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मुद्दा क्यों नहीं बनाएं सर्जिकल स्ट्राइक को...

सरहद पर सीजफायर का उल्लंघन हुआ है, जो रोजर्मरा की बात है।

मुद्दा क्यों नहीं बनाएं सर्जिकल स्ट्राइक को...
नई दिल्ली. भले ही सर्जिकल स्ट्राइक को दो सप्ताह हो गए हैं, उसके झटके अभी तक सीमा के उस पार और इस बार लगातार महसूस किए जा रहे हैं। पाकिस्तान अब तक समझ नहीं पाया कि वह कैसे रिएक्ट करे। वहां भ्रम की स्थिति बनी हुई है। आपको स्मरण होगा कि जैसे ही भारतीय सेना ने मीडिया को सफल सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी दी, उसके कुछ ही समय बाद पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का यह बयान आ गया था कि हमारी संप्रुभता को अगर चुनौती दी गई तो हम खामोश नहीं बैठेंगे। इसके बाद सेना प्रमुख का बयान आया कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कोई बात नहीं हुई।
सरहद पर सीजफायर का उल्लंघन हुआ है, जो रोजर्मरा की बात है और उसमें पाकिस्तानी सेना के दो जवान मारे गए हैं। पाक यदि सर्जिकल स्ट्राइक को स्वीकार कर लेता तो उसकी वैसी ही फजीहत तय थी, जैसी ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद हुई थी। पाक सेना को जवाब देना भारी होता कि हिंदुस्तान की फौज सीमा पार करके आई। आतंकियों का सफाया करके चली गई और उसे पता तक नहीं चला। इसके अलावा यह भी सिद्ध हो जाता कि पीओके में पाक सेना की देखरेख में आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं, जैसा कि भारत लंबे समय से कहता आ रहा है। लिहाजा पाक हुकूमत ने तय किया कि सर्जिकल स्ट्राइक को स्वीकार ही नहीं किया जाए।
नवाज शरीफ की दिक्कत यह है कि वहां के लोग उस पर भरोसा करने की बजाय मानकर चल रहे हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई है। इस घटना के बाद जिस तरह नवाज शरीफ से लेकर सेना प्रमुख राहिल शरीफ की सक्रियता बढ़ी और संयुक्त राष्ट्र संघ में नए सिरे से भारत की कथित आक्रामकता को लेकर बयानबाजी हुई, उसके वहां के लोगों में यही संदेश गए हैं कि वह अप्रत्यक्ष तौर पर सर्जिकल स्ट्राइक को स्वीकार कर रहे हैं। भारत में खासकर विरोधी दलों का इसके बाद से बुरा हाल है। पूरे देश में केन्द्र सरकार के इस फैसले का स्वागत हुआ है। लोगों में ही नहीं, सुरक्षाबलों में भी यह भरोसा लौटा है कि हम ताकतवर देश हैं और किसी की बेजा ज्यादतियों को बहुत लंबे समय तक आखिर क्यों बर्दाश्त करें।
पीओके में घुसकर जिस तरह सेना ने उरी में शहीद हुए 19 सैनिकों का बदला लिया, उससे पड़ोसी देशों ही नहीं, पूरे विश्व में यह संदेश गया है कि जरूरत पड़ने पर भारत आत्मरक्षा के लिए इस हद तक भी जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस से लेकर कई पड़ोसी देशों तक ने भारत के इस कदम को न्यायोचित ठहराते हुए उल्टे पाकिस्तान को नसीहत दी है कि वह आतंकियों को पालना बंद करे। भारत ने जिस तरह नवंबर में पाक में होने वाले सार्क सम्मेलन को रद कराया, उससे भी पाकिस्तान की बहुत भद पिटी है। मोदी सरकार की आक्रामक कूटनीति ने आम जनमानस में उसकी लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया है। चूंकि जल्दी ही उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है।
यही कारण है कि राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और मायावती से लेकर तमाम दूसरे नेता प्रधानमंत्री मोदी पर अनाप-शनाप आरोप लगाने में जुट गए हैं ताकि सर्जिकल स्ट्राइक से मिलने वाले राजनीतिक लाभ को कुछ कम किया जा सके। शुरू में भाजपा नेतृत्व में इसे लेकर थोड़ी हिचकिचाहट महसूस की जा रही थी कि इसे चुनावी मुद्दा बनाया जाए या नहीं। अब ऐसा लगता है कि भाजपा ने विपक्षी दलों को उन्हीं के अस्त्र से चारों खाने चित्त करने का फैसला कर लिया है। यही वजह है कि न केवल प्रधानमंत्री मोदी इस बार दिल्ली के बजाय लखनऊ की रामलीला में शामिल हुए बल्कि उन्होंने आतंकवाद पर बोलते हुए फिर पड़ोसी पर तीखे हमले बोले। इसके संकेत बिल्कुल साफ हैं। अगले कई महीने तक पाकिस्तान के साथ-साथ भारत में विपक्षी दलों को भी सर्जिकल स्ट्राइक के झटके लगते रहेंगे।
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