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ओमकार चौधरी का लेख : हैदराबाद से दक्षिण के द्वार खुलेंगे

चेन्नई में अमित शाह का अच्छा ख़ासा स्वागत हुआ है। अन्नाद्रमुक में तीन गुट बन गए हैं। जब तक सरकार है, वो लड़ाई झगड़े के बावजूद साथ में हैं। चुनाव क़रीब आएंगे तो उनमें हितों का टकराव शुरू होगा। टूट-फूट में कौन कहां जाएगा-रहेगा, कहना मुश्किल है पर भाजपा आने वाले विधानसभा चुनाव में ठीक ठाक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए उनमें किसी गुट को साथ रखना चाहेगी। जब से लव जेहाद का हल्ला शुरू हुआ है, तब से मिशनरी भी भाजपा के क़रीब आई हैं। भाजपा अपना रास्ता बनाने की कोशिश कर रही है, जिसमें उसे सफलता मिलती दिखने लगी है।

ओमकार चौधरी का लेख :  हैदराबाद से दक्षिण के द्वार खुलेंगे
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ओमकार चौधरी

सबकी निगाहें हैदराबाद के नतीजों पर टिकी हुई थीं। सब यह जानने को उत्सुक थे कि एक म्युनिसिपल कारपोरेशन के चुनाव को भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इतना महत्व क्यों दे रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह, उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर और तेजस्वी सूर्या जैसे नेताओं वहां रोड शो करने पहुंचे हैं और जनसभाओं में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव और असददुद्दीन ओवैसी पर जमकर बरसे हैं। शुक्रवार को शुरुआती रुझान मिलने शुरू हुए तो लोग यह देखकर उछले कि 150 के म्युनिसिपल कारपोरेशन में भाजपा 85 सीटों पर लीड ले रही है।

बाद में हालांकि यह लीड घट गई और टीआरएस आगे हो गई, परंतु पिछले चुनाव में मात्र चार सीटें हासिल करने वाली भाजपा जब दूसरे स्थान पर बनी रही तो लोगों को अहसास हुआ कि दरअसल अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और दूसरे दिग्गज नेता वहां प्रचार के लिए क्यों गए थे। अब अंतिम नतीजे सामने हैं। टीआरएस सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी बहुमत से दूर रह गई है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई है और भाजपा 48 सीटें पाकर बारह गुणा शक्ति के साथ दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है। इस करिश्माई नतीजे के बाद राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि हैदराबाद ने भाजपा के लिए दूसरे दक्षिणी राज्यों में संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

दक्षिण की बात करें तो कर्नाटक को छोड़कर भाजपा का अन्य प्रदेशों में प्रभाव और जनाधार नगण्य ही रहा है। कर्नाटक में जरूर उसका व्यापक जनाधार रहा, जो लोकसभा चुनावों में भी दिखता रहा और विधानसभा में भी। कर्नाटक में उसकी सरकारें भी रहीं, परंतु आश्चर्यजनक रूप से वह आस-पड़ोस के दूसरे प्रदेशों में पैर पसारने में नाकाम रही, लेकिन 2013 में जब भाजपा और राजग ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो न केवल समस्त उत्तर भारतीय प्रदेशों में इसका असर दिखा वरन पश्चिम से लेकर पूर्वोत्तर तक व्यापक असर देखा गया। जहां कुछ ख़ास असर नहीं था, उन दक्षिण राज्यों में भी भाजपा सात से तेरह प्रतिशत तक वोट हासिल हुए। ऐसे कई राज्य हैं, जहां भाजपा अकेले दम पर बहुमत ले आती रही है। कुछ में उसने सहयोगी तलाश किए। इससे उसे सफलता हासिल हुई परंतु तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य रहे जहां सहयोगी भी मुश्किल से मिले और दो मिले वो अपना वोट भाजपा को ट्रांसफ़र कराने में नाकाम सिद्ध हुए। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मौहाल थोड़ा सा बदलता हुआ दिखाई दिया। केरल में लोकसभा चुनाव में सीटें भले न मिली हों पर भविष्य के लिए उम्मीद जगाने लायक़ वोट शेयर ज़रूर मिला। तमिलनाडु में भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के समय-समय पर दौरे शुरू हुए। इसका एक असर वहाँ के जनमानस पर पड़ा।

हैदराबाद संयुक्त आंध्र प्रदेश की राजधानी रहा है। ऐतिहासिक शहर है। आज़ादी के समय जिन रियासतों ने भारतीय संघ में विलय के मामले में आनाकानी थी, उनमें हैदराबाद के निज़ाम भी थे। यहां का राजनीतिक मिज़ाज भी थोड़ा अलग ही रहा है। देश के अन्य हिस्सों में जैसे बदलाव हुए, वैसे यहां कम ही देखने को मिले परंतु हाल के वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनका प्रभाव यहां के जनमानस पर भी देखने को मिल रहे हैं। मौजूदा राजनीति की बात करें तो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का यहाँ के एक वर्ग पर अच्छा ख़ासा प्रभाव है। जब से हैदराबाद म्युनिसिपल कारपोरेशन का गठन हुआ है, तब से तीन चुनाव हो चुके हैं। पहले दो चुनाव में भाजपा की उपस्थिति नगण्य सी रही परंतु 2020 के इस चुनाव में उसने सबको चौंकाया है। वह चार से अड़तालीस सीटों पर पहुंच गई है और यही वह करिश्मा है, जिसके बाद यह चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि क्या अब भाजपा के लिए उन दक्षिणी राज्यों के द्वार खुल सकते हैं, जहां उसे कभी कामयाबी नहीं मिली। यानी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल। कर्नाटक में वह सत्ता में है। हैदराबाद में इस बार विपक्ष की भूमिका में आ गई है। 2023 में उसने तेलंगाना में अपनी सरकार बनाने का संकल्प लेकर इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं।

आंध्र प्रदेश में इस समय कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी कमजोर कड़ी दिखाई दे रही हैं। इनकी क़ीमत पर भाजपा वहां आगे बढ़ सकती है। हैदराबाद आंध्र की राजधानी रही है। टीडीपी का वहां शासन रहा है। मौजूदा हैदराबाद का स्वरूप गढ़ने में चंद्रबाबू नायडु की भी भूमिका रही है परंतु हैदराबाद के चुनाव में उनकी पार्टी का हाशिये पर होना क्या दर्शाता है। राजग से अलग होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की मुखालफत करने वालों की मुहिम में वह सबसे आगे थे। उनकी स्वयं की राज्य सरकार भी गई और लोकसभा चुनाव में भी जनता ने उन्हें नकार दिया। चाहे चंद्रबाबू हों या चंद्रशेखर राव, ये अतीत में कांग्रेस के गर्भ से ही निकले हैं। ऐसे में जबकि पूरे देश में भाजपा धीरे-धीरे कांग्रेस के जनाधार को आत्मसात करती जा रही है, ऐसे में इन दोनों राज्यों में उसके लिए ऐसा करना असंभव नहीं लग रहा। हो सकता है, उसके लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ें।

एम करुणानिधि और जे जयललिता के निधन के बाद अब तमिलनाडु की राजनीति डावांडोल स्थिति में है। द्रमुक ने लोकसभा चुनाव में बेशक अच्छा प्रदर्शन किया है परंतु विधानसभा चुनाव की जहां तक बात है, वहाँ कई ताक़तें ज़ोर आजमाइश करने वाली हैं। रजनीकांत अपनी पार्टी की घोषणा करने वाले हैं। भाजपा भी सक्रिय हो गई है। चेन्नई में अमित शाह का अच्छा ख़ासा स्वागत हुआ है। अन्नाद्रमुक में तीन गुट बन गए हैं। जब तक सरकार है, वो लड़ाई झगड़े के बावजूद साथ में हैं। चुनाव करीब आएंगे तो उनमें हितों का टकराव शुरू होगा। टूट-फूट में कौन कहां जाएगा-रहेगा, कहना मुश्किल है पर भाजपा आने वाले विधानसभा चुनाव में ठीकठाक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए उनमें किसी गुट को साथ रखना चाहेगी। रजनीकांत भी साथ होंगे तो भाजपा का काम आसान हो सकता है।

केरल में उसे लोकसभा चुनाव में तेरह प्रतिशत से कुछ अधिक वोट शेयर मिला है। वह काफ़ी आशाएं जगाता है। जब से लव जेहाद का हल्ला शुरू हुआ है, तब से वहां की मिशनरी भी भाजपा के क़रीब आई हैं क्योंकि केरल में बहुत सी क्रिश्चियन युवतियां इसकी शिकार हुई हैं। वहाँ मुख्यतः दो फ्रंट हैं। एक कांग्रेस की अगुवाई वाला। दूसरा वाम मोर्चा का। मुस्लिम लीग की भी वहां ठीकठाक उपस्थिति रही है। इन सबके बीच से भाजपा अपना रास्ता बनाने की कोशिश कर रही है, जिसमें उसे अब सफलता मिलती हुई भी दिखने लगी है। इसलिए देर-सवेर दक्षिण के इन राज्यों में भी कमल खिलता हुआ दिखाई दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा।

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