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क्या सूचि जारी करने से खत्म हो जाएगा आतंक ?

क्या आतंकी संगठनों, उनके आकाओं और उनसे जुड़े आतंकियों की सूची बनाने और उसे जारी करते रहने से इस समस्या का समाधान हो जाएगा? पहले अमेरिका ने कुछ आतंकी समूहों और उनके आकाओं की सूची जारी की और अब वही उपक्रम संयुक्त राष्ट्र संघ ने दोहराया है।

क्या सूचि जारी करने से खत्म हो जाएगा आतंक ?
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क्या आतंकी संगठनों, उनके आकाओं और उनसे जुड़े आतंकियों की सूची बनाने और उसे जारी करते रहने से इस समस्या का समाधान हो जाएगा? पहले अमेरिका ने कुछ आतंकी समूहों और उनके आकाओं की सूची जारी की और अब वही उपक्रम संयुक्त राष्ट्र संघ ने दोहराया है। इस तरह की सूची जारी करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। पूरी दुनिया इन संगठनों और आतंकियों के बारे में जानती है, जिनका जिक्र संयुक्त राष्ट्र संघ की सूची में किया गया है।

सवाल यह है कि यूएन इनसे निपटने के लिए कौन से उपाय कर रहा है? या अतीत में ऐसे कौन से उपाय उसकी तरफ से हुए हैं, जिनसे आतंकी जमातों की सेहत पर कोई असर हुआ हो। जवाब मिलेगा-कुछ खास नहीं किया गया है। इससे ज्यादा दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि भारत के बार-बार कहने के बावजूद अभी तक संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद आतंकवाद की परिभाषा तक तय नहीं कर सके हैं।

दुनियाभर के देशों की नुमाइंदगी का दावा करने वाला संगठन ही जब आतंकवाद को लेकर संजीदा नहीं है तो इस तरह की सूचियां हर साल जारी करने का भला क्या औचित्य है। सुरक्षा परिषद में चीन जैसा देश भी स्थायी सदस्य है, जो आतंकवाद आतंकवाद में फर्क करता आया है। जब भी भारत विभिन्न मंचों पर पाकिस्तान से संचालित आतंकी समूहों के सरगनाओं के खिलाफ पाबंदी की मांग करता है, चीन उनकी ढाल बनकर खड़ा हो जाता है।

अजहर मसूद का मसला हो या हाफिज सईद का, चीन ने कई बार इन्हें बचाने के लिए प्रस्तावों का विरोध किया है और अकेले चीन ही नहीं, दुनिया के कई देश खुलकर आतंकी समूहों का वित्त पोषण करते हुए देखे जा सकते हैं। मानवता को कलंकित करने वाले आतंकवादी किस तरह पाकिस्तान सहित कई देशों में हर तरह का संरक्षण प्राप्त कर रहे हैं, यह अब किसी से छिपा हुआ नहीं है।

पाकिस्तान के हुक्मरान ओसामा बिन लादेन को लेकर बरसों तक पूरी दुनिया के सामने झूठ बोलते रहे परंतु बराक ओबामा की सेना ने उसे पाकिस्तान के सैन्य क्षेत्र एबटाबाद में ढूंढ निकाला और खत्म कर दिया। इसी प्रकार पाकिस्तान दाऊद इब्राहिम को लेकर पूरे विश्व को भ्रमित करता आ रहा है। पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ ने सूची जारी करते हुए स्वीकार किया है कि दाऊद के पास न केवल कई पाकिस्तानी पासपोर्ट हैं, बल्कि वह कराची में शानदार बंगले में रहता है।

यदि यूएन को इसकी जानकारी है तो वह दाऊद के खिलाफ कार्रवाई के लिए आखिर पाकिस्तान को क्यों नहीं कह रहा है। हाफिज सईद को भी यूएन ने 139 आतंकियों की सूची में शामिल किया है, जो पहले ही अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जा चुका है, परंतु उसके खिलाफ भी कोई सख्त कदम आज तक नहीं उठाया गया है। वह खुलेआम पाकिस्तान में घूमता है। सभाएं करता है। भारत और अमेरिका के खिलाफ आग उगलता है।

वहां की अदालतें उसे सहज रूप से जमानत देती हैं और उसे आसानी से नजरबंदी के नाटक से मुक्ति मिल जाती है। अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान के असली खेल को समझ चुके हैं। यही कारण है कि अमेरिका ने उस पर कई तरह की पाबंदियां भी लगाई हैं, परंतु इससे क्या हासिल होने वाला है? क्या पाकिस्तान की सेहत पर इस सबसे कभी कोई असर पड़ा है। वह कश्मीर ही नहीं, अफगानिस्तान में भी खुलेआम आतंकवादी समूहों को भेजकर खून खराबा करवा रहा है।

तालिबान के हक्कानी गुट को पनाह देने के बावजूद वह बरसों से अमेरिका की आंखों में धूल झोंकता आया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को यदि अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है तो उसे सूची जारी करते रहने की औपचारिकता से बाहर आकर ऐसे देशों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी, जो दबे-छिपे नहीं, खुलेआम आतंकवादियों की मदद कर दुनिया को नर्क बनाने पर तुले हुए हैं। अब ऐसे देशों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का वक्त आ गया है, जो अपने हितों को साधने के लिए आतंकवाद को एक अस्त्र के तौर पर बेशर्मी के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं।

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