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चिंतन: पूर्वी एशिया में भारत की पैठ को बढ़ाएगा थाईलैंड

थाईलैंड से करार पूर्वी एशिया में भारत की पैठ भी मजबूत करने में मददगार होंगे।

चिंतन: पूर्वी एशिया में भारत की पैठ को बढ़ाएगा थाईलैंड
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नई दिल्ली.भारत और थाईलैंड ने ट्रेड, रक्षा व समुद्री क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने पर सहमति जताकर आपसी संबंधों को नई ऊंचाई प्रदान की है। पूर्वी एशियाई देश थाईलैंड सदियों से भारत का विश्वसनीय सहयोगी रहा है। अधिकांश समुद्री सीमाओं से घिरा यह बौद्ध देश न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी भारत के बेहद करीब है। सामरिक दृष्टि से भारत के लिए थाईलैंड बेहद अहम है। अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए दुनियाभर में मशहूर थाईलैंड भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी की महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत म्यामांर होते हुए थाईलैंड तक सड़क मार्ग बनाना चाहता है, इससे पूर्वी एशिया में भारत की आर्थिक पैठ बढ़ेगी। इसके साथ ही हिंद महासागर में चीन की बेजा दखलंदाजी को रोकना भी जरूरी है। चीन से थाईलैंड भी सहज नहीं है। इस मायने में भारत और थाईलैंड के बीच ताजा समुद्री सुरक्षा करार अहम भूमिका निभाएगा।
कूटनीतिक रूप से थाईलैंड भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो साल में ही चार बार दोनों देशों के नेता मिल चुके हैं। प्रधानमंत्री बनने के साल ही नवंबर 2014 में नरेन्द्र मोदी पूर्वी एशिया समिट में भाग लेने म्यांमार के नेपेडा गए तो, वहां थाईलैंड के पीएम प्रयुत चान-ओ-चा से अलग से मिले और दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की बात की। जून 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बैंकॉक की यात्रा की। इस दौरान थाईलैंड के साथ भारत ने दोहरा कराधान से बचने के लिए दोहरे कराधान बचाव संधि (डीटीएटी) समेत कई करार किए। इसमें 2013 में हस्ताक्षरित प्रत्यर्पण संधि का अनुसर्मथन भी शामिल है। यह संधि भगोड़े अपराधियों के प्रत्यर्पण के लिए कानूनी तंत्र मुहैया कराती है। नालंदा यूनिवर्सिटी स्थापित करने व थाईलैंड के एक यूनिवर्सिटी में आयुर्वेद पीठ की स्थापना को लेकर भी समझौता हुआ। उसके बाद इस साल फरवरी में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी थाईलैंड गए। यह 50 साल में किसी भारतीय उपराष्ट्रपति की पहली आधिकारिक यात्रा थी।
इस दौरान भी दोनों देशों में कई अहम समझौते हुए और अब थाई पीएम प्रयुत चान-ओ-चा तीन की भारत यात्रा पर आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दोनों नेताओं ने संयुक्त प्रेस संबोधन में दोनों देशों के आपसी सहयोग को और मजबूत करने का संकल्प दोहराया। खास बात यह है कि भारत और थाईलैंड के बीच 70 साल से राजनयिक संबंध है। इस दरम्यान कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि दोनों देशों के बीच रिश्ते में खटास आई हो। समूचे थाईलैंड के बौद्ध धर्मावलंबी होने से भी वह खुद को भारत से जुड़ा हुआ महसूस करता है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का संगठन आसियान और भारत के बीच ट्रेड को लेकर कई समझौते पहले से है। चूंकि थाइलैंड आसियान का संस्थापक सदस्य है, इस मायने में आसियान से एग्रीमेंट का लाभ दोनों देशों के बीच ट्रेड बढ़ाने के रूप में होता है। इसके अलावा ईस्ट एशिया समिट (ईएएस) में भारत और थाईलैंड दोनों भागीदार हैं। साथ ही भारत-थाईलैंड बिजनेस फोरम भी दोनों देशों में निवेश बढ़ाने की संभावनाओं पर काम करता है। पीएम मोदी ने थाईलैंड के निवेशकों को भारत में पूंजी लगाने के लिए न्यौता दिया है। निश्चित ही आने वाले समय में भारत और थाईलैंड एक दूसरे के विकास के अहम सहयोगी साबित होंगे। थाईलैंड से करार पूर्वी एशिया में भारत की पैठ भी मजबूत करने में मददगार होंगे।
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