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राष्ट्रवाद और रोजगार के पेंच में फंसा युवा देश!

शिक्षा से हमें विनय मिलता है,विनय से हमें पात्रता मिलती है और पात्रता अनुरूप हमें धन प्राप्त होता है। धन से हमें धर्म की अनुभूति होती है और धर्म हमें सुख प्रदान करता है।

राष्ट्रवाद और रोजगार के पेंच में फंसा युवा देश!
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विद्या ददाति विनयम् विनयाद्याति पात्रताम्

पात्रत्वाद धनमाप्नोति धनाद धर्म तत: सुखम्।।
शिक्षा से हमें विनय मिलता है,विनय से हमें पात्रता मिलती है और पात्रता अनुरूप हमें धन प्राप्त होता है। धन से हमें धर्म की अनुभूति होती है और धर्म हमें सुख प्रदान करता है। शिक्षा के सिद्धांत के विषय में स्वामी विवेकानन्द ने मानव निर्माण, आत्मन्, बौद्धिक क्षमता का सही उपयोग, नैतिक शिक्षा की जो बात कही वह शिक्षा आज केवल डिग्री और दर्जा बढ़ा रही है लेकिन नैतिकता और सभ्यता का ह्रास हो रहा है। जिन शिक्षकों को राष्ट्र-निर्माण करने वाला इंजीनियर माना जाता है, आज वह शिक्षक कम काम करने और छह घंटे की नौकरी के लिए है। कोई बच्चा पढ़े या न पढ़े उनसे कोई मतलब नही है,बस सरकारी नीतियों पर आंख बंद कर अमल कर रहे है।
पिछली सरकार ने भी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का काम किया, प्राइमरी स्कूल में दाखिले के माध्यम से, नो फेल पॉलिसी(पहली से आठवीं कक्षा तक किसी भी विद्धार्थीं को फेल नहीं किया जाएगा) के माध्यम से, मिड डे मील के माध्यम से, ग्रेडिंग सिस्टम व सौ प्रतिशत कट ऑफ निकालने के माध्यम से लेकिन क्या शिक्षा व्यवस्था मे सुधार हुआ? नहीं। सरकार की विभिन्न योजनाएं असफल रही, क्योंकि न तो मिड डे मील उचित रूप में काम कर पाया और न ही नो फेल पॉलिसी और सौ प्रतिशत कट ऑफ। इन सब के कारण बच्चों के माता-पिता के साथ-साथ युवाओं में भी असंतोष और निराशा पैदा हुई है। शिक्षा के गिरते स्तर के कारण डिग्री तो आसानी से मिल जाती है लेकिन जब नौकरी की बात आती है तो यह कह कर रद्द कर दिया जाता है कि आपकी योग्यता तो है लेकिन पात्रता नहीं है। वहीं दूसरी ओर सरकार युवाओं के रोजगार के नए-ऩए अवसर प्रदान करने की सूचनाएं जनहित में जारी करती है लेकिन रोजगार के अवसर सिर्फ सूचनाओं तक सीमित रहती है।
भारत आज युवाओं का देश है। स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। लेकिन युवाओं का यह देश शैक्षिक, समाजिक व सांस्कृतिक रूप से पिछड़ रहा है। इसका मुख्य कारण भारतीय राजनीति पूर्ण रूप से जिम्मेदार है, राजनीति के कारण शिक्षा और विकास के मायने बदल गए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि भारतीय राजनीति तभी सफल हो सकती है जब सुशिक्षा, भोजन और रहने की अच्छी सुविधाएं होंगी। देशभक्ति और राष्ट्रवाद की जो मुहिम स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं के लिए चलाई आज वह क्रिकेट के मैच में ही दिखाई देती है या फिर राजनीतिक दलों के उकसावे में आकर आम लोग की भावनाओं में।
स्वामी विवेकानन्द ने भारत की जिस सांस्कृतिक परम्परा का विचार और उसका विस्तार विश्व भर में फैलाया आज वही भारत अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूलकर पश्चिमी सभ्यता को अपने पर हावी कर रहा है। खाना-पीना, पहनावा, संगीत, सिनेमा आदि पश्चिमी जगत के अनुरूप अपनाने लगे। जिसका विरोध स्वयं गांधी जी भी करते थे लेकिन आज गांधी को मानने वाले स्वदेशी छोड़ विदेशी अपनाने लगे। जिस जातिरहित व वर्गविहीन समाज का सपना स्वामी विवेकानन्द ने देखा वह आज पंगु नज़र आती है, जब खाप किसी जाति आधारित किसी गैर-सरकारी गतिविधियों को अंजाम देता है। और सरकार भी इसमें हस्तक्षेप करने से कतराती है।
पुस्तक बाजार और पुस्तक की दुकानों पर स्वामी विवेकानन्द के पोस्टर आसानी से मिल जाती है। जिस पर उनके विचार या दर्शन की एक दो पंक्तियां लिखी रहती है, जोकि की विद्यार्थी स्वप्रोत्साहन के लिए खरीदते है। एक पोस्टर की पंक्तिया उद्धत करता हूँ:-सब शक्ति तुम में है,तुम कुछ भी और सबकुछ कर सकते हो, इसमें विश्वास करो, यह मत सोचो की तुम कमजोर हो, खड़े हो और बताओं तुम में क्षमता या ईश्वरीय है।
अन्तत: स्वामी विवेकानन्द ने देश के विकास के लिए शिक्षा और युवाओं को मुख्य भूमिका में बताया लेकिन क्या आज भारतीय शिक्षा और युवा देश के विकास मे योगदान दे रहे है? क्या भारतीय राजनीति आम लोगों तक अच्छी शिक्षा, अच्छा भोजन और रहने को घर दे रही है?

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