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अलका आर्य का लेख: ऑनलाइन हुई पढ़ाई

इस समय विश्व के करीब 188 मुल्कों ने अपने अपने यहां स्कूल बंद किए हुए हैं और इससे अंदाजन 1 अरब 50 करोड़ बच्चे व युवा प्रभावित हो रहे हैं।

अलका आर्य का लेख: ऑनलाइन हुई पढ़ाई

कोरोना संकट की गिरफ्त में इस समय विश्व कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। विश्व में डाक्टरों, नर्सों की कमी, पीपीई की कमी व स्वास्थ्यगत ढ़ाचे की कमी, अर्थव्यवस्था में मंदी, बेरोजगारी की दर में वृद्वि होने की संभावना जताई जा रही है। मगर इसके साथ अन्य बड़ी चुनौती बच्चों, युवाओं के भविष्य को ले कर भी हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सभी मुल्कों के सभी आयुवर्ग के बच्चे प्रभावित होंगे, यह बात गौर करने लायक हैं कि सबसे गरीब मुल्कों और अन्य मुल्कों के सबसे गरीब घरों के बच्चों पर यह महामारी भंयकर असर छोड़ेगी। यह वैश्विक संकट है, लेकिन चिंता की बात यह है कि इसका असर सब पर एक समान नहीं होने वाला। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि इस महामारी के कारण इस साल अति गरीबी की श्रेणी में 4 करोड़ 20 लाख से 6 करोड 60 लाख बच्चे आ सकते हैं, यह संख्या उन बच्चों से अतिरिक्त होगी जोकि 2019 में पहले से ही इस श्रेणी में हैं। इस समय विश्व के करीब 188 मुल्कों ने अपने अपने यहां स्कूल बंद किए हुए हैं और इससे अंदाजन 1 अरब 50 करोड़ बच्चे व युवा प्रभावित हो रहे हैं। यद्यपि बहुत से मुल्क शिक्षण संस्थानों के बंद होने के प्रभाव को कम करने के मकसद से डिस्टेंस लर्निंग यानी दूरस्थ शिक्षा का विकल्प अपना रहे हैं, बच्चों व किशारों को आॅनलाइन पढ़ाने की व्यवस्था की गई है, भारत भी ऐसे मुल्कों की सूची में शमिल है, जहां सरकारी व गैर सरकारी स्कूल अपने विघार्थियों को ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं।

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार की रोकथाम को लंबे समय तक प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार आने वाले दो महीनों में स्कूल-काॅलेज खोलने पर विचार नहीं करेगी। ऐसे हालात में पहली से बारहवीं तक के कोर्स को छोटा करने की तैयारियों पर काम शुरू हो गया है ताकि चार-पांच महीनों में वह कोर्स बच्चों को करवाया जा सके। हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने देश के शिक्षा राज्य मंत्रियों से ऑनलाइन हुई चर्चा में मौजूदा दौर व आने वाले समय में शिक्षा को चालू रखने पर चर्चा की। इस चर्चा में दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने अगले वर्ष के लिए समूचे पाठ्यक्रम में कम से कम 30 फीसदी की कमी वाला सुझाव रखा और यह भी कहा कि जेईई, नीट अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की प्रवेश परीक्षाएं भी कम किए गए पाठ्यक्रम के आधार पर ली जाएं।

शिक्षामंत्री सिसोदिया ने दूरदर्शन और एआईआरएफएम पर तीन-तीन घंटे की समय की मांग की है ताकि दिल्ली सरकार के शिक्षक सभी बच्चों के लिए आॅन एयर क्लास चला सकें। गौर करने वाली बात यह है कि सरकार ई-लर्निंग के जरिए करीब 25 करोड़ बच्चों को अलग-अलग माध्यमों से घर बैठे पढ़ाने की कोशिश में जुटी हुई है। जिसमें लाइव क्लासेज के साथ ही यू-टयूब, टीवी,रेडियो, सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफाॅर्म जैसे माध्यम शमिल हैं। इसके साथ ही सरकार ने राज्यों की मांग के मददेनजर स्थानीय भाषाओं में भी आॅनलाइन पाठ्य सामग्री तैयार करने की दिशा में कदम उठाया है। आॅनलाइन शिक्षा से जुड़े और मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी संस्था राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष डा. सीबी शर्मा के मुताबिक आॅनलाइन शिक्षा को चालू रखने में कोई दिक्कत नहीं है। उनके पास इससे जुड़ी पर्याप्त विषय सामग्री है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश निशंक ने अभिभावकों के साथ भी आॅनलाइन मुलाकात की और अभिभावकों को विश्वास दिलाया कि भारत सरकार बच्चों के भविष्य और उनकी पढ़ाई को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्व है।

मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि कोरोना संक्रमण के खतरे के बीच जब तक स्कूल नहीं खुल रहे हैं तब तक वे बच्चों को आॅनलाइन लग रही कक्षाओं से घर पर ही पढ़ाए। मगर अहम सवाल यह भी उठता है कि क्या गरीब बच्चे इस वैकल्पिक आॅनलाइन व्यवस्था से लाभान्वित हो रहे हैं। सरकारी स्कूलों के अधिकतर अध्यापक अनौपचारिक संवाद में ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि उनकी आॅनलाइन कक्षाओं में केवल 30-40 फीसद छात्र ही हाजिर होते हैं और ये वो छात्र हैं, जिनके पास स्मार्टफोन, टेबैलट आदि है और मेमरी कार्ड रिचार्ज के लिए पैसा होता है। यानी गरीब छात्र मौजूदा आॅनलाइन शैक्षणिक व्यवस्था से बाहर खड़े हैं और इसकी बहुत भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है।

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