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प्रमोद भार्गव का लेख : ताकतवर हो रही वायुसेना

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही सरकार रक्षा सौदों में गंभीर रूचि ले रही है। अमेरिका से 165 अरब रुपये के लड़ाकू हेलिकॉप्टर एवं अन्य रक्षा उपकरण खरीदने का बड़ा सौदा पहले ही हो चुका है।

प्रमोद भार्गव का लेख : ताकतवर हो रही वायुसेना
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प्रमोद भार्गव

सशक्त और शक्तिशाली भारत के लिए तीनों सेनाओं का आधुनिकतम शस्त्रों और युद्धक हवाई-जहाजों व हेलिकॉप्टरों से सुसज्जित होना आवश्यक है। इस दृष्टि से भारत ने लद्दाख में चीन से तनातनी के चलते रूस से 33 लड़ाकू विमानों की आपात खरीद का फैसला लिया है। रूस से 12 सुखोई-30 और 21 मिग-29 विमान खरीदे जाएंगे। भारत को जुलाई तक चार राफेल विमान भी मिल जाएंगे। अब वायुसेना में जंगी बेड़ों की क्षमता करीब 20 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इनमें आधुनिक तकनीक से लैस राफेल, अपाचे, सुखोई, मिग, ध्रुव और शिनूक शामिल हुए हैं। वायुसेना ने अपनी युद्धक इकाइयों को आक्रमक बनाने के लिए इसकी सरंचना में भी बदलाव किए हैं। युद्ध अभियानों के लिए करीब 2000 योद्धाओं और तकनीशियनों की भर्ती की गई है।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही सरकार रक्षा सौदों में गंभीर रूचि ले रही है। अमेरिका से 165 अरब रुपये के लड़ाकू हेलिकॉप्टर एवं अन्य रक्षा उपकरण खरीदने का बड़ा सौदा पहले ही हो चुका है। अमेरिका विमानन कंपनी बोइंग से 22 अपाचे हमलावर हेलिकॉप्टर और 15 शिनूंक खरीदा जाना देश की सुरक्षा के लिए जरूरी था। फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे के बाद इनका भारत आना शुरू भी हो गया है। लड़ाकू विमान व हथियारों के ये सौदे इसलिए अहम है, क्योंकि हमारे दुश्मन देश चीन और पाकिस्तान में लड़ाकू विमान लगातार बढ़ रहे हैं। इन दोनों देशों की वायु-शक्ति की तुलना में हमारे पास कम से कम 756 लड़ाकू विमान होने चाहिए। गड़बड़ घोटालों में उलझी रही डॉ. मनमोहन सिंह सरकार 10 साल के कार्यकाल में विमान खरीदने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाई थी। दरअसल, सौदों में भ्रष्टाचार के चलते इटली की फिनमैकेनिका और उसकी सहयोगी कंपनी अगस्तावेस्तलैंड हेलिकॉप्टरों की खरीदी में पूर्व वायुसेना अध्यक्ष शशींद्रपाल त्यागी पर सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज होने के बाद संप्रग सरकार ने सैन्य सामग्री खरीदने के सिलसिले में घुटने टेक दिए थे।

अपाचे का सौदा हाइब्रिड है। इस हेलिकॉप्टर में हथियार,रडार और इलेक्ट्रोनिक युद्ध उपकरण लगे हुए हैं। पिछले एक दशक के दौरान अमेरिकी कंपनियों ने तकरीबन 10 अरब डॉलर मूल्य के रक्षा सौदे भारत से किए हैं। इनमें पी-81 नौवहन टोही विमान,सी-130,जे सुपर,हरक्यूलियस और सी-17 ग्लोबमास्टर-3 जैसे विमानों की खरीद शामिल हैं। अपाचे एएच-64 लॉन्गबो हेलिकॉप्टर आधुनिक होने के साथ बहुलक्षीय युद्धक विमान है। यह हर मौसम और रात में भी युद्ध अभियानों में सक्रीय रहने की क्षमता रखता है। इसकी प्रमुख खूबी है कि यह एक मिनट से कम समय में 128 लक्ष्यों को चिन्हित कर सकता है और 16 लक्ष्यों पर निशाना साधता हुआ बच निकल सकने की विलक्षणता रखता है। कारगिल जैसे ऊंचाई वाली चोटियों पर भी पहुंच सकता है। गालवन की चोटियों पर भी यह आसानी से पहुंच जाएगा।

बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद वायुसेना ने तमिलनाडू के तेंजावुर में सुखोई-30 एमकेआई के बेड़े को तैनात किया है। इस बेड़े में सुखोई विमानों को 2.5 टन के हवा से मार करने वाली ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस किया हुआ है। ये मिसाइलें 300 किलोमीटर की दूरी तक अचूक निशाना साधने में सक्षम हैं। लड़ाकू विमानों एवं हथियारों की कमी से जूझ रही वायुसेना को ये विमान एवं हथियार आॅक्सीजन साबित हो रहे हैं, जबकि अभी विमानों की खेपें पूरी नहीं आई हैं।

1978 में जब जागुआर विमानों का बेड़ा ब्रिटेन से खरीदा गया था, तब ब्रिटेन ने हमारी लाचारी का फायदा उठाते हुए हमें ऐसे जंगी जागुआर बेचे थे, जिनका प्रयोग ब्रिटिश वायुसेना पहले से ही कर रही थी। राफेल भी फ्रांस द्वारा प्रयोग में लाए गए विमान हैं। लिहाजा जब तक हम विमान निर्माण के क्षेत्र में स्वावलंबी नहीं होंगे, लाचारी के समझौतांे की मजबूरी झेलते रहेंगे।

हकीकत तो यह है कि मोदी सरकार को अब लाचारियों से भरी विमान खरीदों के स्थायी समाधान तलाशने की जरूरत है। साथ ही एचएएल एवं डीआरडीओ जैसी संस्थाओं का आधुनीकिकरण और स्वेदेशीकरण किया जाना नितांत जरूरी है। टाटा कंपनी सी-130 मॉडल के विमानों के पुर्जे भारत में बनाकर दूसरे देशों में निर्यात कर रही है। जब ऐसा संभव है तो हम अपने ही देश के लिए शक्तिशाली युद्धक विमानों का निर्माण क्यों नहीं कर सकते? एचएएल भारतीय कंपनियों को उपकरण व पुर्जे बनाने का लाइंसेंस देकर इस दिशा में उल्लेखनीय पहल कर सकती है। हालांकि हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा स्वदेशी तकनीक से ध्रुव नाम का हेलिकॉप्टर बनाया जा रहा है। धु्रव हल्का बहुउद्देश्यीय हेलिकॉप्टा है। इसे थल, जल और नभ तीनों सेनाएं उपयोग में ले रही हैं। इसकी विशेषता है कि यह हवा में डॉल्फिन की तरह गोता लगा सकता है, यू आकार में मुड़ सकता है और खड़े रूप में भी तीर की भांति उड़ान भर सकता है। हालांकि रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की मात्रा शत-प्रतिशत कर देने से ये संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है। यदि ऐसा होता है तो हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया का जो स्वप्न है, उसके साकार होने की उम्मीद भी बढ़ जाएगी।

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