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लोकतंत्र के लिए घातक है ऐसी राजनीति

दुनिया के विशालतम लोकतंत्र को कई बार शर्मसार होना पड़ा है।

लोकतंत्र के लिए घातक है ऐसी राजनीति
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नई दिल्‍ली. तेलंगाना गठन के मुद्द पर जिस तरह से दुनिया के विशालतम लोकतंत्र को कई बार शर्मसार होना पड़ा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। तेलंगाना की मांग दशकों पुरानी है इसका गठन बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था, लेकिन वर्षों तक राजनीतिक नफा-नुकसान के कारण इसे लटकाए रखा गया। अब यह साकार होने की कगार है, लेकिन इसके निर्माण के दौरान खुद माननीयों द्वारा ही जिस तरह से लोकतंत्र के मंदिर संसद की गरिमा को तार-तार किया जा रहा है उससे भारतीय राजनीति में एक गलत परंपरा की शुरुआत हो सकती है।

इसके लिए सबसे ज्यादा कोई जिम्मेदार है तो वह सत्ताधारी दल है। क्योंकि इसमें उसके रणनीतिकारों की अदूरदर्शिता और वोट बैंक की संकीर्णराजनीति की साफ झलक दिखाई पड़ रही है। कांग्रेस वर्ष 2004 में ही पृथक तेलंगाना को साकार करने के वादे के साथ सत्ता में आई थी, परंतु पास करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है 2014 में, वह भी 15वीं लोकसभा के आखिरी सत्र में। इस समय देश आम चुनाव के दहलीज पर खड़ा है। बीते हफ्ते आंध्रा के सीमांध्र क्षेत्र के कांग्रेस के ही सांसदों ने संसद में अपनी पार्टी के कदम का विरोध करते हुए मिर्च स्प्रे किया था।

वह दिन लोकतंत्र के इतिहास में काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। इससे पहले वहां के कांग्रेसी सांसद अपनी ही सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव ला चुके थे। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, लेकिन पार्टी के इस कदम का सबसे मुखर विरोधी वहां के पूर्व मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी रहे थे। उन्होंने बुधवार को पद से इस्तीफा दे दिया। साथ ही पार्टी भी छोड़ दी। उनके नेतृत्व में विधानसभा ने केंद्र सरकार के आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक के प्रस्ताव को खारिज तक कर दिया था और कई दिनों तक अपने ही सरकार के फैसले के विरोध में जंतर-मंतर पर धरना देते रहे।

परंतु तेलंगाना के गठन की हड़बड़ी में मंगलवार को डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार भी संसदीय गरिमा को ताक पर रखने के मामले में एक कदम आगे निकल गई। मंगलवार को जिस तरह से लोकसभा में इस बिल को पास किया गया है वह निंदनीय है। इस दौरान लोकसभा के सभी दरवाजे बंद कर दिए गए और विधेयक पर चर्चा के दौरान लोकसभा टीवी का प्रसारणा बंद कर दिया गया, यह भी लोकतंत्र की र्मयादा को ठेस पहुंचाने वाली घटना है। यही नहीं कई सांसदों को अपनी बात नहीं कहने दी गई। संसद का यह लगातार तीसरा सत्र है जो तेलंगाना विरोध की भेंट चढ़ रहा है।

इसके विरोधी खुद कांग्रेस पार्टी के नेता ही हैं। यह दिखाता है कि कांग्रेस के अंदर समन्वय नहीं है। पार्टी विरोधियों की चिंताओं को समझी होती और उन्हें विश्वास में लिया गया होता तो आज ऐसे हालात पैदा नहीं होते। क्योंकि यह मांग वर्षों पुरानी है और तेलंगाना को पृथक राज्य का दर्जा देने के पक्ष में कमोबेश सभी रहे हैं। इससे पूर्व एनडीए के शासनकाल में भी तीन नए राज्यों का गठन हुआ था। उस दौरान ऐसे हालात पैदा नहीं हुए थे, परंतु आज आंध्रप्रदेश के भौगोलिक बंटवारे ने लोगों के दिलों को भी बांट दिया है। ऐसे में आंध्र प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक हालात कितने सामान्य होंगे अब यह कहना मुश्किल है। ऐसी संकीर्ण राजनीति देश के लिए भी घातक है।

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