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आलोक पुराणिक का लेख : कम होते संसाधन संग्रह के स्रोत

कोरोना से जूझती अर्थव्यवस्था में सरकार के संसाधन संग्रह के साधन कमजोर हो रहे हैं। यह अलग बात है कि जीएसटी संग्रह ने हाल में कुछ सकारात्मक प्रवृत्तियां दिखाई हैं, पर कोरोना की 2021 की लहर में वे प्रवृत्तियां कितनी मजबूत बनी रहेंगी, यह अभी देखना होगा। 99,122 करोड़ रुपये की रकम मोटे तौर पर इतनी है जितनी रकम जीएसटी से एक महीने में जुटायी जाती रही है। यानी एक तरह से केंद्र सरकार को एक महीने का जीएसटी बैठे बिठाये मिल गया है। रिजर्व बैंक ने सहयोगी रुख दिखाया, जो अपेक्षित है।

आलोक पुराणिक का लेख : कम होते संसाधन संग्रह के स्रोत
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आलोक पुराणिक

भारतीय रिजर्व बैंक के बोर्ड ने 31 मार्च 2021 को समाप्त नौ महीने की लेखा अवधि के लिए केंद्र सरकार को सरप्लस के रूप में 99,122 करोड़ रुपये के ट्रांसफर को मंजूरी दी है। रिजर्व बैंक ने ने अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 की दूसरी लहर के प्रकोप को कम करने के लिए वर्तमान आर्थिक स्थिति, वैश्विक और घरेलू चुनौतियों और हाल के नीतिगत उपायों की भी समीक्षा की है और जाहिर है कि 99,122 करोड़ रुपये की रकम केंद्र सरकार के खाते में आने से सरकार की वित्तीय स्थिति में सुधार होगा। कोरोना से जूझती अर्थव्यवस्था में सरकार के संसाधन संग्रह के साधन कमजोर हो रहे हैं। यह अलग बात है कि जीएसटी संग्रह ने हाल में कुछ सकारात्मक प्रवृत्तियां दिखाई हैं, पर कोरोना की 2021 की लहर में वे प्रवृत्तियां कितनी मजबूत बनी रहेंगी, यह अभी देखना होगा। 99,122 करोड़ रुपये की रकम मोटे तौर पर इतनी है जितनी रकम जीएसटी से एक महीने में जुटायी जाती रही है। यानी एक तरह से केंद्र सरकार को एक महीने का जीएसटी बैठे बिठाये मिल गया है। रिजर्व बैंक ने सहयोगी रुख दिखाया, जो अपेक्षित है।

बैंकिंग जगत में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत बैड बैंक का विचार आगे बढ़ा है। बैंक करीब 80 बड़े एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) यानी फंसे कर्ज वाले खाते राष्ट्रीय संपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एनएआरसीएल) को हस्तांतरित कर सकते हैं। एनएआरसीएल के अगले महीने तक परिचालन में आने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में घोषित एनएआरसीएल बैड बैंक का नाम है। बैड बैंक से मतलब ऐसे वित्तीय संस्थान से है जो बैंकों के फंसे कर्ज खातों को अपने कब्जे में लेता है और उनका निपटारा करता है। सूत्रों के अनुसार इनमें प्रत्येक एनपीए खाते का आकार 500-500 करोड़ रुपये से अधिक है और बैंकों ने ऐसे करीब 70-80 खातों की पहचान की है जिन्हें प्रस्तावित बैड बैंक को हस्तांतरित किया जाएगा। मोटे अनुमान के मुताबिक करीब दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का फंसा कर्ज बैंकों के बही-खातों से बाहर होगा और बैड बैंक के जिम्मे जाएगा।

आरबीआई ने साफ किया है कि जो कर्ज धोखाधड़ी वाली श्रेणी में हैं, उसे एनएआरसीएल को नहीं बेचा जाएगा। रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार 1.9 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को धोखाधड़ी वाले ऋण की श्रेणी में रखा गया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के बजट में कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अपने फंसे कर्ज के एवज में अधिक मात्रा में प्रावधान करना पड़ता है। इसे ठीक करने के लिए बैंकों के बही-खातों को दुरुस्त करने को लेकर कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने अपने बजट भाषण में कहा था, 'दबाव वाले कर्ज यानी फंसी संपत्ति को निकालने और उसका निपटान करने के लिए 'संपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लि. और संपत्ति प्रबंधन कपंनी का गठन किया जाएगा। वित्त मंत्री के अनुसार उसके बाद इन संपत्तियों का प्रबंधन और निपटान वैकल्पिक निवेश कोष तथा अन्य संभावित निवेशकों के जरिये किया जाएगा। बैड बैंक कर्ज के लिए तय मूल्य का 15 प्रतिशत नकद देगा जबकि शेष 85 प्रतिशत सरकारी गारंटी वाली प्रतिभूतियों के रूप में होगा। देखना होगा कि बैड बैंक का विचार किस तरह से जमीन पर उतरता है। बैड बैंक का विचार अगर कामयाब हुआ तो सरकारी बैंकों के लिए एक बड़ी राहत वाली बात होगी। सरकारों बैंकों के ऊपर डूबत कर्जों का बड़ा बोझ है। कोरोना की वजह से तमाम कर्जदार अपने कर्ज वापस करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। ऐसे में कोरोना की इस लहर में डूबत कर्जों की तादाद बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता है। बैड बैंक ऐसे कर्जों पर हल दे पाए, तो बैंकिंग जगत और अर्थव्यवस्था का भला होगा।

तीसरी लहर की चुनौतियां

अब कोरोना की तीसरी लहर की बात होने लगी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना की तीसरी लहर की आशंका जतायी है। कोरोना की पहली लहर से पहली चुनौती यह है कि किस तरह से लाकडाऊन, बंद अर्थव्यवस्था में आम आदमी अपनी कमाई भी करे और कोरोना से निपटने का इंतजाम भी करे। महंगाई बड़ी समस्या के तौर पर सामने आई है। थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति अप्रैल 2021 में 10.49 फीसदी की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई। थोक महंगाई बढ़ी है, तो कुछ समय बाद खुदरा स्तर पर महंगाई बढ़ी हुई दिखेगी। कोरोना के एक साल ने मध्यवर्ग की कमर तोड़ दी है। 23 करोड़ लोगों के लिए 375 रुपये की दिहाड़ी कमाना मुश्किल है। अजीज प्रेमजी विश्वद्यालय द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार पिछले साल अप्रैल-मई 2020 में किए गए लॉकडाउन के बाद 10 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई। जून 2020 तक बहुत से लोग अपने घर वापस चले गए। इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 के आखिरी महीने तक भी देश में डेढ़ करोड़ से अधिक लोगों को जीवन यापन के लिए काम नहीं मिला। 45 फीसदी कामकाजी महिलाओं को नौकरी से निकाल दिया गया।

कुल मिलाकर रोजगार के मामले में 2021 के हाल 2020 से बहुत अलग नहीं हैं। आय सिकुड़ रही हो और महंगाई बढ़ रही हो, तो क्या हो सकता है, जीवन स्तर में गिरावट। एक अनुमान के मुताबिक कोरोना की वजह से 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए। दवाओं की कालाबाजारी और अस्पतालों की लूट ने आम आदमी की जर्जर अर्थव्यवस्था और कमजोर कर दिया है। आर्थिक स्तर पर सरकार को कुछ ऐसी योजना बनानी होगी कि निम्न आय वर्ग और निम्न मध्यम आय वर्ग की अस्तित्व रक्षा हो। ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा योजना अस्तित्व रक्षा में योगदान दे देती है। शहरों के लिए भी ऐसी योजना पर विचार करना होगा।

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