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एकजुटता से देना होगा काबुल हमले का जवाब

भारत की तरह अफगानिस्तान भी आतंकवाद से पीड़ित रहा है।

एकजुटता से देना होगा काबुल हमले का जवाब

भारत की तरह अफगानिस्तान भी आतंकवाद से पीड़ित रहा है। अफगानिस्तान न केवल पड़ोसी देश पाकिस्तान के आतंकवाद से पीड़ित रहा है, बल्कि अमेरिका और रूस की कूटनीतिक जंग के चलते अपने ही मुल्क के दहशतगर्द से पीड़ित रहा है। अमेरिकी वर्चस्व की लड़ाई में अफगानिस्तान आतंकवाद के चलते कई बार तबाह हुआ है।

अब जबकि सात-आठ साल से अफगानिस्तान शांति की ओर लौट रहा है, नव निर्माण के दौर से गुजर रहा है, अवाम तरक्की की ओर बढ़ रहा है, तो एक बार फिर आतंकवाद सिर उठा रहा है। दरअसल, यहां मुख्य रूप से चार आतंकी नेटवर्क मुख्य रूप से सक्रिय है।

तालिबान, अलकायदा, आईएस व हक्कानी नेटवर्क। तालिबान बहुत पहले से है। रूस को मात देने के लिए अमेरिका ने कथित रूप से तालिबान को खड़ा किया था। अफगानिस्तान से रूस के पीछे हट जाने के बाद अमेरिका ने भी कई वर्ष पहले ही तालिबान को खाद-पानी देना बंद कर दिया।

अमेरिकी छत्रछाया में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तालिबान सत्ता का स्वाद भी चख चुका है। अब तालिबान अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। आतंकी गुट अलकायदा का केंद्र भी अफगानिस्तान रहा है, ओसामा बिन लादेन ने अलकायदा का गठन किया था और तोरा-बोरा की पहाड़ी को ठिकाना बनाया था।

ओसामा के मारे जाने के बाद अलकायदा कमजोर पड़ चुका है। हाल में सीरिया व इराक में इस्लामिक स्टेट के पांव उखड़ने के बाद वह भी अफगानिस्तान में अपनी दहशत का नया ठिकाना बनाना चाहता है। पाकिस्तान द्वारा अफगान सीमा पर पोषित आतंकी गुट हक्कानी नेटवर्क भी अफगानिस्तान में हमले करता रहा है।

ये सभी आतंकी गुट अफगानिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान, सैन्य केंद्र, पुलिस केंद्र, राजनयिक क्षेत्र, अस्पताल, विदेशी प्रोजेक्ट आदि जगहों पर हमला करते रहे हैं, ताकि सरकार को कमजोर किया जा सके। ताजा आतंकी हमला काबुल में भारतीय दूतावास के पास हुआ है, जिसमें अस्सी लोग मारे गए हैं।

अफगान सरकार को इस आतंकी हमले से अफगानिस्तान को लहूलुहान करने में तालिबान के हाथ का शक है। दरअसल कुछ दिन पहले ही तालिबान ने बड़े आत्मघाती आतंकी हमले की धमकी दी थी। यह पहला मौका नहीं है जब आतंकियों ने बेकसूरों को निशाना बनाया है। इससे पहले 8 मार्च को अफगानिस्तान के सबसे बड़े सैन्य अस्पताल पर डॉक्टरों की भेष में आतंकवादियों ने हमला कर दिया था। 49 लोगों की मौत हुई थी।

काबुल में पिछले दो वर्षों में कई बड़े विस्फोट हो चुके हैं। इसी साल 10 जनवरी को अफगान संसद के पास हुए दोहरे आत्मघाती हमले में 30 लोगों से अधिक की मौत हुई थी। 2016 में 21 नवंबर को काबुल में शिया मस्जिद में आत्मघाती हमला हुआ था, 30 लोग मारे गए थे। 5 सितंबर को रक्षा मंत्रालय के नजदीक दोहरे आत्मघाती हमले में 41 से भी अधिक लोगों की जान गई थी।

23 जुलाई को आतंकी हमले में 90 लोगों की मौत हुई थी। 19 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय के पर हमले में 70 लोगों मारे गए थे। एक फरवरी को काबुल पुलिस कॉम्प्लेक्स के पास हुए विस्फोट में 20 पुलिस अधिकारियों की जान गई थी। यह हमला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सऊदी अरब यात्रा के कुछ ही दिनों बाद हुआ है।

इस यात्रा के दौरान ट्रंप ने 50 से अधिक मुस्लिम देशों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया था और इस दौरान उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक लड़ाई का आह्वान किया था।

इस सम्मेलन में अफगानिस्तान ने भी भाग लिया था। इसका अर्थ है कि तालिबान ने एक तरह से अमेरिका को संदेश दिया है कि हम रुकने वाले नहीं हैं। फिलहाल संयुक्त राष्ट्र को ग्लोबल आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई तत्काल शुरू करनी चाहिए, हालांकि यूएन से दुनिया को उम्मीदें कम है।

अच्छा होगा यूएन के सभी सदस्य देश एकजुट होकर लड़ें। कम से कम सभी मुस्लिम देशों को बातों से आगे निकलकर पश्चिम व दक्षिण एशिया से आतंकवाद के सफाये के लिए सामूहिक जंग तत्काल शुरू करनी चाहिए। इसमें सऊदी अरब को मुख्य भूमिका निभानी चाहिए, क्याेंकि उसने आतंकवाद के खिलाफ 32 मुस्लिम देशों का मंच भी बनाया है।

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