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चिंतन: आत्महत्या पर सियासत लोकतंत्र के हित में नहीं

आज पूरा देश देश रोहित की आत्महत्या से दुखी है और उनके परिवार की पीड़ा को महसूस कर रहा है।

चिंतन: आत्महत्या पर सियासत लोकतंत्र के हित में नहीं
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हैदराबाद स्टेट यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर जारी राजनीति के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस शालीनता के साथ रोहित को याद किया और इस दरम्यान वे पलभर के लिए भावुक होते हुए भरे गले से कहा कि मां भारती ने अपना लाल खो दिया, इससे सत्ता शीर्ष पर बैठे एक व्यक्ति और उसकी सरकार की संवदेनशीलता परिलक्षित होती है।

पूरा विपक्ष रोहित की आत्महत्या को जिस तरह सियासी रंग दे रहा है और इसके लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है व उसे दलित व गरीब विरोधी सरकार साबित करने पर तुला हुआ है, उसमें इस पूरे मुद्दे पर लखनऊ के बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री ने आत्महत्या पर पीड़ा व्यक्त कर हर बात पर सियासत करने वालों को आईना भी दिखाया है। संबोधन के वक्त अपने खिलाफ लगे नारे से विचलित हुए बिना पीएम ने कहा कि 'जब यह खबर मिलती है कि मेरे ही देश के जवान बेटे रोहित को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा, मैं उसके परिवार की पीड़ा को समझ सकता हूं। इस तरह के मामले पर किसी को राजनीति नहीं करनी चाहिए।'

सच तो ये है कि आज पूरा देश देश रोहित की आत्महत्या से दुखी है और उनके परिवार की पीड़ा को महसूस कर रहा है। लेकिन इस पूरे प्रकरण के दौरान देश ने छात्र राजनीति के जिस घृणित रूप को देखा है, उसमें सवाल उठना लाजिमी है कि कालेजों में छात्र संगठन का औचित्य है या नहीं? हालांकि छात्र संगठनों ने देश को कई दिग्गज नेता दिए हैं। फिर भी प्रबंधन कॉलेजों, इंजीनियरिंग, मेडिकल व तकनीकी शिक्षण संस्थानों में छात्र संगठनों के नहीं रहने से वहां यूनिवर्सिटी के सामान्य विषयों के कालेजों की अपेक्षा पढ़ाई का बेहतर माहौल देखा जा सकता है।

आज के दौर में जिस तरह छात्र संगठनों का ध्यान स्टूडेंट वेलफेयर के प्रति कम और निरा सियासत के प्रति ज्यादा है, उससे शिक्षण संस्थानों का माहौल भी बिगड़ा है। आज लगभग हरेक दल का अपना छात्र संगठन है, इससे निश्चित ही छात्र आपस में ही राजनीतिक रंग में बंट जाते हैं। इससे पढ़ाई पर असर पड़ा है। प्रधानमंत्री ने भी बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को याद करते हुए कहा कि जीवन में कठिनाइयों से मुक्ति का अगर कोई रास्ता है तो वह शिक्षा ही है।

लेकिन शिक्षा का बेहतर माहौल कब बनेगा, जब शिक्षण संस्थान राजनीति से दूर रहेंगे। इसलिए कालेज प्रबंधन को भी चाहिए कि वे अपने यहां शिक्षा का स्वस्थ वातावरण बनाए और छात्रों में जाति-धर्म के नाम पर कोई भेद की भावना नहीं पनप सके। जब तक हमारा समाज जातिविहीन नहीं होगा, समाज में धर्म के नाम पर संघर्ष बंद नहीं होगा, तब तक समाज में सौहार्द, शांति व मानवता कायम नहीं हो सकेगी। पीएम नरेंद्र मोदी ने भी इसी ओर इशारा किया है कि रोहित की आत्महत्या पर कोई राजनीति नहीं करें।

उन्होंने वाराणसी में कहा भी कि दलितों, शोषितों, वंचितों और दबे-कुचलों के कल्याण के प्रति हमारी सरकार प्रतिबद्ध है। पीएम ने कहा कि वह गरीबों के लिए काम करने के पथ से नहीं डिगेंगे। राजनीति से अधिक हमें मिलजुल कर समस्या के कारणों की तह में जाकर उसके हल के प्रति कदम उठाना चाहिए।

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