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कहानी : पिंटू की पतलून

लोकल ट्रेन में अचानक चेकिंग के दौरान वह पकड़ लिया गया।

कहानी : पिंटू की पतलून
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ओमीश परुथी
ऑफिस में काम निबटाने के चक्कर में अमर को उस दिन काफी देर हो गई। फिर अपने बच्चे के लिए पटरी बाजार से पैंट खरीदते समय उसकी जेब कट गई लेकिन उसे पता ही नहीं चला। और लोकल ट्रेन में अचानक चेकिंग के दौरान वह पकड़ लिया गया। फिर उसकी जो हालत हुई, उसकी उसने कल्पना ही नहीं की थी...
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अमर ने फाइल को फीते से बांधकर मेज पर रखते हुए, नजर उठाकर सामने दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा, आठ बजने को आए थे, ‘अब तो नौ बजे वाली ट्रेन ही मिल पाएगी’, वह हल्के से बुदबुदाया। कमर सीधी करने के लिए उसने हाथ ऊपर उठाकर एक अंगड़ाई ली और अपना बैग कंधे पर लटका लिया। चपरासी चाबियों का गुच्छा लिए उसके पास ही चला आया। उसे लगा जब काम समाप्त हो गया है, उसे भी छुट्टी मिलेगी। ‘अच्छा भई, मैं चलता हूं,’ कह कर अमर दफ्तर से बाहर निकल आया।
स्टेशन से दफ्तर आते हुए अकसर वह जिस शार्टकट रास्ते से आता था, आज उससे जाने का उसका मन नहीं हुआ, अंधेरा काफी गहरा गया था। उसके सहयात्री भी उसके साथ न थे। वह अकेला था। साहब ने एक जरूरी फाइल निपटाने के लिए उसे रोक रखा था। अकसर वह शटल ट्रेन से ही आता-जाता था, तब इस रास्ते पर खूब गहमा-गहमी होती थी, लेकिन अब रास्ता सुनसान था। अत: वह मेन रोड की ओर चल पड़ा।
बाजार के बीच से गुजरते समय अमर ने देखा कि बंद दुकानों के बाहर पटरियों पर काफी रौनक है। रात को यहां बाजार लगता है, चीजें काफी सस्ती मिलती हैं, पुराने कपड़े भी मिल जाते हैं, जानता तो था। लेकिन यह सब देखने का मौका उसे पहली बार ही मिला था। चलते-चलते वह एक जगह रुक गया, पुराने विदेशी कपड़ों से बनी बच्चों की गर्म पतलूनें मिल रही थीं। उसके मन में सुबह स्कूल जाते समय ठिठुरते पिंटू का ख्याल हो आया, सोचा नई सिलवा देना तो उसके बस की नहीं, पुरानी ही खरीद लेता हूं, वहां भीड़ बहुत थी।
पतलून चुनते हुए उसे दस-पंद्रह मिनट लग गए। फिर वह तेज कदमों से स्टेशन की ओर लपका, उसे प्लेटफॉर्म पर खड़े-खड़े आधा घंटा हो गया, लेकिन गाड़ी अभी नदारद थी। उसे भूख लग आई, पर कुछ खरीद कर खाया नहीं, सोचा कुछ देर में घर पहुंच जाएगा। यों ही पैसे क्यों बेकार किए जाएं, ध्यान बांटने के लिए वह बुक-स्टॉल पर रखी पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा। कुछ देर बाद ट्रेन आई तो वह उसमें चढ़ गया।
गाड़ी तेज रफ्तार से चली जा रही थी, रोशनी यों तो मद्धम थी, पर समय काटने के लिए अमर ने सुबह का मुचड़ा हुआ अखबार निकाल लिया और पढ़ने लगा। उसकी तन्मयता तब टूटी जब टिकट-चैकर ने पीछे से आकर उसे कंधे से हिलाया और टिकट दिखाने को कहा। अमर ने मासिक पास बनवा रखा था, अचानक उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें झलक उठीं, उसने घबरा कर कहा, ‘मेरी तो जेब कट गई’ और निरीह-सा चैकर की ओर देखने लगा।चैकर उसकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हुआ, वह सख्त आवाज में बोला, ‘यह आप जैसों की रोज की बात है। ज्यादा ड्रामा करने की जरूरत नहीं।’
अमर हतप्रभ सा हो गया। उसने खड़े होकर बारी-बारी अपनी सारी जेबें दोबारा देखीं, हालांकि बैग में उसने आज तक कभी पास न रखा था, लेकिन उसे भी ध्यान से टटोला, पर पर्स और पास न मिले। चैकर घुड़क कर बोला, ‘अब छोड़ो ये एक्टिंग और निकालो फाइन, मुझे आगे भी देखना है?’ पर अमर कहां से देता फाइन। थोड़े बहुत पैसे जो उसके पास थे, वह पर्स में ही रखे थे। उसने मजबूर होकर अत्यंत कातर भाव से चैकर की ओर देखा।
उसकी आंखों में चिंता व भय उतर आए। डिब्बे में इधर-उधर देखा, ऊपर की सीटों पर अधलेटे लोगों को भी उचक-उचक कर देखा। शायद कोई परिचित नजर आ जाए। लेकिन उसे घूरने वाली आंखों की कोई कमी न थी, पर एक भी आंख ऐसी न थी, जिसमें संवेदना की झलक मिलती। वे उसे देखकर मुस्करा रहे थे। वह सीट की सुविधा के लिए थ्री-टियर के डिब्बे में चढ़ आया था। साधारण डिब्बे में होता तो शायद कोई जान-पहचान का मिल ही जाता।
अमर के मन में एक बार तो आया कि अपनी घड़ी उतार कर चैकर को दे दे, शायद बात बन जाए और वह इस अपमानजनक स्थिति से उबर जाए। पर एक तो घड़ी महंगी थी, दूसरा उसकी पत्नी ने पिछले ही महीने उसे जन्मदिन पर भेंट की थी।
शांता ने थोड़ा-थोड़ा जोड़कर यह घड़ी उसके लिए खरीदी थी, ढेर-सा स्नेह सिमटा था उसमें। इसीलिए उसे देने का उसका मन नहीं हुआ। वह अपनी इस दयनीय स्थिति से बड़ा क्षुब्ध था, झुंझला कर उसने स्वयं को भीतर ही भीतर कोसा-‘न पैंट लेता, न जेब कटती।’ बचपन से ही वह अपनी दादी के मुख से एक कहावत सुनता आया था ‘बंदा जोड़े पली-पली, राम लुढ़ावे कप्पा’ बरबस ही उसे यह कहावत याद हो आई।
चैकर के इशारे पर सिपाही आ गया, अमर को लगा कि आज तो कोई बड़ी चैकिंग है, उसकी घबराहट बढ़ गई उसने जेब से रूमाल निकाल कर माथे पर उभर आए पसीने को पोंछा, सिपाही चैकर के कहने पर अमर को कमीज के कॉलर से पकड़ कर ले जाने लगा। अमर ‘कॉलर से पकड़ने’ का विरोध करते हुए तमतमा कर बोला, ‘मैं पढ़ा-लिखा हूं, एक इज्जतदार, भले घर का हूं, ऐसे पकड़ने का क्या मतलब?’
लेकिन सिपाही ने बड़ी जालिम मुस्कान से उसकी शराफत और पढ़ाई की धुनते हुए उसे अपने साथी की ओर धकेल दिया। दूसरे ने उसे लपकते हुए कहा, ‘साले इज्जतदार बनते हैं! हूं! तभी बिना टिकट चढ़ आते हैं।’ अमर से यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। क्षोभ उसकी रगों में तिलचट्टे-सा रेंगने लगा। उसकी कनपटी सुर्ख होने लगी। उसने हाथ की तनी अंगुलियों की मुट्ठियों की आगोश में ले लिया।
कंपार्टमेंट के शौचालय के पास, पकड़े हुए कुछ अन्य यात्री भी खड़े थे। सब के चेहरे लटके हुए थे। दो सिपाही दांत निपोरते हुए आपस में बतिया रहे थे। गाड़ी अमर ही व्यथा व ग्लानि से बेखबर सनपट दौड़ती जा रही थी। अमर की झुंझलाहट और बढ़ गई, उसने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा ली।
रह-रह कर उसे पैंट खरीदने पर गुस्सा आ रहा था। वह बार-बार यह सोच रहा था कि अब क्या होगा, घरवाले भी परेशान होंगे, सुबह घर से निकलते समय बेटी सुधा को बुखार भी था। उसकी बीवी शांता तो उसके जरा सा लेट होने पर घबरा जाती है। घर के बाहर गेट पर उसका इंतजार करते मिलती है। आज तो बहुत देर हो गई थी। आजकल की तरह तब समाज मोबइलमय नहीं हुआ था। अभी न जाने कब छुटकारा मिले, उसने सिगरेट का एक गहरा कश लिया, इस प्रकार पुलिसियों से उसका सामना आज तक न हुआ था।
अमर इस उधेड़-बुन में पड़ा था कि उसकी दृष्टि सामने की सीट पर लेटी एक श्वेट-केश वृद्धा पर पड़ी, वह उजले सफेट शॉल में लिपटी थीं, एक संभ्रान्त व धनी परिवार की प्रतीत हो रही थीं। माला हाथ में लिए प्रभु नाम जप रही थीं। अमर को लगा इस वृद्धा से कुछ पैसे उधार मांगे जा सकते हैं। उसे संकोच तो बहुत हुआ, पर मजबूरी थी, सिगरेट के दो लंबे कश लेकर, उसे वहीं जूते के नीचे रगड़ कर बाहर फेंक दिया।
बड़ी हिम्मत करके बोला, ‘मां जी’ पर आवाज होंठों में ही दब के रह गई, उसने दोबारा कोशिश की। इस बार वृद्धा ने सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखा, अब भी उसके होंठ जाप करते हुए हिल रहे थे। अमर ने चेहरे पर दीनता लाते हुए कहा, ‘माता जी मेरी जेब कट गई है, टिकट भी उसी में था...।’ वृद्धा की नजरों में हिकारत उभर आई। नजरें अमर के चेहरे पर गड़ाते हुए बोलीं, ‘इतनी देर से धुंआ छोड़-छोड़ कर मेरी नाक में दम कर रखा है। शरम नइ आंदी, उतौं पैसे मंगदे ओ, शोद्दा न होवे।’
सुनकर अमर सकपका गया। वृद्धा के बोल उसे भीतर तक छील गए। ऐसी दयनीय दशा उसकी कभी न हुई थी। दिल की भीतरी दीवारों से कुछ कड़वा-सा रिसने लगा। वॉशबेसिन के ऊपर लगे दर्पण में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया, ‘क्या वह वास्तव में शोहदा लगता है?’ नहीं, ओह! इतनी बेचारगी में डूबा! परेशानी पुता चेहरा! उसने आज तक न देखा था। वह खुद अपना चेहरा देख कर घबरा उठा।
उसने नजरें हटा लीं। खिड़की से बाहर खेतों को देखने लगा। वहीं एक झोपड़ी के बाहर तार पर उसे पिंटू की पतलून लहराते हुए दिखाई दी। गाड़ी के चलने से बाहर के दृश्य बदलते जा रहे थे, लेकिन वह पतलून हर दृश्य में सहभागी बनी हुई थी। गाड़ी उसी रफ्तार से भागी जा रही थी, मानो कुछ भी न हुआ हो, अगले स्टेशन पर सभी बेटिकटों को उतार लिया गया, यह अमर का अपना ही स्टेशन था, उसका चेहरा फक्क हो गया। वेटिंग हॉल में सबको ठंडे फर्श पर ही बिठा दिया गया। काफी लोग थे।
तमाशबीनों का हुजूम भी उमड़ आया था। यद्यपि बल्बों की रोशनी काफी मद्धम थी, पर अमर को यह चिंता खाए जा रही थी कि उसे इस प्रकार कोई परिचित देख लेगा तो क्या होगा? इसी आशंका से उसका चेहरा जर्द होता चला गया। हार कर उसने घुटनों में अपना चेहरा छिपा लिया। ठंडे फर्श पर, पशुओं की तरह एक-दूसरे से सट कर बैठते हुए उसे बड़ी तकलीफ हो रही थी, पर कोई चारा न था। एक युवक ने पास के बैंच पर बैठना चाहा, तभी उसके हाथ पर डंडा मारते हुए सिपाही ने उसे झिड़क दिया।वह महज कसमता के रह गया।
सिपाही के परे हट जाने पर मोटी-मोटी गालियां होंठों में घुमाता रहा, पर इतनी ऊंची कि वह सुन न सके। थोड़ी देर बाद उसने प्लेटफॉर्म पर बैठे-बैठे करीब एक घंटा होने का आया था, पर अभी मेजिस्ट्रेट के आने के कोई आसार न थे, जैसे-जैसे रात गहराती जाती, घर वालों के प्रति अमर की चिंता बढ़ती जाती, रह रहकर सुधा का पीला चेहरा उसकी आंखों के आगे घूम जाता, उसके होंठ सूखने लगे। बैठे-बैठे पांव पीड़ा देने लगे और टांगें अकड़ गर्इं। एक-एक लम्हा बड़ा भारी पड़ रहा था। वह स्टेशन के पी.सी.ओ. से फोन करने जाने लगा, पर सिपाही ने जाने नहीं दिया।
अमर यों तो अपना चेहरा नीचे किए बैठा था, पर पास से गुजरते राम बिलास ने उसे पहचान ही लिया, टिकट-खिड़की तथा प्रतीक्षालय को बांटने वाली जाली के पास अपना मुंह लाकर वह थोड़ा मुस्कराते हुए बोला, ‘अरे, अमर भाई, आप! यहां कैसे?’ ‘आप’ शब्द को उसने बलाघात से उच्चारित किया था, ‘क्या टिकट-विकट का कोई चक्कर है?’सुनकर अमर को खीझ तो हुई, पर स्वयं को संयत करते हुए उसने अपनी जेब कटने की बात संक्षेप में बता दी। सब सुनकर रामबिलास का चेहरा संजीदा हो आया, आवाज में ठहराव लाकर बोला, ‘भाई मैं कुछ करता तो जरूर, पर वैष्णो देवी जा रहा हूं, बच्चे भी साथ में हैं और गाड़ी आने वाली है, अच्छा लौट कर प्रसाद देने आऊंगा, तब मिलूंगा’, इतना कहकर वह बच्चों को साथ लिए प्लेटफॉर्म की ओर लपका।
रामबिलास की बिटिया को देखकर अमर को बरबस ही याद हो आया कि कितनी बार वह उसकी इस बीमार बेटी के लिए दिल्ली से इंपोर्टेड दवाइयां लेकर आया था। उसके होंठों पर व्यंग्य एवं क्षोभ मिश्रित एक विचित्र-सी मुस्कान खेल गई, मुख में कुछ कसैला-सा घुल गया, पास ही थूके बिना उससे रहा नहीं गया। इतने में एक शोर-सा उभरा। उसने देखा एक रेलवे अधिकारी प्रतीक्षालय में आ चुका था।
बेटिकटों व सिपाहियों ने उसे घेर लिया था। पूछने पर पता चला कि मेजिस्ट्रेट इस स्टेशन पर नहीं आ रहे, अगले स्टेशन पर ही उसने कचहरी लगाई थी। वहां पर यहां से अधिक अपराधी पकड़े हुए थे। यहां के बेटिकट यात्रियों को वहां ले जाने के लिए कई वैन स्टेशन के बाहर आकर खड़ी हो गई थीं। सिपाही अपनी चिरपरिचित शैली में यात्रियों को स्टेशन के बाहर धकेल रहे थे। अमर को भी धक्के पड़ रहे थे। उसे अब यह सोच खाए जा रही थी कि न जाने रात कहां कटेगी।
संभवत: जेल में। सोचते ही उसकी पीठ में एक झुरझरी-सी दौड़ गई। उसे अपनी कनपटियों के भीतर अंगारे से महसूस हुए। अब उससे रहा नहीं गया। उसने कलाई से घड़ी उतार कर अपने हाथ में ले ली और उस सिपाही की ओर बढ़ा, जिसकी कलाई पर निहायत ही मामूली-सी घड़ी बंधी दिखाई दे रही थी। इससे पहले कि अमर उससे कुछ कह पाता, उसे पीछे से एक जोर का धक्का लगा और वह गिर गया। घड़ी उसके हाथ से छिटक कर दूर जा पड़ी। पीछे से आते हुए एक दरोगा का भारी भरकम जूता उस मासूम नन्ही जान पर पड़ा और वह चरमरा गई। उसने नीचे झुक कर उसे उठाना चाहा लेकिन पीछे से आते रेले में वह लुढ़कता चला गया।
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