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सेना पर संदेह शर्मनाक ! पहले इन 'जयचंदों' से निपटो

सुशील राजेश | UPDATED Mar 9 2019 6:59PM IST
सेना पर संदेह शर्मनाक ! पहले इन 'जयचंदों' से निपटो

भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। यह पार्टी के भीतरी सूत्रों का मानना है। राष्ट्रवाद की परिधि में पुलवामा, जैश के कैंपों पर हवाई हमले, पाकिस्तान, मसूद अज़हर और हाफिज सईद सरीखे सभी मुद्दे रहेंगे। राष्ट्रवाद कोई चीज नहीं, कोई घटना या हादसा नहीं, कोई संकल्प या आश्वासन भी नहीं है। राष्ट्रवाद उज्ज्वला, सौभाग्य, जन-धन, स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत सरीखी सरकारी योजनाओं का भी पर्यायवाची नहीं है। राष्ट्रवाद एक भाव, जागृति, चेतना, आस्था और जोश है।

राष्ट्रवाद वंदे मातरम्ा, भारत माता की जय और जयहिन्द में भी निहित है। हे भारतीय नेताओ! तुम हिन्दुस्तानी हो, पाकिस्तान के प्रवक्ता मत बनो। दुश्मन देश के ‘पोस्टर ब्वाॅय’ मत बनो। उनके टीवी चैनलों की आवाज़ और चेहरे भी तुम मत बनो। कांग्रेस के चिदंबरम, दिग्विजय, कपिल सिब्बल और नवजोत सिद्धू ऐसे भारतीय चेहरे हैं, जिन पर पाकिस्तान तालियां बजा रहा है। उनके बयान बार-बार सुना और दिखा रहा है। यह भी एक किस्म का छाया-युद्ध है। दुर्भाग्य है, विडंबना है।

दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने तो पुलवामा नरसंहार को महज एक दुर्घटना करार दिया है। कमोबेश ऐसा बयान तो पाकिस्तान ने भी नहीं दिया होगा। केवल इतना ही नहीं इससे पहले दिग्गी ने कहा था- 26/11 मुंबई आतंकी हमला आरएसएस ने कराया था। वह अलकायदा के सरगना लादेन को क्रांतिदूत मानते थे। अफ़ज़ल गुरु भी उनके पूजनीय थे। यह महाशय कितना तक गिर सकते हैं, कमोबेश कांग्रेस भी नहीं जानती। कांग्रेस के ही मंत्री-नेता सिद्धू ने फिर दोहराया है कि एयर स्ट्राइक पेड़ों-पहाड़ों पर की गई।

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का इस पर सवाल था कि क्या आजकल पेड़-पहाड़ भी मोबाइल रखने लगे हैं? बालाटोक में करीब 300 मोबाइल फोन किन हाथों में सक्रिय थे? क्या भारत-विरोधी गृहमंत्री की सूचना को भी नकारेंगे? दरअसल ये बयान यूं ही नहीं दिए गए, बल्कि यही इन नेताओं की भारत-विरोधी मानसिकता है। हमारे वीर, बहादुर सैनिकों, जवानों! ये जो देश के नए जयचंद हैं, उनके लिए शहीद होना छोड़ दो। क्यों अपनी जान गंवाते हो उनके लिए? क्यों अपने परिवार को अनाथ और असहाय बनाते हो?

आस्तीन के इन सांपों ने हमेशा डसा है और अब भी डसेंगे। मोदी सरकार के प्रतिनिधियों! इन पाकपरस्त नेताओं के बयानों पर प्रतिक्रिया देना ही बंद कर दो। हमारे मीडिया के मित्रों आप भी इन देशद्रोहियों का बहिष्कार करो। इनके बयान प्रसारित और प्रकाशित करना क्या मजबूरी है? अंततः हमारे महान देश के राष्ट्रवादी नागरिकों, यह फैसले की घड़ी है। देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता का सवाल है। इन मीरज़ाफ़रों को सबक सिखाओ। सवाल तो यह होना चाहिए कि हमारी शूरवीर सेना को गालियां क्यों दी जाएं या सेना गाली क्यों सुने?

गाली देश के प्रधानमंत्री को भी लगातार क्यों दी जाए। गाली और आलोचना दोनों पूरक शब्द नहीं हैं। क्या बालाटोक में करोड़ों रुपये का बेशकीमती बम पेड़ों-पहाड़ों को ही नष्ट करने को फेंका गया था? क्या जंगल पर हमला बोलने को ही 12 मिराज-2000 लड़ाकू विमान भेजे गए थे? विडंबना है कि चुनावी राजनीति नेताओं की सोच को किस हद तक कुंद और विषाक्त कर देती है। शर्मनाक तो यह है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि भारत की सियासी पार्टियां बंटी हुई हैं।

पाकिस्तान में तमाम पार्टियों का सुर एक ही है। भारत में विपक्ष अपनी ही सरकार पर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस एयर स्ट्राइक में मारे गए 300 आतंकियों के सबूत मांग रही है। लानत है भारत-विरोधियों। आज पाकिस्तान तुम पर हंस रहा है। दरअसल 2014 में मणिशंकर अय्यर ने जो बयान देकर, अंततः एक चायवाले को ही प्रधानमंत्री बनवा दिया था, आज उससे आगे का काम चिदंबरम, दिग्गी, सिद्धू, सिब्बल सरीखे कांग्रेसी ही कर रहे हैं।

यदि पाकिस्तान को हाफिज सईद के दो आतंकी संगठनों-जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत-पर पाबंदी लगानी पड़ी है और मसूद अज़हर के भाई अब्दुल रऊफ, हम्माद अज़हर समेत जैश के 44 आतंकियों को गिरफ्तार करना पड़ा है तो कमोबेश पेड़ों-पहाड़ों पर एयर स्ट्राइक करने के मद्देनजर ऐसा नहीं करना पड़ा है। पाकिस्तान चैतरफा संकट में घिरा है।

कोई भी देश उसका साथ देने को तैयार नहीं है। यहां तक कि उसके खास दोस्त चीन ने भ्ाी आतंक के मामले में साथ देना तो दूर पाकिस्तान को सलाह दी है कि वे आतंक का पनाह देना बंद करें। पाकिस्तान पर एफएटीएफ की काली सूची में डाल दिए जाने का दबाव है। उस पर अमेरिका, फ्रांस, रूस और एक हद तक चीन का भी दबाव है। 

पाकिस्तान को पता है कि अब उसे कहीं से भी सहयोग नहीं मिलने वाला। यह पेड़-पहाड़ों पर हमले के कारण नहीं हो सकता। देश में आम चुनाव का मौसम है तो उसे चुनाव की तरह ही लड़ा जाए। प्रधानमंत्री को निजी तौर पर कोसने से क्या हासिल होगा, यह राहुल गांधी की कांग्रेस बखूबी जानती है।


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