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श्रीदेवी की मौत: सनसनी फैलाने से मीडिया पर उठे ये सवाल

हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ भाषाओं की अनेक फिल्मों में काम करने वाली चर्चित अभिनेत्री श्रीदेवी की दुर्घटनावश दुबई के एक होटल में हुई आकस्मिक मृत्यु की जिस तरह भारतीय मीडिया में कवरेज हुई है, उससे एक बार फिर वह सवालों के घेरे में है।

श्रीदेवी की मौत: सनसनी फैलाने से मीडिया पर उठे ये सवाल
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हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ भाषाओं की अनेक फिल्मों में काम करने वाली चर्चित अभिनेत्री श्रीदेवी की दुर्घटनावश दुबई के एक होटल में हुई आकस्मिक मृत्यु की जिस तरह भारतीय मीडिया में कवरेज हुई है, उससे एक बार फिर वह सवालों के घेरे में है। दुबई से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने फिर भी संयमित और संतुलित खबरें देते हुए किसी भी तरह के कयास लगाने से परहेज किया है,

परंतु जैसे ही भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया को पता चला कि उनकी मृत्यु ह्रदय आघात से नहीं, बल्कि नशे की हालत में बाथटब में डूबने से हुई है, वैसे ही स्टूडियो में तरह-तरह के कथित विशेषज्ञों को बैठाकर न केवल चर्चाएं प्रारंभ कर दी गई बल्कि चर्चाओं की एंकरिंग करने वालों ने ऐसे-ऐसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न दागने शुरू कर दिए कि विशेषज्ञ तो चक्कर खाते हुए दिखे ही,दर्शकों की भी समझ में नहीं आया कि वह टीवी चैनलों के एकाएक बैक गियर में लगने को कैसे लें।

कैसे हजम करें। शुरू-शुरू में जब यह खबर आई, तब टीवी चैनलों में इसे लेकर होड़ दिखी कि कौन श्रीदेवी पर बेहतरीन से बेहतरीन प्रोग्राम दे सकता है। हिंदी, तमिल, तेलुगू और दूसरी भाषाओं की फिल्मों में उनके योगदान को लेकर काफी बढ़ा चढ़ाकर दावे किए जा रहे थे। जानी-मानी फिल्मी गैर फिल्मी हस्तियों की बाइट शुरू कर दी गई। लता मंगेशकर से लेकर अमिताभ बच्चन और तमाम दूसरी हस्तियों के ट्वीट और श्रद्धांजलि को टीवी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था।

हालांकि किसी लोकप्रिय अभिनेत्री की मौत दूसरों की तरह दुखद ही होती है, परंतु कुछ चैनलों ने उनके डांस सिच्युएशन वाले कई चर्चित गाने तक चला डाले। इस पर मीडिया के भीतर निश्चित तौर पर गंभीर चर्चा और मंथन की जरूरत है कि गम के माहौल में मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां हैं जैसे गीत दर्शकों को बार-बार दिखाए भी जाने चाहिए थे या नहीं। शुरू के चौबीस घंटे श्रीदेवी की महिमा के थे,

लेकिन जैसे ही पता लगा कि वहां की पुलिस दूसरे कोणों से भी जांच कर रही है और श्रीदेवी की नशे की हालत में बाथटब में गिरने या डूबने से मौत हुई है, वैसे ही समाचार चैनलों के एंकर्स ने कयासबाजियों के तमाम रिकार्ड ध्वस्त कर दिए। एक एंकर तो उन्हें जहर दिए जाने की आशंका तक कर रहे थे। फिर थोड़ी देर बार उन्होंने कहना शुरू किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जहर दिए जाने के कोई संकेत नहीं है।

जैसे जैसे श्रीदेवी के शव को स्वदेश लाए जाने में देरी हो रही थी, वैसे-वैसे समाचार चैनल तरह-तरह के शक पैदा करके और सुब्रमण्यन स्वामी जैसे नेताओं की बाइट चलाकर टीआरपी का खेल खेलना जारी रखे हुए थे। चूंकि देश में ऐसा कोई दूसरा विषय इस दौरान नहीं था, जो उन्हें टीआरपी दे सके, इसलिए उन्होंने श्रीदेवी को लेकर तरह-तरह के प्रोग्राम, बाइट्स और कयासों पर आधारित चर्चाएं जारी रखीं।

दुबई पुलिस ने यदि श्रीदेवी के पति बोनी कपूर के बयान दर्ज किए तो इस पर चर्चाएं चलाई गई जबकि यह किसी भी देश की पुलिस की जांच-पड़ताल की सामान्य प्रक्रिया है। वहां के सरकारी वकील ने पार्थिव शरीर को भारत ले जाने की आज्ञा देने में थोड़ा समय लगाया तो इस पर भी कयासबाजी का दौर शुरू हो गया। कुछ चैनलों ने तो यहां तक चला दिया कि पोस्टमार्टम दोबारा हो सकता है और पहले पोस्टमार्टम पर सरकारी वकील को यकीन ही नहीं है।

जबकि सार्वजनिक तौर पर सरकारी वकील ने किसी से कुछ भी नहीं कहा। जैसे ही प्रक्रियाएं समाप्त हुई, वैसे ही उन्होंने भी बोनी कपूर को क्लीन चिट दे दी। यह पहला मौका नहीं है, जब भारत के इलेक्ट्रोनिक मीडिया का यह बाल सुलभ व्यवहार इस तरह उजागर हुआ है। दर्शकों के एक बड़े वर्ग में टीआरपी के फेर में इतनी गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग से गहरी नाराजगी है। सोशल मीडिया के जरिये उसे देखा और महसूस किया जा सकता है। जो लोग किसी की मौत में भी अपने व्यापारिक हित देखने लगे हैं, उन्हें मंथन करना होगा कि यह पत्रकारिता है या कुछ और।

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