि तमाम क्षेत्रीय क्षत्रप उभरने के बावजूद बसपा ने दलित राजनीतिक संगठन के रूप में हिन्दी क्षेत्र में अपनी पुख्ता जगह बनाई, लेकिन मायावती ने पदलोलुपता के चलते बसपा में विभिन्न प्रयोगों का तड़का लगाकर बुनियादी सिद्धांतों से खिलवाड़ किया। दलित मायावती के वोट बैंक बनकर रह गए।

कांग्रेस को भी इस मुगालते में रहने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने नेतृत्व परिवर्तन करके कोई नया किला फतह कर लिया है और राहुल-प्रियंका आगे भी ठोस निर्णय लेते हुए कांग्रेस को विजय दिलाकर केंद्रीय नेतृत्व पर नियंत्रण बनाए रखेंगे, क्योंकि वे अभी कांग्रेस की चुनावी जीत के उस तरह से सिरमौर नहीं बन पा रहे है, जिस तरह से भाजपा में नरेंद्र मोदी हैं। दरअसल मोदी के नियंत्रण में भाजपा इसलिए है, क्योंकि वे जीत का चेहरा बने हुए हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में चेहरे जीत का आधार तभी तक बने रह पाते हैं, जब तक वे जनहितैषी नीतियों को कारगर रूप में पेश करते हैं। अतएव चेहरा वोट बैंक का स्थाई आधार नहीं बना रह पाता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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