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जयंतीलाल भंडारी का लेख : बैंकों की सख्त निगरानी जरूरी

यदि हम बैकिंग और वित्तीय असफलता के इन सभी मामलों को देखें तो पाते हैं कि वित्तीय गड़बड़ी की स्थितियां लगभग एक जैसी ही हैं। इन सभी संस्थाओं की वित्तीय स्थिति खराब होती गई, इनके एनपीए बढ़ते गए। यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर इनमें गवर्नेंस के मुद्दों को भी उठाया, पर कोई उपयुक्त नियंत्रण नहीं हो सका। इस तरह पिछले कुछ समय में जिन बैंकों और वित्तीय संस्थानों की नाकामी का सिलसिला देखने को मिला है उनमें वित्तीय नियंत्रण तथा निगरानी की कमी सामने आई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर

जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा कि 17 नवंबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा संकटग्रस्त लक्ष्मी विलास बैंक का डीबीएस की भारतीय सहायक इकाई के साथ विलय किए जाने का निर्णय शीघ्रतापूर्वक सही समय पर उठाया गया सही कदम है। इस विलय से जहाँ एक ओर लक्ष्मी विलास बैंक के जमाकर्ताओं में धन की सुरक्षा संबंधी विश्वास बनेगा, वहीं दूसरी ओर डीबीएस को भारत में अपनी डिजिटल रणनीति के साथ पारंपरिक शाखा बैंकिंग को संपूर्ण बनाने में मदद मिलेगी और डीबीएस की व्यावसायिक हैसियत मजबूत होगी। डीबीएस को नए रिटेल और छोटे एवं मध्यम आकार के ग्राहक जोड़ने में मदद मिलेगी। डीबीएस की पूंजी पर इस विलय का असर बेहद कम होगा।

गौरतलब है कि हाल ही में तमिलनाडु के प्रायवेट सेक्टर के लक्ष्मी विलास बैंक की विफलता ने एक बार फिर भारतीय बैंकिंग सिस्टम पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। लक्ष्मी विलास बैंक के आर्थिक हालत पिछले तीन साल से लगातार बिगड़ती जा रही थी और बैंक को लगातार घाटे का सामना करना पड़ रहा था। इतना ही नहीं एक उपयुक्त योजना के बगैर और बढ़ते नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) के कारण बैंक का घाटा लगातार बढ़ता गया। लक्ष्मी विलास बैंक की मुश्किलें खासतौर से सितंबर 2019 में उस समय से शुरू हो गई थीं, जब रिजर्व बैंक ने इंडिया बुल्स हाउजिंग फाइनेंस के साथ मर्जर के लक्ष्मी विलास बैंक के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। आरबीआई ने सितंबर 2019 में लक्ष्मी विलास बैंक को प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) फ्रेमवर्क में डाल दिया था। पीसीए फ्रेमवर्क में डाले जाने की वजह से बैंक ना तो नए कर्ज जारी कर सकता था और ना ही नई ब्रांच खोल सकता था।

स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि लक्ष्मी विलास बैंक में विफलता की घटना सामने आने के महज कुछ ही समय में केंद्र सरकार ने लक्ष्मी विलास बैंक पर एक महीने के लिए कई तरह की पाबंदियां लगा दी हैं। बैंक के ग्राहक अब 16 दिसंबर तक बैंक से अधिकतम 25 हजार रुपये की ही निकासी कर सकेंगे। रिजर्व बैंक ने लक्ष्मी विलास बैंक के निदेशक मंडल को भी हटा दिया है और टीएन मनोहरन को 30 दिनों के लिए इस बैंक का प्रशासक नियुक्त किया है। टी एन मनोहरन ने कहा कि बैंक के जमाकर्ताओं का पैसा पूरी तरह से सुरक्षित है और नियामक द्वारा तय समय सीमा के अंदर ही बैंक का विलय डीबीएस बैंक इंडिया के साथ हो जाएगा।

ज्ञातव्य है कि लक्ष्मी विलास बैंक पर छाए मौजूदा संकट ने इसी वर्ष 2020 में मुश्किल में फंसे यस बैंक के साथ-साथ पिछले साल सितंबर 2019 में पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक में चल रहे कथित घोटाले की याद को भी ताजा कर दिया है। आरबीआई ने उस समय सख्त कदम उठाते हुए पीएमसी बैंक से धनराशि निकालने की सीमा निश्चित कर दी थी। शुरुआत में अकाउंट से 50 हजार रुपये नकद निकालने की सीमा लगाई गई थी लेकिन बाद में इस सीमा को बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दिया गया था। सरकारी बैंक आईडीबीआई के मामले में विफलता की किसी घटना के सामने आने के पहले ही उसे भारतीय जीवन बीमा निगम के हाथ में सौंप दिया गया।

यदि हम बैकिंग और वित्तीय असफलता के इन सभी मामलों को देखें तो पाते हैं कि वित्तीय गड़बड़ी की स्थितियां लगभग एक जैसी ही हैं। इन सभी संस्थाओं की वित्तीय स्थिति खराब होती गई, इनके एनपीए बढ़ते गए। यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर इनमें गवर्नेंस के मुद्दों को भी उठाया, पर कोई उपयुक्त नियंत्रण नहीं हो सका।

इस तरह पिछले कुछ समय में जिन बैंकों और वित्तीय संस्थानों की नाकामी का सिलसिला देखने को मिला है उनमें वित्तीय नियंत्रण तथा निगरानी की कमी सामने आई है। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज, पंजाब ऐंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक, दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड, येस बैंक और अब लक्ष्मी विलास बैंक इन सभी के लिए आरबीआई की बैंकों और वित्तीय क्षेत्र की निगरानी की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। यह चिंताजनक है कि पीएमसी बैंक के मामले में रिजर्व बैंक धोखाधड़ी का पता ही नहीं लगा सका तथा आईएलऐंडएफएस, येस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक के मामले में रिजर्व बैंक के द्वारा लंबे समय तक समस्या को पनपने दिया गया। इतना ही नहीं येस बैंक मामले में तो प्रबंधन के पूंजी जुटाने के बार-बार किए जा रहे दावों पर भी रिजर्व बैंक के द्वारा उपयुक्त सवाल नहीं उठाए गए।

निश्चित रूप से लक्ष्मी विलास बैंक की विफलता के बाद एक ओर लोगों को यह सोचना होगा कि वे अब अपने धन को बैंकों में किस तरह सुरक्षित रख सकते है और दूसरी ओर सरकार तथा रिजर्व बैंक को सोचना होगा कि बैंकों पर निगरानी किस तरह बढ़ाई जाए ? वस्तुतः सरकारी बैंकों में धन जमा करना प्राइवेट बैंकों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। चूंकि प्राइवेट बैंक पर मालिकाना हक निजी हाथों में होता है, अतएव अगर निजी बैंक डूबता है तो उसकी भरपाई के लिए वित्तीय संसाधन भी सीमित होते हैं। जबकि दूसरी और सरकारी बैंक सरकार के अधीन कार्यरत होते हैं। अतएव सरकारी बैंक डूबता है तो सरकार के पास असीमित वित्तीय संसाधन और विकल्प मौजूद होते हैं और सरकार जहाँ विफल बैंक को बचाने की पूरी कोशिश करती है वहीं बैंक डूबने की हालात में उसके घाटे की भरपाई के लिए भी तैयार खड़ी रहती है। इसके साथ-साथ लोगों के द्वारा एक से अधिक बैंक अकाउंट रखे जाने पर भी ध्यान देना चाहिए। सामान्यतया एक से ज्यादा बैंकों में अकाउंट रखना झंझट भरा काम माना जाता है, लेकिन पीएमसी बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक जैसे उदाहरण को देखकर लगता है कि एक से ज्यादा बैंकों में बैंक अकाउंट रखना लाभप्रद साबित हो सकता है।

निसंदेह लक्ष्मी विलास बैंक की असफलता से रिजर्व बैंक की सालाना निगरानी पर भी सवाल उठे हैं। जिसके जरिए रिजर्व बैंक के द्वारा सलाना जोखिम का पता लगाया जा सकता है। इसमें कोई दोमत नहीं कि आरबीआई के पास निजी क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों की निगरानी के लिए पर्याप्त अधिकार हैं, लेकिन वह लक्ष्मी विकास बैंक के मामले में अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाया और नहीं समुचित निगरानी नहीं कर सका। हम उम्मीद करें कि आरबीआई के द्वारा अपने बैंकिंग निगरानी ढांचे की उपयुक्त समीक्षा की जाएगी और ऐसे नए कदम सुनिश्चित किए जाएंगे, जिससे बैंकिंग सेक्टर में लक्ष्मी विलास बैंक की विफलता जैसी घटनाएं न दोहराई जा सकें।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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