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अधिकारों के लिए जूझतेे दलितों- आदिवासियों के पक्ष में बुद्धिजीवियों का समूह जीवित है

पता नहीं इस मुहावरे का क्या अर्थ है नक्कारखाने में तूती की आवाज। लेकिन अर्थ सबको मालूम है। ऐसी ही एक घटना पिछले दिनों हो गई है। नागरिक अधिकारों के लिए जूझतेे दलितों, आदिवासियों,वंचितों के पक्ष में संघर्ष करने वाले वाले बुद्धिजीवियों का एक समूह देश में जीवित है।

अधिकारों के लिए जूझतेे दलितों- आदिवासियों के पक्ष में बुद्धिजीवियों का समूह जीवित है
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पता नहीं इस मुहावरे का क्या अर्थ है नक्कारखाने में तूती की आवाज। लेकिन अर्थ सबको मालूम है। ऐसी ही एक घटना पिछले दिनों हो गई है। नागरिक अधिकारों के लिए जूझतेे दलितों, आदिवासियों,वंचितों के पक्ष में संघर्ष करने वाले वाले बुद्धिजीवियों का एक समूह देश में जीवित है। वह समझौतापरक नहीं है। असहिष्णु हो सकता है ।उसके पास शब्दों की चीरफाड़ के तर्क को समझने की बुद्धि है।

वह संविधान को पढ़ चुका है। देश के कानूनों से परिचित है। उसके लिए दुनिया सिमट रही है। वह संसार के संचार माध्यमों से वाकिफ है। वह अध्यवसायी रूमान के हिंडोले पर भी चढ़ जाता है। उसमें से मुट्ठी भर लोग अंगरेजी बुद्धिराज की भारतीय पुलिस के महाराष्ट्रीय संस्करण द्वारा धर लिए गए हैं। देश में नक्सलवाद नाम का फेनोमेना तो है। सघन भी है।

केन्द्र और प्रभावित राज्य सरकारें नक्सलवाद का उन्मूलन नहीं कर पाई हैं। नक्सलियों और सरकार दोनों के शिकार भोले भाले, गरीब, यतीम, अशिक्षित, कुपोषित, शोषित आदिवासी और दलित ज्यादातर हैं। नक्सली सहानुभूति के लायक नहीं हैं। संविधान और सरकार में भरोसा नहीं करते। उन्हे हिंसा में विश्वास है। इसके बावजूद उनकी विचारधारा को असहमति का स्पेस संविधान देता है।

राज्य की व्यवस्था और पुलिस उनके भी साथ जुल्म करे तो उनको न्याय पाने का अधिकार संविधान के तहत है। अभिव्यक्ति की आजादी भी उन्हें संविधान में दी गई है। उसका इस्तेमाल असहमति के जरिए भी हो सकता है।संविधान अपने आदेशों के खिलाफ आचरण की लेकिन मनाही करता है। अन्यथा खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही भी होगी। सरकार,संसद और समाज तटस्थ,उदासीन,लाचार उपस्थिति नही हैं।

ऐसे माहौल में कोई समूह,संस्था या व्यक्ति पीड़ित नागरिक अधिकारों की पैरवी करे। तो उसे देशद्रोही, राष्ट्रद्रोही, समाजद्रोही, राजद्रोही जैसी फब्तियों से नवाजा नहीं जा सकता। संविधान की आयतों, अधिनियम के प्रावधानों और नियमों के आदेशों को मानने के राजपथ के बीच बीच असहमति के अराजक जनपथ भी संविधान सम्मत होते हैं। गरीबी के रेवड़ में फंसे लोग मौत के दलदल में धंस रहे हैं।

नारा लग रहा है ‘अच्छे दिन आने वाले हैं।‘ बाबा साहेब अंबेडकर के शब्दों में मोरियों से बजबजाते गांव नाबदान में तब्दील हो रहे हैं। अट्टाहस स्मार्ट सिटी का हो रहा है। हजारों गांव सड़क,पुल, नदी की सुविधाओं से जुडे़ नहीं हैं। शोर है बुलेट टे्न आ रही है। बेरोजगार नौजवान शोहदों, लफंगों, अपराधियों में तब्दील हो रहे हैं। सरकार टर्रा रही है पकौड़े बेचना भी रोजगार है। गंगा गटर में बदल रही है।

गाय को बीफ बनाया जा रहा है। देश कारपोरेट के पक्ष में गिरवी हो रहा है। सबका साथ सबका विकास दम तोड़ रहा है। राजनेता बलात्कार, माॅब् लिंचिंग,कालेधन की वापसी, दलबदल, अश्लील हरकतों का जंगल उगा रहे हैं। उसके बाद भी आम आदमी के पक्ोई बोले तो वह गिरफ्तार हो। करीब सालभर पहले की घटना की जांच करते करते धीरे धीरे कुछ ईमेल या कथित असावधान चिट्ठियों पर या बातचीत में प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का आरोप है।

साजिश में तक्षक नाग होता है। वह अजगर की तरह गलतफहमी की सड़क पर नहीं रेंगता। 2019 का चुनाव आने वाला है। इंदिरा गांधी, महात्मा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के पहले किसी को पता तक नहीं चला। यही खुफिया एजेंसियां उस समय भी थीं। प्रधानमंत्री को सहानुभूति के केंद्र में धकेलने के लिए भुलाई जा रही घटना का धुआंधार प्रचार मीडिया कर रहा है।

कहां लिखा है दंड प्रक्रिया संहिता में कि पुलिस की पूरी जांच की गोपनीय कार्रवाई टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित की जाएगी। यह तो कानून का अपमान है बल्कि उसकी अवमानना है। एक शब्द गढ़ा गया है अर्बन नक्सल याने षहरी नक्सली । छोटे शहरों, गांवो में नक्सल , फिर शहरी नक्सल , तो क्या दिल्ली मुंबई, बैंगलोर कोलकाता, चेन्नई में मेट्रोपोलिटन नक्सल।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है। कानून में लिखा है पुलिसिया कार्रवाई अपराध के मामले में पारदर्शी तो होगी लेकिन गोपनीय होगी। संभावित हत्या के आरोप से सहानुभूति उपजाते राजनीतिक वितंडावाद खड़ा किया जा रहा है। पुलिस की जांच के दस्तावेज खबरिया चैनल दिखा रहे हैं। ये पैरोकार हिंदुस्तान की समझ और इतिहास को लिखने वाले कलमकार हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी के इजलास में पुलिस कई बार राजनीतिक आकाओं के कारण अभियुक्त के कटघरे में खड़ी की जाती है। मंत्री और नेता जनता के लोकतांत्रिक आचरण के समीक्षक नहीं है। ठीक इसका उल्टा तो सही हो सकता है कि जनता इन्हें जांचे। पुलिस की जांच की पारदर्शी लेकिन गोपनीय हो तो आरोप की विश्वनीयता पर सवाल उठाना मुश्किल भी हो जाता है।

भविष्य की पीढ़ियो को ऐसा हिंदुस्तान देकर जाएंगे? देष की सियासत के नये ट्रेंड में पुलिस को राजनीतिक मकसद के लिए इस्तेमाल पहले ही शुरू हो चुका है। सीबीआई किसी नेता के खिलाफ भी केस कर दे तो झूठा हो जाता है। देश पुलिस और सीबीआई जैसी संस्थाओं के बल पर सियासत संभाल रहा है। जिन नेताओं को पकड़ा गया वे बुद्धिजीवी हैं। उनके हाथों में बंदूक तमंचा नहीं है।

उनकी जेब में बम नहीं है। कलम के साथ जीवित हैं। कलम की ताकत है। सत्ता कभी किसी के साथ नहीं होती। उसकी गति वर्तुल यानी गोल होती है। नेता यदि आरोप की एक उंगली किसी की ओर उठाते हैं तो कुदरत तीन उंगली उनकी ओर उठ जाती हैं। देश में हिंसा फैलाई जा रही है जानबूझकर। नक्सलवादी तो फैला ही रहे हैं। आतंकवादी भी यही करते हैं। सरकारों को चाहिए कि अहिंसा का आचरण करें।

रोकथाम करें हिंसा की। सरकारों, सरकारी प्रबंधकों, और इंतजाम करने वालों को उत्तेजित होने की जरूरत नहीं है। हिंसक भाषा में भाषण देते हैं और जिस कुर्सी पर बैठे है उन्हें इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने की संविधान इजाजत नहीं देता। इतिहास खलनायकों का गुलाम नहीं होता। यह बात सबको मालूम होनी चाहिए। लोकतंत्र को बरबाद करने की वही संस्था आज है जो आजादी के संघर्ष में भागीदार होने के कारण चौथा स्तंभ के नाम से मशहूर है।

लोकतंत्र में सरकार की ठसक को संविधान की आत्मा नहीं कहते ।सरकारें संविधान के हुक्म से चलती हैं। देश सरकारों की जागीर नहीं है। संविधान, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की जागीर नहीं है । इस देश में कोई सार्वभौम नहीं है। न प्रधानमंत्री, न राष्ट्रपति न सरकार, न संसद, न खुद संविधान।

देश में सार्वभौम कोई है तो हम भारत के 125 करोड़ लोग। हमने अपना संविधान अपने आप को दिया है ।आज उनकी हैसियत चींटी के बराबर की जा रही है। उसे मसला जा रहा है। देश, संविधान और इतिहास कैसे बर्दाश्त करेंगे। संविधान मनुष्य की आत्मा के साथ है। लोकतंत्र जनता के लिए है। जनता की ताकत सबसे बड़ी है।

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