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अहम सुधारों का वाहक बनता सुप्रीम कोर्ट

आमातौर पर माना जाता हैकि एक लोकतांत्रिक देश में चुनी हुई सरकारों को ही विभिन्न संस्थाओं और व्यवस्थाओं में समय के साथ सुधारों का वाहक होना चाहिए

अहम सुधारों का वाहक बनता सुप्रीम कोर्ट

आमातौर पर माना जाता हैकि एक लोकतांत्रिक देश में चुनी हुई सरकारों को ही विभिन्न संस्थाओं और व्यवस्थाओं में समय के साथ सुधारों का वाहक होना चाहिए, परंतु आज हालत यह है कि देश में अहम सुधार राजनीति की बजाय न्यायपालिका की ओर से किए जा रहे हैं। अर्थात जो काम केंद्र सरकार को करने चाहिए वह सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ रहा है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब सत्ता में बैठी सरकार शिथिल हो जाती हैऔर उसे सही समय पर उचित फैसले लेने की समझ नहीं होती है। पहले पुलिस सुधार, सीबीआई को स्वतंत्र बनाने और चुनाव सुधार के लिए कईअहम फैसले देने के बाद अब नौकरशाही में सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। जिसके तहत प्रशासनिक अफसरों के तबादले और पदोन्नति के लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर सिविल सर्विस बोर्ड गठित करने का आदेश जारी किया गया है। साथ ही कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए नौकरशाहों से भी कहा है कि वे सरकार से कोई आदेश मौखिक न लेकर लिखित में लें। मौखिक आदेश भी भ्रष्टाचार के बड़े कारण बनते रहे हैं और इससे प्रशासन में पारदर्शिता नहीं आती है।

पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम समेत कई पूर्व नौकरशाहों की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर दिए गए इस आदेश का यदि पालन कर लिया जाता है और संसद में इससे संबंधित कानून समय से पारित हो जाता है तो कईसमस्याओं का समाधान हो जायेगा। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि नौकरशाही पर राजनीति हावी है। इसकी वजह से अधिकारी कई जरूरी कदम नहीं उठा पाते हैं। और जो उनके खिलाफ जाते हैं उन्हें तबादले और पदोन्नति का भय दिखाया जाता है। अशोक खेमका और दुर्गा शक्ति नागपाल का उदाहरण हमारे सामने है। यहां एक ऐसा तंत्र सक्रिय है जिसके लिए तबादला एक उद्योग बन गया है। यह खत्म होनी चाहिए। आज तबादले और पदोन्नति को राजनीति से अलग किए जाने की जरूरत है। साथ ही अधिकारियों को एक निश्चित अवधि तक अपने पद पर काम करने का अवसर दिया जाए। इसके बदले उनकी जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। यहां सबसे बड़ा संकट यह हैकि तमाम सुधारों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश देने के बावजूद सरकारें उन्हें लागू नहीं कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की याचिका पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को पुलिस सुधार के लिए इसी तरह का विस्तृत दिशा-निर्देश लागू करने के आदेश दिए थे। बेहतर पुलिस को लेकर एक उम्मीद जगी थी, परंतु सात साल बाद भी सरकारों ने इस आदेश को पूरी तरह लागू नहीं किया है।

दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपने निरीक्षण में यह पाया है कि खराब प्रशासन के कारण विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में कठिनाई आ रही है। अब प्रशासनिक सेवाओं सहित सभी संस्थाओं में सुधार के काम को अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। आज ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे सरकारी कामकाज में मनमाने फैसलों के लिए कहीं कोई गुंजाइश ही न बचे, लेकिन सवाल यह हैकि सरकारें इस पर आगे बढ़ेगी?

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