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डा. मोनिका शर्मा का लेख : वैश्विक शांति के तालिबानी खतरे

वैश्विक स्तर पर होने वाली उथल-पुथल, अशांति और असहयोग की स्थितियां सभी देशों को प्रभावित करती हैं। चिंतनीय है आज कमोबेश दुनिया के हर हिस्से में आतंक और हिंसा की गतिविधियाँ जारी हैं। इतना ही नहीं वैश्विक गुटबाजी, स्वार्थ साधने की सोच और कट्टरपंथी विचारधारा का दबदबा हर ओर दिख रहा है। हाल में अफगानिस्तान में तालिबान हुकूमत का बनना वैश्विक शांति के लिए खतरे की नई घंटी है। तालिबान सरकार के मुद्दे पर जिस तरह दुनिया में शक्ति विभाजन दिख रहा है, वह आने वाले वक्त में शांति के लिए कांटे बनेंगे। संयुक्त राष्ट्र जिस तरह तालिबान के सत्ता में आने को मूकदर्शक बनकर देखता रहा, ऐसे में यूएन की सार्थकता पर चिंतन जरूरी है।

डा. मोनिका शर्मा का लेख :  वैश्विक शांति के तालिबानी खतरे
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डा. मोनिका शर्मा

जीवन के हर मोर्चे पर मानव समुदाय की बेहतरी, सुरक्षा और प्रगति के लिए शांति, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व के भाव से परिपूर्ण परिवेश जरूरी है। वैश्विक स्तर पर होने वाली उथल-पुथल, अशांति और असहयोग की स्थितियां सभी देशों को सामाजिक, आर्थिक और सामरिक पहलुओं पर गहराई से प्रभावित करती हैं। ये स्थितियां उन्नति में बाधा बनती हैं, सद्भाव की सोच व सामुदायिक जुड़ाव को हानि पहुँचाती हैं। चिंतनीय है आज कमोबेश दुनिया के हर हिस्से में आतंक और हिंसा की गतिविधियाँ जारी हैं। इतना ही नहीं वैश्विक गुटबाजी, स्वार्थ साधने की सोच और कट्टरपंथी विचारधारा का दबदबा हर ओर दिख रहा है। हाल में अफगानिस्तान में तालिबान हुकूमत का बनना वैश्विक शांति के लिए खतरे की नई घंटी है। तालिबान सरकार के मुद्दे पर जिस तरह दुनिया में शक्ति विभाजन दिख रहा है, वह वैश्विक शांति के लिए कांटे बनेंगे। विश्व शांति दिवस मनाने वाला संयुक्त राष्ट्र जिस तरह तालिबान के सत्ता में आने को मूकदर्शक बनकर देखता रहा, वैश्विक आतंकवाद को रोकने की दिशा में ठोस कुछ नहीं कर सका है, यहां तक कि अब तक आतंकवाद को परिभाषित तक नहीं कर सका है, राष्ट्रों के बीच जारी सीमा विवादों से लेकर क्षेत्र को लेकर विवादों को वह नहीं सुलझा सका है, वैश्विक गुटबाजी को नहीं रोक सका है, ऐसे में यूएन की प्रासंगिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। विश्व शांति दिवस पर यूएन की सार्थकता पर चिंतन जरूरी है।

दरअसल, दुनियाभर में देशों की विस्तारवादी सोच और अपने हित साधने की रणनीतियों के चलते बरसों से हिंसा और अलगाव की स्थितियाँ बदस्तूर जारी रही हैं। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक स्तर पर शांति और सद्भाव बनाये रखने के उद्देश्य विश्व शांति दिवस मनाया जाता है। इसका ध्येय दुनिया के सभी देशों के बीच युद्ध को रोकने सहस्तित्व के भाव को पोषित करने से जुड़ा है। धरती पर शांति और अहिंसा को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1982 से इस विशेष दिवस को मनाने की शुरुआत हुई। साल 2002 में विश्व में शान्ति स्थापित करने को समर्पित इस दिन को संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर वर्ष 21 सितम्बर को मनाने की घोषणा की गई। गौरतलब है कि 1982 में पहली बार मनाये गए विश्व शांति दिवस की विषय 'लोगों का शांति का अधिकार' थी।

हर साल मानवीय कल्याण के भाव से जुड़े एक विशेष मुद्दे या विषय से जोड़कर यह दिन मनाया जाता है। साल 2021 में कोविड-19 की आपदा से बाहर आ रही दुनिया के लिए यह दिन न्यायसंगत और दीर्घकालिक रूप से भविष्य की बेहतरी के प्रयास करने से जुड़ा है। इस साल यह दिन समानता, न्याय और समावेशी विकास के लिए स्वस्थ समाज बनाने की सोच और जन-जागरुकता के मानवीय उद्देश्य को संबोधित है। कोरोना की विपदा से जूझकर निकल रहे वैश्विक समाज के लिए रचनात्मक और सामूहिक रूप से सोचने का सन्देश लिए है। यह जरूरी भी क्योंकि कोरोना महामारी ने संसार भर की बड़ी आबादी के जीवन के हर पहलू पर दुष्प्रभाव डाला है।

स्वास्थ्य से जुड़ी इस वैश्विक विपत्ति के बाद बढ़ी आर्थिक असमानता, विस्थापन, शिक्षा, बेरोजगारी और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं के बाद दुनिया के सभी देशों का गंभीरता से हर पहलू पर सोचना जरूरी है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने चेताया भी है कि दुनिया भर में कोरोना की महामारी से 2.5 करोड़ लोगों का रोजगार छिन जाएगा। ऐसे में आर्थिक मोर्चे पर मुश्किल हालात बनने से विश्व में अशांति बढ़ेगी। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक वैश्विक स्तर पर एक समन्वित नीति बनाकर काम किया जाय इस हानि को हद तक कम किया जा सकता है।

इस महामारी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी नए संकट खड़े कर दिए हैं। शैक्षणिक परिवेश पर पड़े इस असर से आने वाली पीढ़ी का जीवन भी अछूता नहीं रहेगा। ह्यूमन राइट्स वॉच की हालिया रिपोर्ट में सरकारों को कोविड-19 महामारी के कारण पैदा हुए बड़े व्यवधान के कारण बच्चों की शिक्षा के नुकसान की भरपाई के लिए तुरंत कदम उठाने को कहा गया है। गौरतलब है कि वक्त वर्षों तक उनकी प्रतीक्षा नहीं करता - कोविड-19 महामारी के कारण बच्चों के शिक्षा के अधिकार में असमानता में वृद्धि नाम से आई यह रिपोर्ट कोविड-19 के कारण स्कूलों के बंद होने से बच्चों पर पड़े असमान प्रभाव की बात करती है | पेंडेमिक में सभी बच्चों के पास पढ़ाई के लिए जरूरी अवसर, साधन या पहुंच नहीं होने और ऑनलाइन शिक्षा पर निर्भरता से शिक्षा संबंधी सहायता के मौजूदा असमान वितरण में इजाफा हुआ है। साथ ही सामाजिक-पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी दुनिया के हर हिस्से में बढ़ी ही हैं।

व्यापक रूप से देखा जाय तो इन बदले हुए हालातों से पूरी तरह से उबरने के लिए सभी देशों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलकर प्रयास करने होंगे। मौजूदा दौर में जब सामाजिक समरसता का भाव दुनिया के हर कोने से रिस रहा है, सह-अस्तित्व और शान्ति के भाव को पोषित करने वाली सोच को बल देना जरूरी भी है। समझना मुश्किल नहीं कि यह विश्व पटल पर सुरक्षित, सहयोगी, शांत और सामंजस्यपूर्ण परिवेश बनाने से ही सम्भव है। वैश्विक स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, समानता, सुरक्षा और न्याय जैसे जनकल्याण से जुड़े मामलों में साझा प्रयास ही सार्थक परिणाम दिला सकते हैं।

सुखद है कि 'वसुधैव कुटम्बकम' की संस्कृति वाला भारत हमेशा से ही अन्य देशों के साथ मैत्री और समानता का व्यवहार रखने का समर्थक रहा है। भगवान बुद्ध के सत्य, अहिंसा और शांति के संदेश दुनिया के लिए आज भी उतने ही प्रेरक हैं। विश्व को शांति का सन्देश देने महात्मा गाँधी के विचार आज भी हमारे लिए प्रेरणादायी हैं। आज के समय में भी बापू के अहिंसावादी विचार देश ही नहीं पूरे विश्व को दिशा देने वाले हैं। भारत की सहयोगी और मानवीय सोच दुनिया ने इस विपदा में भी देखी है। कोरोना आपदा से जूझते हुए हमारे देश ने वैश्विक समुदाय में एक मददगार देश के रूप में अपनी छवि बनाई है। हर परिस्थिति में शान्ति, सहयोग और सामंजस्य के भाव को बनाये रखने का आदर्श प्रस्तुत किया है।

विचारणीय है कि कोरोना महामारी ने वैश्विक समाज को एकजुट होकर जनकल्याण के लिए काम करने का पाठ पढ़ाया है। वैश्विक स्तर पर शांति एवं सुरक्षा कायम रखने, मानवाधिकारों की रक्षा करने, बुनियादी जरूरतों से जुड़ी सहायता पहुँचाने, न्यायिक समानता लाने और सतत् विकास को बढ़ावा देने के लिए सहयोगी परिवेश कायम रखने की सीख दी है। अनिश्चितता भरे जीवन में हिंसक गतिविधियों के बजाय शान्ति और सद्भाव स्थापित करने की कोशिशों के मायने समझाए हैं, जो कि शांतिपूर्ण परिवेश में ही संभव है। साथ ही तालिबान केवल एक आतंकी गुट नहीं है, बल्कि वह एक कट्टर इस्लामिक सोच है, जिसके सत्तासीन होने से वैश्विक शांति पर खतरा उत्पन्न हुआ है। आज समूचे विश्व को आतंकवाद, जातीय िहंसा और क्षेत्रीय टकराव से मुक्त किए बिना विश्व में शांति स्थापित करना संभव नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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