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बदलते वक्त में लिव-इन के लिए कानून जरूरी

भारतीय समाज का सुक्ष्म अवलोकन करें तो हम यहां भिन्न-भिन्न सामाजिक स्तरों वाले तीन हिंदुस्तान का वजूद पाते हैं।

बदलते वक्त में लिव-इन के लिए कानून जरूरी

भारतीय समाज का सुक्ष्म अवलोकन करें तो हम यहां भिन्न-भिन्न सामाजिक स्तरों वाले तीन हिंदुस्तान का वजूद पाते हैं। इसकी वजह क्या है, यह एक अलग चर्चा का विषय है परंतु इस आधार पर जो सामाजिक व्यवस्थाएं बनी हैं उसमें एक ही मुद्दे पर अलग-अलग तबकों की सोच और मान्यताओं में भी विविधता स्पष्ट रूप से देखने- सुनने को मिलती है। लिव इन रिलेशनशिप ऐसा ही एक मुद्दा है जो देश में सामाजिक रूप से भले ही मान्य नहीं है, बावजूद इसे अपनाने वालों की संख्या में वक्त के साथ इजाफा हो रहा है। लिव इन का मतलब है बिना शादी वयस्क पुरुष व महिला का शादी शुदा की तरह रहना। एक भारत, जो गांवों में रहता है। वो इसे परंपरा व संस्कृति के खिलाफ मानता है। दूसरा भारत, जो शहरों में बसा है और तेजी से बदल रहा है। रूढ़ियों और परंपराओं को त्याग रहा है। वहां भी कई तरह के सांस्कृतिक बदलाव देखे जा रहे हैं। वर्जनाएं टूट रही हैं। अलग तरह की जीवनशैली पनप रही है। वह लिव इन रिलेशनशिप को लेकर संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।

तीसरा भारत वह है जो पूरी तरह आधुनिक विचारों और पाश्चात्य संस्कृति में रचा-बसा है। यही वो तबका है, जो लिव इन रिलेशनशिप में रहता है। शादी-विवाह जैसी संस्थाओं की जरूरत महसूस नहीं करता। इस तरह का जीवन जीने वालों की संख्या भारत में कम नहीं है। आज मेट्रोपोलिटन शहरों जैसे-मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चंडीगढ़, चेन्नई और यहां तक कि कोलकाता में ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कहना सही है कि साथ रहना न तो अपराध है और न ही पाप, सिवा इसके कि समाजिक तौर पर इस देश में यह अस्वीकार है। कानूनी रूप से भी यह वजिर्त नहीं है।

जिस तरह से आज हमारा समाज बदल रहा है। जैसे-जैसे शहरों में कामकाजी लोगों की जीवनशैली बदल रही है, उसी तरह से उनकी जरूरतें भी बदल रही हैं। एक गतिशील समाज की पहचान है कि वह भी इन बदलते हालातों को समझे और चीजों में परिवर्तन लाए। तो क्या जरूरी नहीं हो गया है कि संसद भी ऐसे मामलों के लिए समूचित कानून बनाए? हालांकि शादी करना या न करना या फिर आपस में संबंध बना कर साथ-साथ रहना निजी मसला है। किसी भी आजाद देश के नागरिकों को इतनी आजादी तो होनी ही चाहिए कि वे अपनी जिंदगी अपने ढंग से गुजार सकें, लेकिन जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं तो सबसे ज्यादा समस्या महिलाओं और बच्चों के समाने पेश आती है।

दरअसल, मौजूदा कानून के तहत लिव इन संबंधों के खत्म होने के बाद वे न तो विवाह की प्रकृति के माने जाते हैं और न ही कानून में इन्हें मान्यता प्राप्त है। मौजूदा कानूनों के लाभ शादीशुद जोड़ों को ही मिलता है। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने इन संबंधों को वैवाहिक संबंधों की प्रकृति के दायरे में लाने का दिशानिर्देश जारी कर एक उम्मीद जगाई है। यदि कानून बनता है या मौजूदा कानूनों में संशोधन होता है तो ऐसे संबंधों में रह रहीं महिलाओं और पैदा हुए बच्चों की रक्षा बेहतर तरीके से हो सकती है। वैसे भी विभिन्न देशों ने इस तरह के संबंधों को मान्यता देना शुरू कर दिया है। बदलते माहौल में देर सबेर भारत भी इसे अपना ले तो आश्चर्य नहीं।

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