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एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम

मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने उत्तर प्रदेश की ललिता कुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला दिया।

एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम
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मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने उत्तर प्रदेश की ललिता कुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि अगर पुलिस अधिकारी के पास किसी अपराध की शिकायत आती है और मामला संज्ञेय अपराध से जुड़ा हो तो बिना शुरुआती जांच के ही अनिवार्य रूप से एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज करनी होगी।

यूपी पुलिस ने 2008 में एक बच्ची के लापता होने की एफआईआर महीने भर बाद दर्ज की थी, जिसके बाद यह याचिका दर्ज की गई थी। इस फैसले के तहत अब यदि कोईपुलिसकर्मी संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज नहीं करता हैतो उसे अदालत की अवमानना मान उस पर कार्रवाई की जाएगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस आदेश के बाद पुलिस अधिकारी प्राथमिकी को लेकर अपने रवैये में बदलाव लाएंगे। संज्ञेय अपराधों की र्शेणी में ऐसे अपराध आते हैं, जिनके लिए अपराधी को तीन साल या उससे अधिक की सजा दी जा सकती है और जांचकर्ता अधिकारी आरोपी को बिना वारंट भी गिरफ्तार कर सकते हैं। वहीं संज्ञेय अपराधों से इतर वैवाहिक झगड़ों, भ्रष्टाचार, वित्तीय लेनेदेन और कुछ दूसरे मामलों में थोड़ी छूट देते हुए कहा है कि केस दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच एक हफ्ते में पूरी करनी होगी। कई बार ऐसा लगता है कि शिकायत में लगाए गए आरोप झूठे हैं, जिसके कारण भी पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती है पर अब ऐसे मामले में भी प्राथमिकी दर्ज करनी जरूरी है, भले ही गिरफ्तारी न हो। इसी वर्ष जून माह में केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को प्राथमिकी दर्ज नहीं करने को लेकर निर्देश दिया था, जिसके अनुसार जो पुलिसकर्मी एफआईआर दर्ज नहीं करते हैं उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 166 ए के तहत एक साल की सजा का प्रावधान होगा। वहीं 16 दिसंबर दिल्ली गैंगरेप के बाद जो कानून बना उसमें भी स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं से जुड़े अपराधों में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है ऐसा नहीं होने पर मौके पर तैनात अधिकारी को एक साल की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान होगा है। परंतु इसके बाद भी पुलिस के रवैये में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इस कड़ी में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला काफी अहम है। देश में पुलिस द्वारा मामलों की प्राथमिकी दर्ज न किए जाने की घटनाएं आम हो चली हैं। पुलिस पर आरोप लगते रहे हैं कि वह बिना घूस लिए प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है। और पुलिसकर्मी उल्टे पीड़ित को ही डरा धमकाकर वापस भेज देते हैं। शीर्ष अदालत ने पूर्व में अपने कई फैसलों के दौरान ये बात कही है, लेकिन फिर भी पुलिस पर मामला दर्ज नहीं करने के आरोप लगते रहे हैं। यह एक संवैधानिक अधिकार है जिससे लोगों को वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से पुलिस के रवैये में कुछ सुधार होने की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि जो पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज नहीं करेगा उसके खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश की गई है। यह पुलिस को संवेदनशील और तत्पर बनाने में मददगार होगी है। अपराध बढ़ने की एक वजह पुलिस की निष्क्रियता भी है। अपराधी गुनाह कर आसानी से निकल जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता हैकि पुलिस की कार्रवाई धीमी होगी। हालांकि पुलिस कितनी सुधरती है वक्त ही बताएगा।

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