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श्रीप्रकाश शर्मा का लेख: सबसे बड़ी हार है आत्महत्या

बढ़ती गला-काट प्रतियोगिता और आगे बढ़ने की होड़ में आज दुनिया में लोग तेजी से डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे के अनुसार दुनिया में 27 करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित हैं।

श्रीप्रकाश शर्मा का लेख: सबसे बड़ी हार है आत्महत्या
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युवा और होनहार बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की स्तब्ध कर देने वाली खुदकुशी ने अपने पीछे कई अहम प्रश्न छोड़ दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ खड़ा रहा है कि चेहरे पर प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि के झूठे आवरण के साथ जीने वाले अपनों के दर्द और गम को पहचानने की क्या हमने कभी कोशिश की है? शायद नहीं, हंसते चेहरों के पीछे अनकहे दर्द की टीस से नम आंखों को पढ़ न पाने की हमारी विफलता ने वर्तमान पीढ़ी के लिए जिस समस्या को जन्म दिया है, उसमें जीवन की सांसें घुटती जा रही हैं। इस सत्य से इनकार नहीं है कि भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी चाह में तांगे के घोड़े की तरह आंखों पर पट्टी बांधे बेतहाशा दौड़ता हुआ इक्कीसवीं सदी का मॉडर्न और मशीनी मानव आज हताशा और अवसाद के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है।

बढ़ती गला-काट प्रतियोगिता और आगे बढ़ने की होड़ में आज दुनिया में लोग तेजी से डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे के अनुसार दुनिया में 27 करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित हैं। मनोविश्लेषकों का मानना है कि डिप्रेशन चिंता से शुरू होती है जो तनाव को जन्म देती है। इसके सबसे बदतर परिणाम के रूप में आत्महत्या की घटनाएं भी बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 15-29 वर्ष के लोगों में डिप्रेशन मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक रिपोर्ट की मानें तो भारत की आबादी का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा अवसाद के शिकार है। विश्व में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर 11 लोग आत्महत्या करते हैं जबकि यही दर देश में 21 है। डिप्रेशन, चिंता, एकाकीपन और अन्य मानसिक व्याधियों से देश की आबादी का 7.5 प्रतिशत हिस्सा ग्रसित है। जाहिर है यदि हम अवसाद जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों से निजात पाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले तनाव से मुक्ति पाने की जरुरत है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि चिंता एवं चिता एक समान होती हैं। जीवन में चाहे कितनी ही कठिन परिस्थिति क्यों न आएं, हमें चिंता नहीं करनी चाहिए, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। एक बार मुसीबतों से लड़कर जब आप बाहर आएंगे तो फिर आप खुद को अधिक मजबूत एवं धैर्यवान पाएंगे। समस्याओं को अपनों से छुपा लेने पर वे और भी गंभीर हो जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में संकोच नहीं करें, अपनों से खुल कर बातें अवश्य करें।

क्या आपने कभी किसी नदी पर बने पुल के नीचे बहते पानी को गौर से देखा है? इस पानी के बहाव में भी जीवन को चिंता एवं अंततः अवसाद से दूर रखने का एक अहम दर्शन छुपा होता है। कहते हैं कि इस पुल के नीचे से जो पानी एक बार बहकर निकल जाता है तो दुबारा वह कभी अपनी जगह लौट कर नहीं आता है। पुल के नीचे से बहने वाला पानी हर बार नया होता है। आशय यह है कि हमें अपने जीवन में घटी भूत की घटनाओं की दु:खद स्मृति को पुल के नीचे बहते पानी की तरह सदा के लिए भूल जाना चाहिए।

महान अंग्रेजी साहित्यकर, दार्शनिक एवं नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपनी पुस्तक मैन एंड सुपरमैन में लिखा है कि चिंतारहित जीवन के लिए व्यक्ति को हमेशा जीवन की परिस्थतियों के अनुसार खुद को ढाल लेना चाहिए। जब संसार को कोई शख्स अपने मन के अनुकूल ढालने की कोशिश करता है तो यह असफल कोशिश कई गंभीर समस्याओं को जन्म देती है। इसीलिए यह अति अनिवार्य है कि हम खुद को परिस्थितियों के हिसाब से ढालने की आदत सीखें, परिस्थितियां कभी इंसान के इशारे पर नहीं ढलती हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रसिद्द कवि हेनरी वड्सवर्थ लॉन्गफेलो ने अवसाद से ग्रसित व्यक्ति के बारे में एक बार कहा था, प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी और गुप्त दर्द होता है जिसे दुनिया नहीं जानती है। दुःख तब होता है जब उदासी से घिरे ऐसे व्यक्ति के दर्द को समझने की बजाय हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं। जब कभी जीवन समस्याओं में घिर जाए तो इससे परेशान होने की बजाए हमें इनके समाधान ढूंढ़ने चाहिए, अपनों से बातें करनी चाहिए । दर्द को खुद तक बटोर कर रखने से इसकी टीस जानलेवा होती जाती है। रूठे को मनाने और रूठने पर खुद मान जाने में जीवन की बेशुमार समस्याएं खुद-ब-खुद खत्म हो जाती हैं। देखा-देखी की संस्कृति में अपने पांव अपनी चादर तक ही फैलाने के अमूल्य दर्शन को जीवन में धार्मिक रूप से फॉलो करने की जरूरत है। जीवन में खुश रहने के लिए खुद को किसी-न-किसी कार्य में बिजी रखना भी बहुत आवश्यक है।

जीवन में सपने देखना स्वाभाविक है किन्तु उसके साकार न होने की स्थिति में मन को दु:खी कर लेना सबसे बड़ी भूल है। जीवन में हमेशा विफलताओं से सीख लेकर आगे बढ़ने और जीने की जरूरत है। इस नश्वर संसार में जीवन कभी रुकता नहीं, वक्त कभी ठहरता नहीं। घोर अंधेरे के बाद हर एक सुरंग के मुहाने पर रोशनी का संसार फैला होता है और इसी दर्शन में जीवन का सार छुपा हुआ है। लिहाजा जब कभी आप किसी कठिन परिस्थिति में घिर जाएं तो यह मानकर चलें कि कदाचित यह सूर्योदय के पूर्व का वह घना अंधेरा है, जिसके पार सुख एवं शुकून की ही रोशनी है, दुःख एवं तकलीफ से मुक्ति का द्वार है।

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