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अब सुप्रीम कोर्ट से ही देश को उम्मीद

कह सकते हैं कि देश गंभीर राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। केन्द्र के दो मंत्रियों पर गंभीर आरोप हैं और प्रधानमंत्री उनसे इस्तीफे लेने को तैयार नहीं हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट से ही देश को उम्मीद
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कह सकते हैं कि देश गंभीर राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। केन्द्र के दो मंत्रियों पर गंभीर आरोप हैं और प्रधानमंत्री उनसे इस्तीफे लेने को तैयार नहीं हैं। सीबीआई निदेशक के साथ-साथ विधि मंत्री अश्‍वनी कुमार पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला बनता हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि रेलमंत्री पवन बंसल का भांजा 90 लाख की घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार हो चुका है। सीबीआई दोनों ही मामलों में एक पक्ष है। विधि मंत्री ने कोयला घोटाले की सीबीआई द्वारा तैयार की गई स्टेटस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने से पहले न केवल देखा, बल्कि उसमें कुछ फेरबदल कराने का दुस्साहस भी किया है। उसने सीबीआई निदेशक से हलफनामा पेश करने को कहा तो उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि स्टेटस रिपोर्ट के साथ मंत्री ने छेड.छाड. की है। दूसरे मामले में रेलवे बोर्ड में मलाईदार पद हासिल करने के लिए दस करोड. की रिश्‍वत दिये जाने का खुलासा खुद सीबीआई ने ही किया है। रेलमंत्री पवन बंसल की छवि भले ही स्वच्छ छवि के नेता की रही है परन्तु इस मामले ने उन्हें संदेह के कटघरे में लाकर खड.ा कर दिया है। दोनों ही मामले बेहद गंभीर हैं। कोयला घोटाले में खुद प्रधानमंत्री फंसे हुए हैं। जब वे कोयला मंत्रालय देख रहे थे, उसी समय उन कोयला खदानों का आवंटन हुआ था। सीबीआई इस मामले की जांच पड.ताल कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जांच की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को कहा था, लेकिन जिनकी भूमिका की जांच सीबीआई कर रही थी, उसी प्रधानमंत्री आफिस और कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिवों ने स्टेटस रिपोर्ट देखी और कानून मंत्री अश्‍वनी कुमार ने तो खदानों के आवंटन से संबंधित बिन्दुओं में फेरबदल तक करा डाले। विपक्ष यह मांग कर रहा है कि भ्रष्टाचार में लिप्त और जांच व कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर स्टेटस रिपोर्ट के साथ छेड.छाड करके आरोपियों को बचाने की कोशिश करने वाले दोनों मंत्रियों को सरकार से बाहर किया जाए परन्तु ताज्जुब की बात है कि प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने चुप्पी साध ली है। संसद ठप है। विपक्ष ने साफ कर दिया है कि जब तक मंत्रियों की छुट्टी नहीं कर दी जाती, तब तक वे संसद की कार्यवाही नहीं चलने देंगे। सीबीआई के हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट आठ मई यानी आज सुनवाई करके अपनी व्यवस्था अथवा फैसला देने जा रही है। चूकि प्रधानमंत्री जनमानस की भावनाओं के अनुरूप फैसला लेने को तैयार नहीं हैं, इसलिए पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिक गई हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की कार्यपालिका के लिए इससे अफसोस की बात कोई दूसरी नहीं हो सकती कि साफ तौर पर भ्रष्टाचार और कदाचार के दिख रहे मामलों में भी वह फैसले नहीं ले और अदालती निर्णय की बाट जोहने लगे। इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे कि वे अपने कायरें को ठीक से अंजाम नहीं दे और न्यायालय को व्यवस्थाएं देने के लिए मजबूर होना पडे.। सवाल सिर्फ दो मंत्रियों के हटाने या नहीं हटाने का नहीं रह गया है। प्रश्न इससे कहीं बड.ा है। सत्ता में बैठे लोग भ्रष्टाचार को संरक्षण देते हुए नजर आ रहे हैं और यह और भी खतरनाक है कि सुप्रीम कोर्ट और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को भी धोखे में रखने की बेशर्म कोशिशें हो रही हैं।

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