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रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी : यहां एक बागीचा था

विकास की आंधी ने गांव की सुंदरता ही नहीं इंसानों की संवेदना को •ाी पूरी तरह उजाड़ दिया था, इस बात पर उन्हें यकीन नहीं आ रहा था।

रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी : यहां एक बागीचा था

वर्षों बाद नरेंद्र जब अपने गांव पहुंचे तो उसकी बदली सूरत देखकर हतप्रभ रह गए। पुराने रास्ते, नदी, खेत-खलिहान और मैनेजर साहब का बागीचा, कुछ भी उन्हें नजर नहीं आया। विकास की आंधी ने गांव की सुंदरता ही नहीं इंसानों की संवेदना को पूरी तरह उजाड़ दिया था, इस बात पर उन्हें यकीन नहीं आ रहा था।

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पहचान के स्मृति-चिन्हों को न देख मैंने रिक्शे वाले से कहा, ‘अरे, तुम मुझे ले कहां जा रहे हो?’ रिक्शे वाले ने रिक्शा रोकते हुए पलट कर मेरी तरफ देखा, ‘आपको बड़का टोला जाना है न हजूर?’

‘हां, बड़का टोला, मगर तुम कहां ले आए हो? किस रास्ते से जा रहे हो?’

‘रास्ता त एक्के गो है हजूर? उसी से तो जा रहे हैं!’ रिक्शे पर बैठा मैं फिर अपनी पहले की पहचान ढूंढ़ने लगा। दरअसल, अपने टोले तक जाने के लिए जो पुख्ता पहचान थी यानी मैनेजर साहब का बगीचा, वह था ही नहीं। गौर से देखा तो बगीचों की जगह तीन ऊंचे-ऊंचे मोबाइल टावर थे। रिक्शा रोकने के लिए कहा। रिक्शे वाले से पूछा, ‘यहां बगीचा था न? मैनेजर साहब का बगीचा!’

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‘जी, था बगीचा। कुछ साल पहले अपने एमेले सम्राट सिंह ने खरीद लिया।’ मैं हरावत इस्टेट के मैनेजर मनमोहन चटर्जी पर सोचने लगा। चटर्जी साहब के बारे में लोग कहते थे कि वे अंग्रेजी हुकूमत के जबरदस्त समर्थक थे। जमींदारी के दिनों में उन्होंने किसानों पर कैसे-कैसे जुल्म ढहाए, इसकी कहानियां बूढ़े-पुराने लोग हाल तक सुनाते आए हैं। सुराजियों को पकड़वाने और यातना देने में वे अंग्रेज अफसरों से भी आगे थे।

जमींदारी उन्मूलन के बाद जब वर्षों के सताए लोग चटर्जी साहब की दुर्गति करने लगे तब अपमानित होकर वे कलकत्ता चले गए। लोगों ने कहा कि चलो, अपना बगीचा तो उठाकर नहीं ले जाएंगे कलकत्ता! एक अनमोल चीज तो वे यहीं छोड़ कर जा रहे हैं। पूरा इलाका फल खाएगा और इमारती लड़कियां लोगों के घर की शोभा बढ़ाएंगी।

अब रिक्शे वाला कह रहा है, ‘सम्राट सिंह ने बगीचा खरीद लिया।’ लेकिन बगीचा है कहां? यह पूरा दायरा तो कांटेदार तारों से घेर दिया गया है और कहीं एक भी पेड़ नहीं है। देखा, लकड़ी की पतली-पतली ढेर सारी तख्तियां सूखने के लिए जमीन पर फैला दी गई है। रिक्शे वाले से पूछा, ‘यह क्या है? क्या सूख रहा है?’

‘ई सेमर का तख्ता है हजूर। इसी से पलाई बनता है। सूख जाएगा तो ट्रक में भर कर शहर के कारखाने में भेज दिया जाएगा।’

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रिक्शा खड़ा करवा कर मैं उस पूरे दायरे को देखता रहा। मोटी-मोटी लकड़ियों का अंबार लगा हुआ था। एस्बेसटस के तीन खुले हुए शेड बने हुए थे। दो में मोटी-मोटी लकड़ियां इस तरह रखी हुई थीं, जैसे गोदाम में बोरे रखे जाते हैं। एक शेड में आरा मशीन थी जो बंद पड़ी थी। थोड़ी दूरी पर कांटेदार घेरे के पास कटे हुए तीन-चार विशाल पेड़ इस तरह जमीन पर पड़े थे कि मुझे अकस्मात् कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर पड़े। भीष्म पितामह की याद आ गई। लगभग बीच में कई बिल्डिंग नींव से ऊपर आई दिख रही थीं। रिक्शे वाले ने बताया, ‘कोल्डस्टोरेज बन रहा है।’

चढ़त वैशाख के तीसरे पहर में बगीचे की जगह का पूरा दायरा एकदम सुनसान और सच कहूं तो पेड़ों का श्मशान-जैसे लग रहा था। मैं गमगीन आंखों से तीन ऊंचे-ऊंचे मोबाइल टावरों को देखता रहा। सोचने लगा कि मेरे भतीजे ठीक ही कहते थे कि अपना गांव अब काफी तरक्की कर गया है।

बारह-तेरह साल बाद भतीजी की शादी में हैदराबाद से गांव आया हूं। सबकुछ एक दम बदला-बदला सा लग रहा है। पक्की सड़क और फारबिसगंज कस्बे तक गांव की बगल से गुजरने वाली फोर लेन हाई-वे। ऑटो, रिक्शे, जीप-कारें-बसें। गांव इतनी तरक्की कर गया है, ऐसा सोचा नहीं था। भतीजे अमित ने बताया, ‘मोबाइल फोन के बारे में तो पूछिए मत। ऐसा कोई मजदूर-परिवार शायद ही मिलेगा जिसमें मोबाइल न हो।’ उसने हंसते-हंसते कहा, ‘मुसहर टोले में मजदूर को काम करने के लिए बुलाने गया तो मजदूर ने कहा, ‘मौजेल (मोबाइल) पर मुसकैल (मिस्ड कॉल) कर दीजिएगा। बता देंगे कि काम करने आएंगे कि नहीं!’

मैं खूब हंसा भतीजे की बात पर, ‘मौजेल! मुसकैल! ...’

मेरी हंसी थम नहीं रही थी। अब समझ में आया कि मैनेजर साहब के उजड़ गए बगीचे में तीन-तीन मोबाइल कंपनियों के टावर क्यों खडेÞ हैं।

बागीचे का पूरा नक्शा मेरी आंखों में स्थिर था और आंखें बंद किए मैं उस बगीचे को देख रहा था। बागीचे के चारों तरफ कांटेदार तार और कंटीली झाड़ियां लगी थीं। चारों तरफ किनारे-किनारे सेमल, शिरीष, महोगनी, शीशम वगैरह पेड़ों की कतारें थीं। बाहर से अंदर तक कुछ दिखता नहीं था। अंदर फलदार पेड़ लगे थे। ठीक बीच में एक पोखर था जिसमें मछलियां पाली जाती थीं।

जमींदारी जाने के बाद भी मैनेजर साहब का परिवार जब-तब घूमने आया करता था बगीचे में। एक बड़ा-सा गेट था बगीचे का। गेट के सामने करमू माली का परिवार रहता था। उसका पूरा परिवार बागीचे के काम में लगा रहता था। उसके बेटे रामलाल से मेरा अच्छा परिचय था। दो-तीन साल वह मिडिल स्कूल में मेरे साथ पढ़ चुका था। रामलाल के कारण ही मेरा बगीचे में प्रवेश संभव हुआ था। उसी कारण मैंने बागीचे के गछपक्कू आम, अमरूद, पीले-पीले केले, सपाटू वगैरह फल खाए थे।

बीएससी तक गांव में मेरा आना-जाना निरंतर जारी रहा। रामलाल कहता था कि दूर-दूर देशों के अजीबो-गरीब पक्षी आते हैं इस बगीचे में। पक्षियों का कोलाहल इतना प्यारा लगता है कि क्या बताऊं। गांव के कुछ लोग एकदम सुबह पक्षियों का कोलाहल सुनने के लिए आ जाते हैं।

बाद में जब मैंने एमएससी किया और नौकरी के सिलसिले में पहले बंगलुरू और बाद में हैदराबाद में रहने लगा, गांव का यह बागीचा कभी विस्मृत नहीं हुआ। कभी-कभी सपने में भी दिखता था यह बागीचा।

और अब बारह-तेरह साल बाद गांव आया हूं तो मालूम हुआ, इलाके के बाहुबली विधायक सम्राट सिंह ने यह बागीचा खरीद लिया और लाखों रुपए की कीमती लकड़ियों के लोभ से बागीचा ही उजाड़ दिया। अब आरा मशीन है यहां और कोल्ड स्टोरेज की नींव जमीन से ऊपर आई दिख रही है। गांव के लोगों ने सोचा था कि आतताई अंग्रेज के पिट्ठू मैनेजर साहब जाते-जाते अनमोल चीज दे गए हैं। लेकिन बाहुबली विधायक सम्राट सिंह ने सब उजाड़ दिया। कौन बोलता सम्राट के सामने?

दूसरे दिन सुबह अमित से कहा, ‘अपनी बाइक निकालो, अमित। बहुत दिनों बाद गांव आया हूं, जरा नदी किनारे से हो आऊं।’ अमित ने मुस्कराते हुए कहा, ‘कौन-सी नदी चाचाजी?’

‘सुरसर नदी और कौन-सी?’

‘चाचाजी, आप कहां हैं! सुरसर नदी सूख गई, रेत ही रेत है नदी में। सिर्फ यही नदी नहीं, फारबिसगंज से लेकर अपने गांव तक जो छह-सात छोटी-छोटी बरसाती नदियां थीं, सब सूख गर्इं। एक चुल्लू पानी नहीं मिलेगा किसी नदी में। वैसे उन नदियों की ‘रेह’ पर नेशनल हाइवे के मजबूत पुल आपको जरूर मिल जाएंगे। पुल देखने हैं तो कहिए, ले चलता हूं आपको।’

मैं एकटक अमित का चेहरा देखता रहा। धीरे से पूछा, ‘आखिर इस बीच क्या हो गया अमित? कैसे सूख गर्इं सारी नदियां?’ अमित को मेरी व्यथा का अहसास शायद हो गया था। कहने लगा, ‘पता नहीं क्या हो गया चाचाजी! अपना जो पोखर है न पिछवाड़े में, जाकर देखिए न! पूरा सूख गया है। वैशाख-जेठ में भी कभी नहीं सूखता था पोखर। इलाके के सारे कुएं सूख रहे हैं। अपने ट्यूबवेल में बीस फीट का पाइप जोड़ना पड़ा है। पता नहीं क्या हो गया है कि पानी का लेवल नीचे गिरता ही जा रहा है।’

मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अचानक बहुत कमजोर हो गया हूं। दरवाजे पर बिछी खाट पर लेट गया और दाहिनी बांह आंखों पर रख ली। पता नहीं, अमित कब तक खड़ा रहा। शाम से पहले बाजार की तरफ जाते हुए मन में आया कि एक बार उजड़े हुए बगीचे में बचपन के अपने साथी रामलाल के विषय में पता करूं।

वह है भी या कहीं चला गया। कांटेदार घेरे की एक तरफ बड़ा-सा गेट था। सामने ही एस्बेसट्स का बड़ा-सा शेड था, जिसमें लड़कियों के मोटे-मोटे तने काटे या चीरे जाने के लिए रखे हुए थे। एक मजदूर से रामलाल के विषय में पूछा तो उसने जवाब दिया, ‘हां हैं।’ अंगुली से उसने इशारा करके बताया। देखा, दो आदमी एक गिरे हुए मोटे-से पेड़ के तने पर बैठे आरे से कोई मोटी-सी शाख काट रहे हैं।

आरे की घर्रघर्र आवाज आ रही थी और दोनों आदमी विचित्र-सी आवाज में हांफ रहे थे। मैं जिस व्यक्ति की पीठ क पीछे जा कर खड़ा हुआ, वह रामलाल था। उसका हांफना जो एक तरह से कराहने-जैसा था, एक क्षण के लिए मुझे लगा, कहीं यह पेड़ का कराहना तो नहीं है?

रामलाल ने मुझे देखा और कूद कर मेरे पास आ गया, ‘अरे आप नरेंदर भाय!’ पसीने से भीगी उसकी एक हथेली मैंने अपनी मुट्ठी में ले ली। पूछा, ‘यह सब क्या हो गया रामलाल?’ मूर्च्छा में डूबी करुण मुस्कान में रामलाल ने कहा, ‘इन हाथों से जिन पेड़ों को सींचा उन्हीं पेड़ों को आरे से खंड-खंड काट रहा हूं। क्या करूं नरेंदर भाय, पेट के लिए.। सम्राट बाबू बोले हैं-कोल्ड स्टोरेज में नौकरी दे देंगे। तब से लकड़ी काटे जा रहा हूं।’ बोलते-बोलते रामलाल फफक-फफक कर रोने लगा।

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