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शिक्षक दिवस 2018: गुरु की महिमा का बखान

भारत में सदियों से गुरु परंपरा समाज और देश का मार्गदर्शन करती रही है। अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्हें संवारने और उनके जीवन को नई दिशा देने में उनके गुरुओं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही। बदलते समय में गुरु परंपरा और शिक्षक-शिक्षण का स्वरूप भले ही बदल गया है लेकिन सभ्य समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में शिक्षक की भूमिका आज भी उतनी ही मूल्यवान है।

शिक्षक दिवस 2018: गुरु की महिमा का बखान
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आज के दौर में शिक्षण को एक व्यवसाय मान लिया गया है लेकिन गहरे अर्थों में देखें तो यह केवल व्यवसाय नहीं है। एक शिक्षक अपने शिक्षण द्वारा पूरे समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। हमारे भीतर सामाजिक एवं नैतिक मूल्य रोपता है और इस तरह सुसंस्कृत समाज और सशक्त राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यही कारण है कि शिक्षकों को राष्ट्रनिर्माता भी कहा जाता है। शिक्षकों के इसी योगदान को याद करने के लिए हम हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाते हैं। यह दिन हमारे देश के महान शिक्षाविद और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन होता है। उन्हीं की इच्छानुसार उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

गुरु की अवधारणा

गुरु की महिमा का बखान लगभग हर धर्म के ग्रंथों और शास्त्रों में किया गया है। ईश्वर को लेकर भले ही हमारी मान्यताओं में विभिन्नता हो लेकिन गुरु के प्रति सम्मान एक जैसा है, ‘हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला या अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाला।’ प्राचीन गुरुकुल परंपराओं में गुरुओं ने न सिर्फ मौलिक ज्ञान प्रसारित किया बल्कि अपने शिष्यों और समाज के लिए नैतिकता की मिसाल भी बने। उन्होंने अपने शिष्यों को ज्ञानवान होने के साथ ही चरित्रवान इंसान बनने को भी प्रेरित किया। प्राचीन ग्रंथों में देखें तो पता चलता है कि विद्यार्थियों को गुरुकुल में जाकर या गुरु के आश्रम में रहकर विद्या अध्ययन करना पड़ता था। राजा और प्रजा सभी की संतानें एक स्थान पर एक ही परिवेश में विद्या अर्जन करती थीं। इस तरह की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य यही था कि सभी बालकों को बिना भेदभाव भविष्य में हर परिस्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह सक्षम बनाया जा सके।

गुरु की महत्ता

हमारे देश में प्राचीन काल में शिक्षक, गुरु ही कहे जाते थे, जो अपने गुरुकुल में शिक्षा प्रदान करते थे। वह समय चक्रवर्ती राजाओं और एक से बढ़कर एक महान दार्शनिकों और योगियों का था। इतिहास गवाह है कि अधिकतर राजाओं के शासन की दिशा और दशा को तय करने में किसी न किसी महान गुरु का मार्गदर्शन रहता था। संत और योगियों, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और इसके अक्षुण्ण मूल्यों को पूरे विश्व में फैलाकर भारत को आध्यात्मिक गुरु होने का दर्जा दिलाया, उन्हें महान बनाने के पीछे भी किसी न किसी गुरु की भूमिका रही है। जिनको गुरु से ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ, उन्होंने भी किसी को प्रतीकात्मक रूप में गुरु मानकर ज्ञान अर्जित किया, ऐसे भी कई उदाहरण मौजूद हैं।

महान गुरुओं के प्रसिद्ध शिष्य

(इसे अलग से प्ले कर सकते हैं)

माना जाता है कि अगर आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त को विवेकपूर्ण बुद्धि, शासन कौशल और राजनीति की शिक्षा नहीं दी होती तो भारत का इतिहास एक चक्रवर्ती राजा से वंचित रह जाता। एक भारत की सर्वप्रथम आधारशिला रखने का श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को ही जाता है लेकिन इसकी भूमिका तैयार करने में उनके गुरु चाणक्य का सबसे अहम योगदान रहा। चाणक्य ने अगर चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बनाकर समस्त विद्याओं में दक्ष नहीं किया होता तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता। महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को एक श्रेष्ठ धनुर्धारी बनाया। उन्हीं गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण न कर पाने पर एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा को ही साक्षात गुरु मानकर अर्जुन से भी अधिक दक्षता हासिल कर ली। रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद के रूप में दुनिया को एक महान मानवतावादी योगी दिया। स्वामी विवेकानंद स्वयं महान योगी और ज्ञानी थे फिर भी यह कहने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं था कि मैं जो भी करता हूं, कहता हूं, वह सब मेरे गुरु का दिया हुआ है। इसी तरह ब्रिटिश गणितज्ञ जी. एच. हार्डी ने अपने बहुमूल्य कार्यों के बावजूद भारतीय गणितज्ञ रामानुजन को अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया, उन्हें गुरुतुल्य माना। विश्व इतिहास में देखें तो सुकरात, प्लेटो और अरस्तु के रूप में दुनिया को तीन महान गुरु मिले। प्लेटो, सुकरात के शिष्य थे। सुकरात ने अपने दर्शन को कहीं लिखा नहीं था लेकिन उनके शिष्य प्लेटो ने उनकी शिक्षाओं को आगे बढ़ाया। इसी तरह प्लेटो के शिष्य अरस्तु ने अपने गुरु के ज्ञान और संदेश को आगे बढ़ाया। अरस्तु ने भौतिकी, अध्यात्म, कविता, नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, जीव विज्ञान सहित कई विषयों पर महत्वपूर्ण रचनाएं कीं।

देते हैं जीवन को दिशा

गुरु जीवन को नई दिशा प्रदान करता है। माता-पिता भले ही हमारे पहले शिक्षक हों लेकिन जीवन की वास्तविक और कठिन परीक्षा के लिए हमारे गुरु ही हमें तैयार करते हैं। जीवन जीने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। हमारे भीतर साहस, हौसला, धैर्य, नैतिकता, करुणा जैसे मानवीय गुण भी होने आवश्यक हैं और ये सारे गुण एक सच्चा गुरु ही हमारे भीतर भर सकता है। दरअसल, इन गुणों के साथ होने पर ही विद्यालय में अर्जित किताबी ज्ञान का उपयोग किया जा सकता है। कई बार विद्यार्थी अपनी असफलता से निराश हो जाते हैं और गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। ऐसी असफलताओं से निराश न होने का सबक हमें गुरु ही सिखाता है। इस तरह गुरु हमारे जीवन में सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।

ईश्वर के समतुल्य

हमारी प्राचीन भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वरतुल्य माना गया है, इसीलिए उनके द्वारा दिए जाने वाले ज्ञान को सबसे मूल्यवान माना जाता है। यहां तक कि गुरु को ईश्वर तक पहुंचने का साधन माना गया है। इसीलिए उन्हें त्रिदेव ब्रम्हा, विष्णु और महेश के समान प्रतिष्ठा प्राप्त है।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

ज्ञानाश्रयी शाखा के महान कवि कबीर ने भी गुरु को सर्वोपरि माना इसीलिए गुरु और गोविंद दोनों के एक साथ उपस्थित होने पर पहले गुरु के चरण स्पर्श को वरीयता दी।

शिक्षक के अनेक रूप

गुरु की परंपरागत अवधारणा से अलग भी शिक्षक के कई रूप होते हैं। हम अपने जीवन में इनके विभिन्न रूपों से मिलते हैं। भले ही ये रूप गुरु की परिभाषा के दायरे में नहीं आते लेकिन जीवन की कोई शिक्षा या ज्ञान अगर किसी से सीखने को मिलता है तो वह भी शिक्षक की श्रेणी में ही आ जाता है। हमारे माता-पिता, भाई, बंधु, रिश्तेदार जिनसे मिलकर या बिना मिले हमने कुछ सीखा, प्राप्त किया है तो वे भी शिक्षक कहे जाने के हकदार हैं। हमारे सच्चे मित्र कई बार जीवन के कठिन फैसले लेने में हमारी मदद करते हैं, राह दिखाते हैं या सुझाव देते हैं तो वे भी शिक्षक के ही एक रूप हुए। किसी के द्वारा कही गई या लिखी गई प्रेरक बात को पढ़कर यदि हम जीवन में आगे बढ़ने की ऊर्जा से भर जाते हैं तो वे भी हमारे लिए अप्रत्यक्ष शिक्षक ही हुए।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हर इंसान को आगे बढ़ने और महान बनने के लिए किसी न किसी रूप में गुरु की आवश्यकता होती है और आज के समय में इनकी महत्ता और भी बढ़ गई है।

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