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सात सालों से गृहयुद्ध झेल रहे सीरिया को बख्श दो

सात सालों से गृहयुद्ध झेल रहे सीरिया को लेकर रूस व अमेरिका के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। यह अमेरिका द्वारा ब्रिटेन व फ्रांस के साथ मिलकर सीरिया के कई सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें बरसाने से हुआ है। अब रूस के साथ मिलकर सीरिया रासायनिक हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रहा है और उसकी सरकारी सेना ने संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव की अवज्ञा कर डूमा में विद्रोहियों पर हमले किए हैं।

सात सालों से गृहयुद्ध झेल रहे सीरिया को बख्श दो
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सात सालों से गृहयुद्ध झेल रहे सीरिया को लेकर रूस व अमेरिका के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। यह अमेरिका द्वारा ब्रिटेन व फ्रांस के साथ मिलकर सीरिया के कई सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें बरसाने से हुआ है। अब रूस के साथ मिलकर सीरिया रासायनिक हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रहा है और उसकी सरकारी सेना ने संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव की अवज्ञा कर डूमा में विद्रोहियों पर हमले किए हैं।

दरअस्ल, अमेरिका को दुनिया भर में लोकतंत्र व मानवाधिकारों का स्वयंभू खिदमतगार मानने का पुराना रोग है। जब भी उसका यह रोग बढ़ता है, वह संयुक्त राष्ट्र तक को ठेंगे पर धर देता है। इसीलिए वह कितना भी कहे कि उसका हमला सीरिया की बशर अल असद सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संघर्ष विराम प्रस्ताव के उल्लंघन करने और युद्धग्रस्त इलाकों में खाद्य व मेडिकल सुविधाएं मुहैया कराने में बाधा डालने के खिलाफ है।

निष्पक्ष प्रेक्षक इसे उसकी स्वार्थांधता से ही जोड़ रहे हैं। जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दावा कर रहे हैं कि हमले का मिशन पूरा कर लिया गया है, लेकिन वे प्रेक्षकों के अंदेशों व संदेहों का निवारण नहीं कर पा रहे जो इसे तीसरे विश्वयुद्ध की आहट से कम नहीं मान रहे हैं। इस आहट को यों भी सुना-समझा जा सकता है कि ट्रंप राष्ट्रपति बने, तो रूसी राष्ट्रपति पुतिन के गहरे दोस्त थे।

लेकिन सीरिया को लेकर ट्रम्प के रवैये ने न केवल इस दोस्ती को तोड़ डाला, बल्कि दुनिया की महाशक्तियों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। संयम के बावजूद रूस ने यह कहने में देरी नहीं की है कि हमले की पुनरावृत्ति हुई तो दुनिया भर में बवाल मच जायेगा। चीन और ईरान ने भी इस हमले को सुरक्षा परिषद के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया है। याद रखना चाहिए कि न तो यह अमेरिकी दुस्साहस नया है और न उसका रासायनिक हथियारों वाला बहाना।

वह पिछले साल भी सीरिया में मिसाइल हमले कर चुका है और 2003 में उसने इराक पर बिल्कुल ऐसे ही युद्ध थोपा था। यह कहकर कि उसके शासक सद्दाम हुसैन ने भयानक संहार करने वाले हथियारों के जखीरे एकत्र कर रखे हैं। इराक को मटियामेट करके भी वह वहां ऐसे जखीरे को प्रमाणित नहीं कर सका। फिर भी उसने अपना रास्ता नहीं ही बदला है। अभी पिछले दिनों उसने उत्तर कोरिया को ऐसी तबाही की धमकी दी थी, जैसी दुनिया ने कभी नहीं देखी।

वह तो वहां फांस कुछ ऐसी थी कि शीघ्र ही उसे समझ आ गयी कि अपनी धमकी को अमल में लाने का दुस्साहस उसे भारी पड़ सकता है, क्योंकि उत्तर कोरिया सीरिया नहीं है। सीरिया पर हमले में उसे अपने लिए कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष खतरा नजर नहीं आया। पिछली बार के हमलों के वक्त भी सारिया उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया था और उसकी असद सरकार की बाबत छिपा हुआ नहीं है कि वह अपने देश के विद्रोहियों का मुकाबला नहीं कर पा रही और रूस, ईरान और लेबनान के हिजबुल्लाह की मदद लेने को अभिशप्त है।

वर्ष 2011 में सीरिया में बहुचर्चित अरब बसंत 26 जनवरी को हसन अली नामक व्यक्ति के असद सरकार के विरोध में आत्मदाह से आरंभ हुआ था। फिर तो भ्रष्टाचार व बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर असद सरकार के खिलाफ इतना जबरदस्त जनाक्रोश भड़का कि दमिश्क, अलास्का और डेरहामा सेना और प्रदर्शनकारियों में भिडं़त की नौबत आ गई। हालात और बदतर होने पर असद ने अप्रैल, 2011 में इमरजेंसी घोषित कर दी, फिर भी उनके लिए विरोधियों से पार पाना संभव नहीं हुआ। 2012 तक सीरिया गृहयुद्ध में फंस गया और लड़ाई असद व उनके विरोधियों के हाथ से निकल गई।

उसे फंसा पाकर क्षेत्रीय शक्तियों और महाशक्तियों की महत्वाकांक्षा जाग उठी और सीरिया की कमजोरियों का लाभ उठाने की होड़ मच गई। इस होड़ से शुरू हुई जोर-आजमाइश में वहां अब तक पांच लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और कई शहर खंडहरों में बदल गए हैं। हालात ऐसे हैं कि इस वक्त वह रहने के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक जगह है। पिछले दिनों वहां के पूर्वी घोटा क्षेत्र के हमोरिया इलाके से आई एक तस्वीर ने सारी दुनिया को विचलित करके रख दिया था, जिसमें कुपोषण की शिकार एक बच्ची रो भी नहीं पा रही थी, क्योंकि उसके शरीर में रोने भर को शक्ति ही नहीं थी।

बाद में हड्डियों के उस ढांचे ने भूख के कारण दम तोड़ दिया, क्योंकि उसकी दुखियारी मां की छातियों का दूध भी सूख गया था। ऐसे में वक्त, आदमीयत का तकाजा था कि दुनिया की शक्तियां मिल बैठकर सीरिया में शांति बहाली के उपाय तलाशतीं, लेकिन अब अपना वर्चस्व ही अभीष्ट है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि वहां असद सरकार के खिलाफ असंतोष को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ही शह दी। उसको भरोसा था कि चूंकि सीरिया सुन्नी बहुल है और असद शिया हैं इसलिए उनका तख्ता आसानी से पलट दिया जायेगा।

लेकिन असद ने उसे गलत सिद्ध करके दम लिया और अभी तक उसकी आंख का कांटा बने हुए हैं। विडम्बना यह कि पिछले दिनों अमेरिका का चहेता इजराइल भी इस लड़ाई में आ कूदा और सीरिया पर लेबनान युद्ध के बाद का सबसे बड़ा हवाई हमला किया। अमेरिका को सीरिया पर हमले की इतनी जल्दी पड़ गयी कि उसने संयुक्त राष्ट्र की उस टीम के निष्कर्षों का इंतजार भी गवारा नहीं किय, जो वहां जाकर जांच करने वाली थी कि रासायनिक हमले वाकई हुए भी या नहीं। इससे साफ है कि हमले के पीछे की उसकी नीयत बद है और इसका जो भी नतीजा सामने आए उसके लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

साथ ही अमेरिका व रूस समेत सारी बड़ी शक्तियों से कहा जाना *चाहिए कि कम से कम अब वे सीरिया पर रहम करें और उसके लिए कुछ और नहीं कर सकतीं तो उसे उसके हाल पर छोड़ दें। भले ही सीरिया को तेल उत्पादन के लिए नहीं जाना जाता, अरब के तेल उत्पादक देशों में उसकी जो स्थिति है। उसके मद्देनजर इंटरनेशनल ऑयल एजेंसी ने अंदेशा जताया है कि अमेरिकी हमले के बाद हालात बेकाबू हुए तो तेल की आपूर्ति में कमी आयेगी और बाजार में उसकी कीमतें बढ़ेंगी। इस मूल्यवृद्धि का विश्वव्यापी असर होगा और भारत को तो इसकी मार झेलनी पड़ सकती है।

देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। सरकार अगले साल आम चुनावों की तैयारियों में लगी है। इन तैयारियों को झटका लगा तो सरकार को तो खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा। इसके बावजूद सरकार स्थितियों को सही दिशा देने में सक्रिय होने के बजाय चुप रहने में ही भलाई देख रही है।

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