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आलोक मेहता का लेख : बैलगाड़ी से अंतरिक्ष तक सफलता

इस संकल्प का सबसे बड़ा प्रमाण भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ दूसरी बार सत्ता में आने के कुछ ही महीनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कश्मीर के लिए बनी धारा 370 की दीवार ध्वस्त कर लोकतांत्रिक इतिहास का नया अध्याय लिख दिया। सामान्यतः लोगों को गलतफहमी है कि मोदी को यह विचार तात्कालिक राजनीतिक -आर्थिक स्थितियों के कारण आया।

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पीएम मोदी

आलोक मेहता

सत्ता, संपन्नता, शिखर-सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है, संघर्ष की क्षमता और जीवन मूल्यों की दृढ़ता। इसलिए नरेन्द्र भाई मोदी के प्रधानमंत्री पद और राजनीतिक सफलताओं के विश्लेषण से अधिक महत्ता उनकी संघर्ष यात्रा और हर पड़ाव पर विजय की चर्चा करना मुझे श्रेयस्कर लगता है। राजधानी में संभवतः ऐसे बहुत कम पत्रकार इस समय होंगे, जो 1972 से 1976 के दौरान गुजरात में संवाददाता के रूप में रहकर आए हों। इसलिए मैं वहीं से बात शुरू करना चाहता हूं। हिन्दुस्तान समाचार के संवाददाता के रूप में मुझे 1973-76 के दौरान कांग्रेस के एक अधिवेशन, फिर चिमन भाई पटेल के विरुद्ध हुए गुजरात छात्र आंदोलन और 1975 में इमरजेंसी रहते हुए आठ महीने अहमदाबाद में रहकर काम करने का अवसर मिला था। इमरजेंसी के दौरान नरेन्द्र मोदी भूमिगत रूप से संघ-जनसंघ तथा सरकार के दमन संबंधी समाचार-विचार की सामग्री गोपनीय रूप से पहुंचाने का साहसिक काम कर रहे थे। उन दिनों तो उनसे भेंट नहीं हो सकी। लेकिन संयोग से नरेन्द्र भाई के अनुज पंकज मोदी भी हिन्दुस्तान समाचार कार्यालय में काम कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंकज भाई और ब्यूरो प्रमुख भूपत पारिख से इस परिवार और नरेन्द्र भाई के किशोर-युवा काल से संघ तथा समाज सेवा के प्रति गहरी निष्ठा एवं लेखन क्षमता की जानकारियां मिलीं।

प्रारंभिक दौर में वहां इमरजेंसी का दबाव अधिक नहीं दिख रहा था। गुजरात समाचार और संदेश जैसे अखबार सेंसर की छाया में निकल रहे थे। यहां तक कि संघ से जुड़ी साधना पत्रिका भी छप रही थी। एजेंसी से वैसे भी कोई सरकार विरोधी खबरें नहीं दी जाती थी। उन्हीं दिनों साधना के संपादक विष्णु पंड्याजी से भी उनके दफ्तर में जाकर राजनीति तथा साहित्य पर चर्चा के अवसर मिले। बाद में विष्णु पंडया के अलावा नरेन्द्र मोदी ने इमरजेंसी पर गुजराती में पुस्तक भी लिखी। इसलिए यह कहने का अधिकारी हूं कि सुरक्षित जेल की अपेक्षा गुपचुप वेशभूषा बदलकर इमरजेंसी और सरकार के विरुद्ध संघर्ष की गतिविधयां चलाने में नरेन्द्र मोदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संघर्ष के इस दौर ने संभवतः नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति की कटीली-पथरीली सीढ़ियों पर आगे बढ़ना सिखा दिया।

इस संकल्प का सबसे बड़ा प्रमाण भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ दूसरी बार सत्ता में आने के कुछ ही महीनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कश्मीर के लिए बनी धारा 370 की दीवार ध्वस्त कर लोकतांत्रिक इतिहास का नया अध्याय लिख दिया। सामान्यतः लोगों को गलतफहमी है कि मोदी को यह विचार तात्कालिक राजनीतिक -आर्थिक स्थितियों के कारण आया। हम जैसे पत्रकारों को याद है है कि 1995-96 से भारतीय जनता पार्टी के महासचिव के रूप में हरियाणा, पंजाब, हिमाचल के साथ जम्मू-कश्मीर में संगठन को सक्रिय करने के लिए पूरे सामथ्र्य के साथ जुटे थे। हम लोगों से चर्चा के दौरान भी जम्मू-कश्मीर अधिक केन्द्रित होता था, क्योंकि भाजपा को वहां राजनीतिक जमीन तैयार करनी थी। नब्बे के दशक में आतंकवाद चरम पर था। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल किंलटन की भारत-यात्रा के दौरान कश्मीर में आतंकवादियों ने 36 सिखों की नृशंस हत्या कर दी। प्रदेश प्रभारी के नाते नरेन्द्र मोदी तत्काल कश्मीर रवाना हो गए। बिना किसी सुरक्षाकर्मी या पुलिस सहायता के नरेन्द्र मोदी सड़क मार्ग से प्रभावित क्षेत्र में पहुंच गए। तब फारूख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। जब पता लगा तो उन्होंने फोन कर जानना चाहा कि आप वहां कैसे पहुंच गए। यही नहीं उन्होंने पार्टी प्रमुख लालकृष्ण आडवाणी से शिकायत की कि, आपका यह सहयोगी बिना बताए किसी भी समय सुरक्षा के बिना घूम रहा है। यह गलत है। आडवाणी ने भी फोन किया। तब भी नरेन्द्र भाई ने विनम्रता से उत्तर दिया कि मृतकों के अंतिम संस्कार के बाद ही वापस आऊंगा। लद्दाख के अलावा वह तिब्बत, मानसरोवर और कैलाश पर्वत की यात्रा भी 2001 से पहले कर आए थे। तभी उन्होंने यह सपना भी देखा कि कभी लेह के रास्ते हजारों भारतीय कैलाश मानसरोवर जा सकेंगे। यह रास्ता सबसे सुगम होगा। उम्मीद की जाए कि लद्दाख और कश्मीर आने वाले वर्षों में स्विजरलैंड से अधिक सुगम, आकर्षक और सुविधा संपन्न हो जाएगा।

हिमालय की तरह नर्मदा उनके दिल से जुड़ी हुई है। उनका मुकाबला तो कोई नहीं कर सकता, लेकिन उज्जैन-इंदौर-ओंकारेश्वर की मेरी पृष्ठभूमि के कारण नर्मदा बांध पर 1973-74 से नर्मदा के पानी बंटवारे, राजनीतिक विवाद, नर्मदा के गंगा नदी से प्राचीन होने तथा पौराणिक महत्व के साथ आधुनिक प्रगति में नर्मदा की जल शक्ति के उपयोग पर लिखता रहा। इसलिए भाजपा संगठन और मुख्यमंत्री रहते नरेन्द्र मोदी से नर्मदा पर बातचीत के अवसर मिले। दो वर्ष पहले शुभि पब्लिकेशंस के संजय आर्य ने चर्चा के दौरान माना कि राजनीतिक विवादों से हटकर नर्मदा के महत्व पर अंग्रेजी में कोई पुस्तक नहीं है। मैंने लिखना स्वीकार किया। इस पर भव्य चित्रों के साथ काफी टेबल बुक बनने की तैयारी हुई मैंने मोदी से पुस्तक के लिए लिखने का संदेश भेजा। फिर पांडुलिपि भिजवाई तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने व्यवस्तताओं के बावजूद ध्यान से पढ़कर सुंदर लिखित टिप्पणी भेज दी। प्रकाशित पुस्तक छपने के बाद प्रकाशक के साथ उनसे भेंट हुई तो नर्मदा-हिमालय पर वह बातों में तत्लीन हो गए। निर्धारित समय से अधिक चर्चा होती रही।

बहरहाल, असली खुशी हम दोनों के लिए यह रही कि विवादों से हटकर पचास वर्षों से लटका नर्मदा सरकार सरोवर बांध का निर्माण पूरा होने के बाद लाखों किसानों को खेती तथा गांवों को पीने का पानी भी पहुंच रहा है। मुझे लगता है कि उन्हें अंतरिक्ष, मंगल, चंद्र यानों की सफलताओं से अधिक गांवों को पानी, बिजली, बेटियों को शिक्षा, गरीब परिवारांे के लिए मकान, शौचालय और घरेलु गैस उपलब्ध कराने के अभियानों से अधिक संतोष मिलता है। आखिरकार, उनका बचपन और 50 वर्ष तक की आयु तो गरीब बस्तियों, गांवों-जंगलों में घूमते हुए बीती है। इसमें कोई शक नहीं कि नरेन्द्र मोदी के विचार दर्शन का आधार ज्ञान शक्ति, जन शक्ति, जल शक्ति, ऊर्जा शक्ति, आर्थिक शक्ति और रक्षा शक्ति है। इसलिए भारत की ग्राम पंचायतों से लेकर दूर देशों में बैठे प्रवासी भारतीयों को अपने कार्यक्रमों, योजनाओं से जोड़ने मे उन्हें सुविधा रहती है। योग, स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत-स्वस्थ भारत, शिक्षित भारत जैसे अभियान सही अर्थों में भारत को शक्तिशाली और संपन्न बना सकते हैं।

आतंकवाद से निपटने के लिए आतंकवादियों के खात्मे के साथ रचनात्मक रास्ता भी सामाजिक-आर्थिक विकास है। तभी तो नरेंद्र मोदी के प्रयासों से दुनिया भारत के साथ खड़ी है और इस्लामिक देश भी पाक से दूर हो गए हैं। इसलिए राजनीति, विवाद, चुनौतियों से हटकर जननेता के रूप में नरेन्द्र मोदी के दृढ़ संकल्पों और सपनों के लिए जन्म दिन पर अथवा अच्छे कार्यों पर उन्हें बधाई तथा शुभकामनाएं दी जानी चाहिएं।

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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