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Independence Day: देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के समर्थन में खड़े होते हैं राहुल गांधी

भारत को आजाद हुए 71 साल बीत गए। लेकिन आजादी को हमने अपने उदंड स्वभाव की ढाल मान लिया। अपनी आजादी के नाम पर दूसरों की आजादी में दखंलदांजी करने लगे। सद्भाव-भाईचारा, प्रेम और बंधुत्व सब बेमानी हो गए। सड़कों पर उत्पात मचाना, सार्वजनिक अर्थात अपनी ही सम्पत्ति को आग लगाना, प्राकृतिक संसाधनों को तहस नहस कर गंदगी फैलाकर हम राष्ट्र निर्माण से विमुख होते गए।

Independence Day: देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के समर्थन में खड़े होते हैं राहुल गांधी

भारत को आजाद हुए 71 साल बीत गए। लेकिन आजादी को हमने अपने उदंड स्वभाव की ढाल मान लिया। अपनी आजादी के नाम पर दूसरों की आजादी में दखंलदांजी करने लगे। सद्भाव-भाईचारा, प्रेम और बंधुत्व सब बेमानी हो गए। सड़कों पर उत्पात मचाना, सार्वजनिक अर्थात अपनी ही सम्पत्ति को आग लगाना, प्राकृतिक संसाधनों को तहस नहस कर गंदगी फैलाकर हम राष्ट्र निर्माण से विमुख होते गए।

अचरज की बात तो यह है कि कुछ लोग तो देश के टुकड़े-टुकड़े करने भी नारे लगाते हैं और कांग्रेस के राहुल गांधी जैसे नेता उनके समर्थन में जाकर खड़े हो जाते हैं। भारत में आजादी का सपना सिर्फ अंग्रेजों के राज से मुक्ति का ही नहीं था। वह भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और असमानता के खिलाफ एक साझी लड़ाई थी जो हम इतने सालों बाद भी जीत नही पाए हैं।

ऐसा नहीं है कि इस बीच हमने कुछ हासिल नहीं किया। बहुत कुछ हासिल किया लेकिन आजादी के साथ जो चुनौतियां जुड़ी थी, हम उनका कितना सामना कर पाये, यह सवाल हमें खुद से पूछना होगा। यह याद रखना होगा कि यह सवाल राजनीति का नहीं है। राजनीति से सवाल नहीं है। यह समाज का सवाल है। क्या जाति-मुक्त, क्या रूढ़िमुक्त, क्या क्षेत्रीयता मुक्त, क्या कर्मकांड मुक्त भारत बन सकेगा।

इसी सवाल के उत्तर पर भ्रष्टाचार मुक्त, विकसित भारत, समृद्ध भारत, गरीबी मुक्त भारत का भविष्य निर्भर करता है। आज इस समाज को अपने भीतर से एक उन्नत, मानवीय राजनीति को पैदा करने की जरूरत है जो व्यक्ति की गरिमा बढ़ा सके। आज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के 71 वर्ष पूरे हो गये हैं। लेकिन चाहे सड़कों, चैराहों पर आम नागरिकों के वाहन चलाने का दृश्य हो अथवा सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की बात हो,

हर जगह लोग व्यवस्था को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ किया हो या न हो लेकिन इतने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने भारत में अपनी उस आस्था और विश्वास का एहसास देश को जरूर दिलाया है कि जो काम इस देश के नेता नहीं कर सकते। वे कहते हैं, ‘मैं आशावादी इंसान हूं' हमें भी ऐसा ही होना चाहिए।' यह बात अलग है कि राज्य के सहयोग के बगैर आशावाद की उम्र बहुत छोटी होती है।

सभी क्षेत्रों में नीतियों को लागू करने के लिए राजकाज बुनियादी जरूरत है। नौकरशाही की अड़चनें और नकारात्मक रवैया अच्छे से अच्छे इरादों की भी कब्र खोद सकता है। अमत्र्य सेन जब कहते हैं कि कोई भी देश स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश किये बगैर जीडीपी का रूपांतरण नहीं कर पाया है, तो उसका मतलब यही होता है कि कोई भी देश अपने नागरिकों को सशक्त बनाए बगैर बदलाव नहीं ला सकता।

जापान से लेकर दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, थाईलैंड और चीन तक पूर्वी एशिया से हमारे पास कई उदाहरण मौजूद हैं जहां तीव्र विकास की नींव रखने के लिए एक ओर तो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दी गई और दूसरी तरफ आर्थिक वृद्धि को तरजीह दी गई। भारत ने लोकतंत्र का पहला पड़ाव 1952 में तब पूरा किया था जब यहां पहली बार आम चुनाव हुये।

इसके बाद 15 और आम चुनाव कराये जा चुके हैं और सत्ता एक पार्टी से दूसरी पार्टी के हाथ में आती-जाती रही है। गठबंधन सरकारें भी अच्छे ढंग से चली और शांति बनी रही। इसके बाद पिछले लोकसभा के चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला। उन्होंने सरकार के कामकाज में पारदर्शिता को सबसे अधिक प्रमुखता दी और केन्द्र सरकार के विभागों के कामकाज के तौर तरीकों में भारी सुधार करके भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई।

कोयला खदानों और स्पेक्ट्रम की जिस नीलामी को लेकर यूपीए सरकार पर लाखों करोड़ रुपये के घपलों-घोटालों के आरोप लगे और अदालत ने उनकी नीलामी रद कर दिया था। उन कोयला खदानों और स्पेक्ट्रम की मोदी सरकार ने फिर से नीलामी की और सरकार को इससे तीन लाख करोड़ रूपये से अधिक की आय हुई है। इन सबसे जाहिर होता है कि यह देश अब बदल रहा है।

दुनिया में हमारी साख बढ़ी है। उसकी महानता कभी-कभी आंकड़ों के आगे बौनी पड़ जाती है तो कभी और बढ़ जाती है। मिसाइल बनाने से लेकर निर्यातक देश बनने के साथ-साथ मंगल अभियान की सफलता ने दुनिया को एक नये भारत का एहसास कराया है। लेकिन इन उपब्धियों के साथ जब हम 72वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं तो कुछ कड़वी सच्चाइयां भी हैं।

एक युवा राष्ट्र के तौर पर हमारी औसत आयु चीन के 32.7 वर्ष की तुलना में 24.9 वर्ष है। लेकिन भारत के लोगों के औसत जीवनकाल 64.71 वर्ष की तुलना में चीनियों का औसत जीवन काल 72.58 वर्ष है। 2.30 करोड़ व्यक्ति रोजाना भारतीय फिल्में देखते हैं जबकि अमेरिका में यह संख्या दो करोड़ है। औपचारिक प्रभु सत्ता के 71 वर्षो और वैश्वीकरण के साथ अपने प्रयोग के लगभग ढाई दशकों में हमारी एक बड़ी चुनौती बहुलता की इस विरासत के स्वामित्व को बनाये रखना है।

एक तरफ जहां फूलता फलता मध्य वर्ग सम्पन्न कारपोरेट जगत की मलाई खा रहा है, वहीं भूखे आमतौर पर भूखे ही रहते है। कुपोषण के मामले में भारत दुनिया में पहले नम्बर पर आता है। विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिज सरीखे वैश्वीकरण के पैरोकारों ने भी माना है कि ‘कहीं कुछ भारी गलत हुआ है।' वैश्वीकरण उन लोगों के जीवन को बेहतर नहीं बना रहा है।

जिनके लिए इसके फायदे गिनाए गए थे। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उज्जवला, सौभाग्य, दुर्घटना बीमा जैसी योजनाओं से गरीबों के जीवन में भी कुछ खुशियां आई हैं। पर जब हम लोगों को अपनी ही जमीन से उखाड़ने वाले विकास के विवादास्पद तरीकों को अपनाते हैं तो हम भारत का स्वामित्व अपने ऊपर कैसे ले सकते हैं? कार, घर और प्लाज्मा टीवी खरीदने वाले मध्य वर्ग के लोगों की संख्या जितनी बढ़ती जा रही है उतना ही हम राष्ट्रीय समुदाय का हिस्सा कम बनते जा रहे हैं।

इस विरोधाभास को क्या कहेंगें? क्या इस आर्थिक विकास से जिसका गुणगान जीडीपी के आंकड़ें करते हैं, सबका विकास हुआ है? आज जब हम एक राष्ट्र, मूल रूप से एक सामूहिक अस्तित्व के रूप में 71 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं हम कुछ चीजों का स्वामित्व खत्म होने पर क्यों चिंतित हैं? प्राथमिक शिक्षा में सरकारी-प्राइवेट की खाई ने समाज को पहले ही बांट दिया है।

ऐसे में निजीकरण के क्या निहितार्थ हैं? क्या ये सवाल जश्न के इस माहौल को खराब करने वाले हैं? शायद। लेकिन जश्न मनाने के लिए हमें जिस परम्परा की सबसे अधिक जरूरत है, वह है खुद के बारे में सवाल पूछने की और उस पर पुनर्विचार करने की परम्परा। ऐसा करने पर ही हम भारत का स्वामित्व और सामूहिक रूप से अपने ऊपर ले सकते हैं।

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