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चिंतन: उत्तराखंड में ''संकट'' का निदान जल्द होना जरूरी

नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले पर 24 घंटे में ही सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया।

चिंतन: उत्तराखंड में
भारत कांग्रेसी विधायकों की बगावत से उपजे सियासी संकट के कानूनी दावपेंच में उलझने से उत्तराखंड का विकास प्रभावित हो सकता है। नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले पर 24 घंटे में ही सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया। इसके बाद उत्तराखंड में फिर से राष्ट्रपति शासन बहाल हो गया। एक दिन पहले बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट के 18 मार्च के पूर्व की स्थिति बहाल करने के निर्णय के बाद शुक्रवार को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आनन-फानन में कैबिनेट बैठक कर कई फैसले भी ले लिए।
लेकिन दोपहर बाद सुप्रीम कोर्ट के हाईकोर्ट के फैसले पर 27 अप्रैल तक के लिए रोक लगा देने से उन फैसलों पर अमल करना संभव नहीं रह गया। दरअसल, 18 मार्च के बाद उत्तराखंड में जो भी घटित हुआ, उसकी वजह खुद सत्तासीन कांग्रेस ही है। कांग्रेस के ही नौ विधायकों ने सीएम हरीश रावत सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
हालांकि उन विधायकों ने न ही कोई अपना नया गुट बनाया और न ही किसी दूसरी पार्टी के सर्मथन का ऐलान किया था, फिर भी जल्दबाजी में विधानसभा स्पीकर ने उन नौ विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया। इतना ही नहीं स्पीकर ने इन विधायकों के विरोध के बाद अल्पमत में आई रावत सरकार के विनियोग विधेयक को भी पारित घोषित कर दिया।
जबकि एक अल्पमत सरकार बिना बहुमत साबित किए बिना कोई विधेयक पास नहीं कर सकती है। इस बीच हरीश रावत के हॉर्स ट्रेडिंग के वीडियो के सामने आने के बाद केंद्र सरकार को मजबूरन उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन का मार्ग प्रशस्त करना पड़ा। इधर, कांग्रेस अलाकमान ने बागी विधायक विजय बहुगुणा के बेटे संकेत बहुगुणा व कुछ पार्टी सदस्यों पर सांकेतिक कार्रवाई की, उधर, प्रेसिडेंट रूल को हरीश रावत ने नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती दी।
इसके बाद लगने लगा कि उत्तराखंड का पूरा संकट केंद्र बनाम राज्य हो गया है। जबकि यह पूरा संकट कांग्रेस के अंदर से ही खड़ा हुआ है। कांग्रेस ही अपने विधायकों को नहीं संभाल पाई है। राष्ट्रपति शासन को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट की टिप्पणी भी चौंकाने वाली है। अदालत फैसला देने के लिए है और तथ्य व उपलब्ध कानून के दायरे में उसे निर्णय देना ही चाहिए, लेकिन देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के फैसले को लेकर अनावश्यक टिप्पणी कोर्ट की गलत परंपरा स्थापित करेगी। राष्ट्रपति सर्वोच्च संवैधानिक पद है और संविधान से उन्हें सुप्रीम शक्ति प्राप्त है। कोर्ट भी संविधान के दायरे में ही काम करती है।
उसमें भी हाईकोर्ट का स्थान सुप्रीम कोर्ट से नीचे है। हमारे संविधान के मुताबिक कार्यपालिका व विधायिका के साथ-साथ न्यायपालिका भी संवैधानिक व्यवस्था के प्रति जवाबदेह है। जबकि समस्त संवैधानिक व्यवस्था का प्रमुख राष्ट्रपति पद है। जजों को न्यायिक फैसले करने चाहिए, न कि गैर जरूरी और अपने अधिकार क्षेत्र से हटकर टिप्पणी करनी चाहिए। इधर कुछ सालों से अदालतें कार्यपालिका व विधायिका को लेकर ज्यादा ही टिप्पणियां कर रही हैं। इसके चलते लगता है जैसे न्यायपालिका का विधायिका से टकराव है, जबकि संविधान के तहत तीनों ही अंग पूरक हैं।
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