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देश में जननी व शिशु मृत्यु दर में कमी लाना चुनौती

मातृत्व मृत्यु दर यानी मेटरनल मोरटैलिटी रेट के मामले में भारत नेपाल से भी पीछे है।

देश में जननी व शिशु मृत्यु दर में कमी लाना चुनौती
यह सही है कि भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर जितनी जागरूकता होनी चाहिए, उतनी नहीं है। हमारा सामाजिक तानाबाना ऐसा है, जिसमें महिलाओं के स्वास्थ्य पर कम ही ध्यान दिया जाता है। सरकार की ओर से भी महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त नहीं है। नतीजा है कि बच्चे को जन्म देने के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर दुनिया की अपेक्षा अपने देश में उच्च स्तर पर है। मातृत्व मृत्यु दर यानी मेटरनल मोरटैलिटी रेट (एमएमआर) के मामले में भारत नेपाल से भी पीछे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनिसेफ और भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों को देखें तो दुनिया में रोजाना करीब 800 महिलाएं बच्चों को जन्म देने के दौरान मौत की शिकार हो जाती हैं, इनमें 20 फीसदी भारतीय महिलाएं हैं।
हमारे देश में सालाना 55 हजार महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। इनमें से अधिकांश गरीब परिवार की महिलाएं होती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तथ्य से वाकिफ हैं। इसलिए उन्होंने अपने 22वें मन की बात कार्यक्रम में जननी सुरक्षा पर विशेष घोषणा की। पीएम ने देश भर के स्त्री रोग विशेषज्ञों से हर माह की नौ तारीख को सरकारी अस्पतालों में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गरीब गर्भवती महिलाओं का नि:शुल्क उपचार करने की अपील की। उन्होंने निजी चिकित्सकों से भी साल में 12 दिन गर्भवती महिलाओं के इलाज के लिए देने की अपील की है। पीएम का तर्क है कि इससे देश में मातृत्व और शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है। ऐसा नहीं है कि एमएमआर में कमी नहीं आई है।
वर्षों से जननी सुरक्षा योजनाओं के तहत किए जा रहे सरकारी प्रयासों से एमएमआर में काफी कमी आई है। लेकिन दुनिया के अधिकांश देशों के मुकाबले यह अभी भी ज्यादा है। प्रति एक लाख महिला आबादी पर 1990 से 2015 तक एमएमआर में 75 फीसदी की गिरावट आई है। 1990 में प्रति एक लाख पर 560 महिलाओं की मौत हो जाती थी, तो 2015 में यह संख्या घट कर 140 रह गई। यही नहीं शिशु मृत्यु दर यानी इन्फेंट मोरटैलिटी रेट (आईएमआर) भी भारत में काफी उच्च है।
बांग्लादेश, र्शीलंका और नेपाल की स्थिति हमसे बेहतर है। प्रति एक हजार शिशु जन्म पर आईएमआर 40 है। बांग्लादेश में यह दर 32 और नेपाल में 33 है। अनुमान के मुताबिक भारत में सालाना जन्म लेने वाले बच्चों में से प्रसव के दौरान सालाना 10.68 लाख नवजात की मौत हो जाती है। हर वर्ष लगभग तीन करोड़ महिलाएं गर्भावस्था धारण करती हैं, लेकिन प्रसूति के समय कुछ माताएं अथवा नवजात मर जाते हैं। कभी-कभी दोनों की मौत हो जाती है।
हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र की दशा किसी से छिपी नहीं है। सरकार की अब भी हेल्थ पर बजट कम है। जरूरत का आधा है। निजी हेल्थ सेक्टर इलाज के नाम पर मरीजों के शोषण के लिए बदनाम है। वहां किसी गरीब के इलाज की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है। हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र में गुणात्मक सुधार लाने की जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार को जितना ध्यान देना चाहिए था, दुर्भाग्यवश केंद्र व राज्य सरकारों ने नहीं दिया। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कोई भी सरकार अगर अपनी शत-प्रतिशत जनता के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य मुहैया करा दे, तो उस देश या राज्य को विकसित होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। आजादी के 70 साल बाद भी देश में एक ही एम्स है। जरूरत हर राज्य में दो-चार एम्स की है।
देश सरकारी अस्पतालों की कमी से जूझ रहा है। डॉक्टरों की भी कमी है। इसलिए केवल अपील ही काफी नहीं है। अपील भर से बात नहीं बनेगी। सरकार को हेल्थ सेक्टर में बड़े स्तर पर निवेश करना होगा, सरकारी अस्पतालों की दशा और संख्या भी ठीक करनी होगी। गरीब गर्भवती महिलाओं के इलाज के लिए व्यापक इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, जो कि सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। तभी अपील का कारगर प्रभाव भी दिखेगा।
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