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संपादकीय लेख : योग के चिकित्सकीय फायदों पर हो अध्ययन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को योग पर अध्ययन करने को कहा है। समग्रता में देखें तो प्रधानमंत्री का आह्वान भारत में चिकित्सा की दशा व दिशा बदल सकता है, अगर आईएमए ईमानदारी से पीएम की बात को गंभीरता से ले।

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योगासन (फाइल फोटो)

Haribhoomi Editorial : कोरोना महामारी के दौरान चिकित्सकों की भूमिका 'धरती पर भगवान' सरीखी रही है। लाखों कोरोना पीड़ितों की जान आधुनिक चिकित्सकों की वजह से बची। नेशनल डॉक्टर्स डे पर चिकित्सकों के कोरोना से जंग में योगदान भूरि-भूरि प्रशंसनीय है। दुनिया भर के चिकित्सकों ने अपने व अपने परिवार की जान को जोखिम में डालकर कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज किया। भारत के चिकित्सकों ने सरकार के साथ मिलकर न केवल संक्रमित मरीजों का इलाज किया बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशानुसार कोविड प्रोटोकॉल बनाने में भी मदद की। दुनिया में 1.19 लाख हेल्थ वर्करों ने संक्रमण से लड़ते हुए दम तोड़ा है। भारत के 1,492 डॉक्टर और 4 गुना ज्यादा स्वास्थ्यकर्मियों ने अपनी जान गंवाई। देश के लिए यह बड़ी क्षति है। इस बीच, कोरोना से लड़ाई के दौरान देश में आयुर्वेद बनाम एलोपैथ का विवाद भी देखने को मिला, जो कि नहीं होना चाहिए था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को योग पर अध्ययन करने को कहा है। समग्रता में देखें तो प्रधानमंत्री का आह्वान भारत में चिकित्सा की दशा व दिशा बदल सकता है, अगर आईएमए ईमानदारी से पीएम की बात को गंभीरता से ले। यह बात अब साबित हो चुका है कि योग शारीरिक विज्ञान पर आधारित है और व्यक्ति को स्वस्थ रखने में सहायक है। अलग-अलग रूपों में विश्व में प्रचलित योग की स्वास्थ्यवर्धक महत्ता को संयुक्त राष्ट्र ने भी पहचाना और 21 जून को विश्व योग दिवस घोषित किया। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी व्यायाम के महत्व को मानता है। योग और व्यायाम आपस में गुंथे हुए हैं। योग-ध्यान, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा भारत की अपनी खोज है और दुनिया को देन है। इसलिए इसे पश्चिम की खोज एलोपैथी के नजरिये से देखना व खारिज करना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है। योग-ध्यान, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा लंबे अध्ययन व प्रयोगों के बाद व्यवहार में आए हैं। ये सभी प्रिवेंटिव हेल्थ व उपचार में काफी सहायक हैं, जबकि एलोपैथी इमरजेंसी, सर्जरी, टेस्ट और लाइफ सेविंग उपचार में अग्रणी है। देश में अगर प्रिवेंटिव और लाइफ सेविंग दोनों पद्धतियों को मिश्रित प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाय तो भारत विश्व में लीड कर सकता है।

कहने का तात्पर्य अगर एलोपैथी के साथ आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और योग-ध्यान को मिश्रित कर अगर भारत अपना नया चिकित्सा मॉडल डेवलप करे तो जहां इलाज में क्रांति आ सकती है, वहीं चिकित्सा को अफोर्डेबल बनाया जा सकता है। भारत जैसे देश को सस्ते इलाज मॉडल की आवश्यकता है। इस नए मॉडल से एलोपैथी चिकित्सकों पर मरीजों का बोझ कम किया जा सकता है। महात्मा गांधी ने इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा अपनाई थी व पुणे के उरुलीकांचन में एक नेचुरोपैथी अस्पताल भी खुलवाया था। कॉक्रेन, लांसेट, ब्रिटिश जर्नल आदि जैसे वैश्विक मेडिकल जर्नलों में प्रकाशित अध्ययनों में स्टेरॉयड, एंटीबायेटिक्स और एंटीपायरेटिक दवाओं का शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव सामने आ चुका है। ऐसे में आईएमए जैसी बड़ी संस्था को सुरक्षित इलाज के मॉडल अपनाने की तरफ बढ़ना चाहिए। चिकित्सा का ध्येय सुरक्षित इलाज होना चाहिए।

भारत की खोज उपवास पर जापान के एलोपैथी चिकित्सक को नोबल प्राइज मिला, जबकि यह किसी भारतीय चिकित्सक को मिलता तो अच्छा लगता। आज पश्चिम के अधिकांश देश अपने यहां योग-ध्यान, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा दे रहे हैँ, जबकि इनके जनक भारत में ये सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं। डा. विंसेज प्रिस्नेज, डा. लुई कुने और डा. एडोल्फ जुस्ट जैसे एलोपैथी चिकित्सकों ने यूरोप में भारत की प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाया और उसे इलाज के लिए प्रचलित किया। इसलिए वक्त की मांग है कि इलाज की सभी मानक पद्धतियों के बीच समन्वय हो, फिर कोरोना से जंग और आसान हो जाएगा। केंद्र सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

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