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प्रमोद जोशी का लेख : जोर से नहीं, संवाद से करें हल

सवाल यह है कि किसानों को भरोसे में लिए बगैर क्या कृषि-सुधार लागू किए जा सकते हैं? दूसरे यह भी देखना होगा कि क्या सरकारी व्यवस्थाएं कुशलता के साथ संचालित हो पा रही हैं? क्या किसानों को सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का सामना नहीं करना पड़ता है? इस सिलसिले में सरकार और किसानों के बीच संवाद और संचार को बढ़ाने की जरूरत है। किसानों की गलतफहमियों को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका संवाद करना ही है। समझदारी इस बात में थी कि सरकार इस आंदोलन की स्थितियां तैयार ही नहीं होने देती। लेकिन जब प्रदर्शनकारी चल पड़े, तो उन्हें रोकने के लिए दमनकारी प्रयास नहीं करने चाहिए थे।

प्रमोद जोशी का लेख : जोर से नहीं, संवाद से करें हल
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प्रमोद जोशी

हरियाणा और दिल्ली में पुलिस के साथ हुए दो दिन के संघर्ष के बाद आखिरकार केंद्र सरकार ने शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश करने और अपने आंदोलन-प्रदर्शन को जारी रखने की अनुमति दे दी। इससे कुछ देर के लिए टकराव टल गया है, पर समस्या का समाधान नहीं निकला है। सच यह है कि केंद्र सरकार ने बहुत गलत मोड़ पर, गलत समय पर और गलत तरीके से किसान आंदोलन से निपटने की कोशिश की है। इसे जल्द से जल्द दुरुस्त किया जाना चाहिए था। संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध की अनुमति देने के केंद्र के कदम से यह संकेत मिलता है कि सरकार हमारी मांगें मानने के लिए भी तैयार होगी। किसान अब भी उद्वेलित हैं, पर कम से कम कहा जा सकता है कि उनकी भावनाओं का सम्मान किया गया।

सरकार की पहली भूल यह है कि वह इस आंदोलन को विरोधी दलों की राजनीति से प्रेरित बता रही है। संभव है कि इसके पीछे राजनीतिक दल भी हों, या कम से कम उनकी मनोकामना इसे बढ़ाने या भड़काने में हों, पर यदि इसे पूरी तरह राजनीति से प्रेरित कहेंगे, तो इसका मतलब यह निकाला जाएगा कि किसानों का सरकार पर से विश्वास खत्म हो गया है। विरोधी दल तो यही चाहेंगे। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने शुक्रवार को कहा कि केंद्र में जिस दिन हमारी सरकार बनेगी उसी दिन इन 'काले कानूनों' को निरस्त कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी पार्टी किसानों की मांगों को पूरा कराने के लिए उनके साथ कंधे से कंधा मिलकर खड़ी है।

सच यह है कि कांग्रेस ने लोकसभा के पिछले चुनाव में अपने घोषणापत्र में इस आशय के कानून बनाने का वादा किया था, पर सरकार को समझना चाहिए कि किसान किसी के बहकावे में क्यों आएंगे? क्या वे अपना हित-अहित नहीं समझते हैं? किसान तीन कृषि कानूनों को रद करने की मांग के साथ यह गारंटी चाहते हैं कि कोई फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे न खरीदी जाए। इसके अलावा वे बिजली अधिनियम मसौदा को निरस्त कराना चाहते हैं जिससे उन्हें रियायती बिजली में कुछ बदलाव की आशंका दिख रही है। सरकार जिन तीन नए कानूनों को लेकर आई है, उनमें भंडारण की सीमा को लेकर हुए बदलाव पर किसानों की दिलचस्पी ज्यादा नहीं लगती है। कांट्रैक्ट फार्मिंग की बहुत सी बातें भी वे मान सकते हैं। सबसे ज्यादा आपत्ति कृषि मंडियों के एकाधिकार की समाप्ति और अंततः न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की समाप्ति के अंदेशे को लेकर है। वस्तुतः कृषि मंडियों का मसला सीधे किसानों का नहीं होकर आढ़तियों तथा उनसे जुड़ी व्यवस्था से भी है। राज्य सरकारों को मिलने वाला टैक्स भी एक विचारणीय विषय है।

सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन आशंकाओं को दूर करे और जरूरी हो, तो व्यवस्थाओं में बदलाव करे, ताकि किसानों और इस काम से जुड़े दूसरे व्यक्तियों को नुकसान न होने पाए। समझदारी इस बात में थी कि सरकार इस आंदोलन की स्थितियां तैयार ही नहीं होने देती। फिर जब प्रदर्शनकारी चल पड़े, तो उन्हें रोकने के लिए दमनकारी प्रयास नहीं करने चाहिए थे। सीमा पर कंटीले तार लगाना, रेत से लदे ट्रकों को लगाना आंसू गैस, वॉटर कैनन और लाठी वगैरह के इस्तेमाल की क्या जरूरत थी? संभव है कि भीड़ के बीच कुछ अराजक तत्व भी प्रवेश का प्रयास करें, तो उन्हें पकड़ने का इंतजाम होना चाहिए, पर सीमाओं को सील करने की जरूरत नहीं थी। सरकार को इस आंदोलन के राजनीतिक नफा-नुकसान पर सोचना बंद करके सबसे पहले किसानों के प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए और उनकी वाजिब बातों को समझना चाहिए।

कानूनों को लाने के पहले ही बड़े स्तर पर किसान प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था। सरकार कहती है कि ये कानून किसानों के लिए लाभकारी हैं, तो किसानों को यह बात समझ में क्यों नहीं आ रही है? केंद्र ने आंदोलन करने वालों से दो दौर की बातचीत की भी है और 3 दिसंबर को एक बार फिर से बातचीत की जाएगी, पर अनौपचारिक बात तो किसी भी वक्त की जा सकती है। कई कैबिनेट मंत्रियों और अन्य लोगों ने पंजाब का दौरा किया है। बहरहाल किसानों के समझदार प्रतिनिधियों के साथ बात करके रास्ता निकालना चाहिए और यह काम जल्द से जल्द होना चाहिए। क्या वजह है कि किसान अपने आप को व्यवस्था से कटा हुआ महसूस कर रहा है। इन बातों के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। इन कानूनों के कारण पंजाब में अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ना ठीक समझा। पंजाब में किसानों को नाराज करके राजनीति फिलहाल सफल नहीं हो सकती।

संभव है कि सरकार इसके राजनीतिक निहितार्थ से निपट ले, पर इस आंदोलन का ज्यादा बड़ा असर कृषि सुधारों पर पड़ने वाला है, जिनकी खातिर सरकार तीन कानून लेकर आई है। कृषि सुधार का काम केवल इन तीन कानूनों तक सीमित नहीं है। सरकार यूरिया कीमतों पर से नियंत्रण हटाने की योजना बना रही है। इसके स्थान पर किसानों को राहत देने के लिए फर्टिलाइजर सब्सिडी सिस्टम लागू कर सकती है। उसी तरह जैसे एलपीजी की धनराशि खाते में आती है। एमएसपी के स्थान पर भी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की प्रणाली लागू करने का सुझाव है।

सवाल यह है कि किसानों को भरोसे में लिए बगैर क्या कृषि-सुधार लागू किए जा सकते हैं? दूसरे यह भी देखना होगा कि क्या सरकारी व्यवस्थाएं कुशलता के साथ संचालित हो पा रही हैं? क्या किसानों को सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार का सामना नहीं करना पड़ता है? सरकार जन-धन, आधार और मोबाइल फोन की शक्ति-त्रयी की मदद से ग्रामीण क्षेत्र में बदलाव लाना चाहती है। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम मूलतः ग्रामीण क्षेत्रों को तो तकनीक की मदद से जोड़ने और डिजिटल तकनीक के सहारे नए रोजगार पैदा करने और खेतिहर व्यवस्था को पुष्ट करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। यह सब बहुत सकारात्मक है, पर सुधार करने हैं, तो छिपकर क्यों करें?

इस सिलसिले में सरकार और किसानों के बीच संवाद और संचार को बढ़ाने की जरूरत भी है। संभव है कि सरकार के इरादों को लेकर किसानों को कुछ गलतफहमियां हों। और संभव यह भी है कि सरकार को किसानों के इरादों को लेकर कुछ गलतफहमियां हों। गलतफहमियों को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका संवाद करना ही है।

तीन कानूनों पर किसानों को क्या है डर

1. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020

किसानों को डरः एमएसपी का सिस्टम खत्म हो जाएगा। किसान अगर मंडियों के बाहर उपज बेचेंगे तो मंडियां खत्म हो जाएंगी। ई-नाम जैसे पोर्टल का क्या होगा?

सरकार का पक्ष : एमएसपी पहले की तरह जारी रहेगी। मंडियां खत्म नहीं होंगी, बल्कि वहां भी पहले की तरह ही कारोबार होता रहेगा। नई व्यवस्था से किसानों को मंडी के साथ-साथ दूसरी जगहों पर भी फसल बेचने का विकल्प मिलेगा। मंडियों में ई-नाम ट्रेडिंग जारी रहेगी।

2. कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक

किसानों को डरः कॉन्ट्रैक्ट या एग्रीमेंट करने से किसानों का पक्ष कमजोर होगा। वो कीमत तय नहीं कर पाएंगे। छोटे किसान कैसे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करेंगे? विवाद की स्थिति में बड़ी कंपनियों को फायदा होगा।

सरकार का पक्ष : कॉन्ट्रैक्ट करना है या नहीं, इसमें किसान को पूरी आजादी रहेगी। वो अपनी इच्छा से दाम तय कर फसल बेच सकेंगे। देश में 10 हजार फार्मर्स प्रोड्यूसर ग्रुप्स (एफपीओ) बन रहे हैं। ये एफपीओ छोटे किसानों को जोड़कर फसल को बाजार में सही कीमत दिलाने का काम करेंगे। विवाद की स्थिति में कोर्ट-कचहरी जाने की जरूरत नहीं होगी। स्थानीय स्तर पर ही विवाद निपटाया जाएगा।

3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020

किसानों को डर : बड़ी कंपनियां आवश्यक वस्तुओं का स्टोरेज करेगी। इससे कालाबाजारी बढऐगी।

सरकार का पक्ष : किसान की फसल खराब होने की आंशका दूर होगी। वह आलू-प्याज जैसी फसलें बेफिक्र होकर उगा सकेगा। एक सीमा से ज्यादा कीमतें बढ़ने पर सरकार के पास उस पर काबू करने की शक्तियां तो रहेंगी ही। इंस्पेक्टर राज खत्म होगा और भ्रष्टाचार भी।

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