Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

अयोध्या विवाद; राम मंदिर और बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई पर पूरे देश की नजर है, इसलिए वहां से जो भी खबरें आतीं हैं वह सुर्खियां बनतीं हैं।

अयोध्या विवाद; राम मंदिर और बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
X

अयोध्या विवाद पर उच्चतम न्यायालय में चल रही सुनवाई पर पूरे देश की नजर है, इसलिए वहां से जो भी खबरें आतीं हैं वह सुर्खियां बनतीं हैं। उच्च्तम न्यायालय ने 8 फरवरी की सुनवाई के दौरान कहा कि वह इसे सिर्फ भूमि विवाद के रूप में देख रही है। यानी वह केवल इस बात की सुनवाई करेगी कि 2.77 एकड़ की जो विवादित भूमि है उस पर किसका स्वामित्व बनता है।

न्यायालय की इस टिप्पणी को लेकर कुछ प्रतिक्र­ियाएं आई हैं, लेकिन इस टिप्पणी को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। हमारी भावनाएं क्या हैं, हमारी आस्था क्या कहती हैं आदि आधार पर न्यायालय न सुनवाई कर सकता है न कोई फैसला दे सकता है। न्यायालय ने जो कुछ कहा है वह बिल्कुल स्वाभाविक है। कोर्ट के अंदर मामला ही यही है कि उस भूमि पर आखिर अधिकार किसका है।

इसके अभी तीन पक्षकार हैं, निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान एवं सुन्नी वक्फ बोर्ड। शिया वक्फ बोर्ड की ओर से हाल में सुप्रीम कोर्ट में यह दावा दायर किया गया है कि उसमें सुन्नी वक्फ बोर्ड का नहीं उनका हक बनता है। न्यायालय इस पर क्या फैसला देता है यह आगे की बात है, लेकिन इस समय तीन ही पक्षकार हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी इन्हीं तीन पक्षकारों की सुनवाई करके फैसला दिया था, इसलिए न्यायालय के इस कथन को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

हम मानते हैं कि अयोध्या विवाद से करोड़ों की भावनाएं जुड़ीं हैं, पर न्यायालय के सामने जो 20 याचिकाएं इससे संबंधित लंबित हैं जिनका संज्ञान लिया गया हैं उन सारे में विवादास्पद भूमि पर दावा ही तो किया गया है तो फिर फैसला दूसरी किसी बात का कैसे हो सकता है? हालांकि न्यायालय ने जो कहा है उसको सीमित अर्थ में नहीं लिया जाए।

इसका यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि जो ऐतिहासिक, पुरातात्विक, या प्राचीन ग्रंथों से संबंधी सबूत हैं उनको न्यायालय ने अपनी सुनवाई की परिधि से बाहर कर दिया है। बाजाब्ता सुनवाई आरंभ करने में देरी ही इसलिए हो रही है, क्योंकि उच्च न्यायालय में प्रस्तुत इन सारे सबूतों और तथ्यों के अनुवाद नहीं हो पाए हैं। न्यायालय ने आदेश दिया है कि सभी पक्षों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई के वीडियो उपलब्ध कराई जाए और उस पर जो खर्च आता है वह उनसे वसूल लिया जाए।

अगर यह वीडियो सुनवाई में शामिल हो रहा है तो इसका अर्थ बिल्कुल साफ है। भूमि के स्वामित्व का निर्णय करते समय पूरी सूक्ष्मता से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से दिए गए साक्ष्यों की भी जांच होगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1970, 1992 एवं 2003 में खुदाई की थी। इसी तरह जिन 42 ग्रंथों को उच्च न्यायालय में पेश किया गया उनके संबंधित अंशों का भी अनुवाद हुआ है। ये ग्रंथ, संस्कृत, पाली, फारसी, अरबी, उर्दू आदि भाषाओं में हैं।

वास्तव में इससे संबंधित साक्ष्य एवं तथ्य जितने ज्यादा हैं उनके आयाम जितने विस्तृत हैं उन्हीं से यह मामला ज्यादा जटिल हो जाता है। जो जानकारी है कुल 524 दस्तावेजों में से 504 के अनुवाद सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो चुके हैं। जिन पुस्तकों की बात हमने की उनसे संबंधित नौ हजार पृष्ठ हैं जिनका अनुवाद किया जाना था। इसके अलावा 90 हजार पृष्ठों में 87 गवाहों के बयान दर्ज हैं।

जो सूचना हैं इनका अनुवाद और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रिपोर्ट भी दाखिल हो चुकी हैं। यह उम्मीद की जा सकती है कि 14 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई तक सारे दस्तावेज सभी पक्षों को अनुवाद सहित उपलब्ध हो जाएंगे। उसके बाद अदालत अपनी सुविधानुसार नियमित सुनवाई कर सकेगा। शायद प्रतिदिन सुनवाई संभव न हो, क्योंकि जब यह मांग न्यायालय के समक्ष रखी गई तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि यह मामला महत्वपूर्ण है और इसकी हमें चिंता है,

लेकिन कोर्ट के सामने 700 मामले ऐसे हैं जिनकी सुनवाई के लिए याची गुहार कर रहे हैं। पहली नजर में उनके कहने का तात्पर्य तो यही लगता है कि इसकी सुनवाई तेजी से जरूर की जाएगी, लेकिन हम सारे मामले को रोककर केवल इसकी सुनवाई नहीं कर सकते। यह ठीक है कि देश इस लंबे विवाद का शीघ्र समाधान चाहता है। यह विवाद देश में सांप्रदायिक तनाव और आपसी दुर्भावना पैदा होने का कारण बना है,

इसलिए देश के हित में भी यही है कि इसका जल्द निपटारा हो जाए। सात वर्ष से ज्यादा समय से मामला उच्चतम न्यायालय के पास लंबित है। इस बीच सात मुख्य न्यायाधीश बदल गए और सुनवाई आरंभ नहीं हुई जिससे थोड़ी सी निराशा अवश्य है, किंतु अब सुनवाई आरंभ हो गई है तो हमें मामले की पेचीदगियांे को देखते हुए धैर्य ही रखना होगा।

वैसे इसमें ऐसे भी पक्षकार हैं जिनके वकील कहते हैं कि मामले की सुनवाई 2019 लोकसभा चुनाव के बाद किया जाए, क्योंकि इससे भाजपा को लाभ हो सकता है। यह बात अलग है कि कोर्ट ने यह अपील खारिज कर दी। उसने साफ कहा है कि राजनीतिक दलीलें वह सुनेगा ही नहीं। राजनीति में किसे लाभ या हानि होगी इससे कोर्ट का कोई लेना-देना नहीं है।

वास्तव में कोर्ट किस तरह सुनवाई करेगी यह उसके विवेक पर छोड़ देना चाहिए। हालांकि न्यायालय के बाहर इसके समाधान के लिए बातचीत भी हो रही है। अगर हिंदू और मुस्लिम पक्षों में बातचीत से इसका समाधान हो जाए तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसा हो सकेगा इसमें संदेह है। ऐसा तो है नहीं कि आपसी बातचीत से समाधान की कोशिशें नहीं हुईं।

इसके कई बार प्रयास हुए। दोनों पक्ष आमने-सामने बैठे। विवाद जहां के तहां रहा। अभी नौ जनवरी को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हैदराबाद में बैठक कर यह प्रस्ताव पारित कर दिया है कि वह कोई बातचीत नहीं करेगा। उसने यह भी कहा है कि किसी सूरत में विवादास्पद स्थल को सौंपने के लिए तैयार नहीं है। यह बात अलग है कि बोर्ड के सारे सदस्य इससे सहमत नहीं हैं।

उनके एक प्रमुख सदस्य मौलाना सलमान हुसैनी नदवी ने बैठक के पहले यह प्रस्ताव दिया था कि इसके समाधान के लिए हमें उस स्थल को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। बोर्ड ने उनके प्रस्ताव को केवल खारिज ही नहीं किया उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए एक समिति भी गठित कर दी और उसकी अनुशंसा पर नदवी को बरखास्त कर दिया। पर्सनल लॉ बोर्ड में वे लोग हैं जो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी में भी हैं।

बोर्ड का यही रुख 1990 में था और आज भी है। ऐसे रुख के रहते बातचीत से समाधान की कल्पना व्यर्थ लगती है। हां, राजनीतिक दल यदि ईमानदारी और गंभीरता से लगते तो कुछ रास्ता निकल सकता था, पर राजनीतिक दलों का सरोकार अपने वोट बैंक से रहा है। हमें यह मान लेना होगा कि न्यायालय के अलावा इसका फैसला अब कहीं से संभव नहीं है। सभी पक्ष उच्चतम न्यायालय गए और वे घोषणा कर रहे हैं कि जो भी फैसला आएगा वह हमें मंजूर होगा। तो कोर्ट और पक्षकारों की टिप्पणियां उम्मीद जगाती हैं कि इस विवाद का समाधान शायद हो जाएगा।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top