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राज्यों में चुनाव पूर्व नेतृत्व परिवर्तन की कांग्रेसी नीति

पंडित नेहरू, शास्त्री और कामराज जैसे नेताओं के दौर में नैतिकता के आधार पर राजनीति इस पार्टी की ताकत रही है

राज्यों में चुनाव पूर्व नेतृत्व परिवर्तन की कांग्रेसी नीति

नई दिल्‍ली. लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद अब कांग्रेस के सामने राज्यों में अपना गढ़ बचाने की चुनौती है। इस वर्ष अक्टूबर में हरियाणा और दिसंबर में महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहीं असम में 2016 में विधानसभा के चुनाव होने हैं। अभी ये तीनों प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, लेकिन लोकसभा के परिणाम को देखते हुए उसे डर है। लिहाजा इन राज्यों में कांग्रेस चुनाव से पूर्व नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इस तरह उसकी रणनीति राज्यों में पार्टी की कमान नए हाथों में सौंपना है, जिससे मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ उठे जनअसंतोष को कम किया जा सके।

हालांकि हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कुर्सी फिलहाल बच गई लगती है। कांग्रेस को अंदरखाने डर है कि कहीं हुड्डा को हटाया जाता है तो बगावत हो सकता है। जाहिर है, राज्य में कांग्रेस पहले से ही गुटबाजी की शिकार है। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति लाभदायक होने की बजाय पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। वैसे भीउनके मुकाबले राज्य में कई मजबूत नेता नहीं है जो पार्टी को साथ लेकर चल सके।

यही हाल महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के साथ है। कांग्रेस सुशील कुमार शिंदे को राज्य का कमान देना चाहती है पर वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। कांग्रेस की समस्या यह है कि राज्य में उसके पास दूसरा कोई बड़ा चेहरा नहीं है जिसे आगे किया जाए। यहां असमंजस की स्थिति है परंतु असम की स्थिति साफ है कि वहां तरुण गोगोई की विदाई होनी है। बेहतर होता कि कांग्रेस हार के असली कारणों की पड़ताल कर उन्हें दूर करती बजाय नेतृत्व परिवर्तन जैसे वही घिसे-पिटे कदम उठाने के। महज पांच महीने में नया नेतृत्व पार्टी की सूरत नहीं बदल सकता है।

कांग्रेस के इतिहास पर गौर करें तो पंडित नेहरू, शास्त्री और कामराज जैसे नेताओं के दौर में नैतिकता के आधार पर राजनीति इस पार्टी की ताकत रही है, लेकिन आजपार्टी चाटुकारों से ही घिरी है। इस वक्त अपनी साख वापस पाने का कांग्रेस के पास एक ही रास्ता है, अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के पास लौटना और अंदरुनी संगठन को नये सिरे से मजबूत करना। हालांकि जिस तरह केंद्र में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला है। कई राज्यों में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला है और क्षेत्रीय दल दो से तीन सीटों पर सिमट गए हैं। अब महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, यूपी, असम जैसे राज्यों में भाजपा की सरकार बनने की अटकलें लगाई जा रही हैं। लिहाजा इन राज्यों में विभिन्न विरोधी दल साथ आने लगे हैं।

बिहार में ही कभी एक दूसरे के धुर विरोधी रहे लालू व नीतीश भाजपा की बढ़त को रोकने के लिए एकजुट हो गए हैं। वहीं अब महाराष्ट्र में भी समीकरण बदलने का संकेत कांग्रेस ने शरद पावर से यह कह कर दे दिया हैकि वे अपनी पार्टी एनसीपी का कांग्रेस में विलय कर दें और आसन्न विधानसभा चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करें। कभी सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हो अपनी पार्टी बनाने वाले शरद पवार ने साफ कर दिया हैकि एनसीपी का कांग्रेस में विलय का कोई सवाल ही नहीं है। अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस आगे क्या रुख अपनाती है।

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