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प्रभात कुमार रॉय का लेख : कांग्रेस की देन 'सॉफ्ट स्टेट'

विश्व में भारतीय सत्ता के छवि एक सॉफ्ट स्टेट की रही है। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक उदारवादी आदर्शवादी राजनेता के रूप में छवि बनाई। इसी सॉफ्ट स्टेट की छवि के कारण ही अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर में धावा बोल कर कब्जा जमा लिया और नेहरू ने एकतरफा सीजफायर की घोषणा कर दी। इसके बाद भी इसी छवि का फायदा उठाते हुए चीन ने भी धावा बोला और भारत इस छवि का खामियाजा भुगतता रहा है, लेकिन मोदी सरकार ने पाक़ प्रायोजित जेहादी हमलों के जवाब में सैन्य कार्यवाही अंजाम देने की रणनीति अख्तियार की है और भारतीय राजसत्ता के नरमपंथी आचरण को परिवर्तित करने का कुछ प्रयास किया है।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : कांग्रेस की देन सॉफ्ट स्टेट
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

विश्वपटल पर भारतीय राजसत्ता के चाल चेहरे और चरित्र की वास्तविक छवि एक अत्यंत नरमपंथी राजसत्ता (सॉफ्ट स्टेट) के तौर स्थापित हुई है। वर्ष 1947 में वस्तुतः विभाजन के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे से भारत आज़ाद हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पं.जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राजसत्ता को संभाला। स्वतंत्रता सेनानी रहे पं. नेहरू ने एक उदार आदर्शवादी राजनेता के रूप में अपना किरदार निभाया। अक्टूबर 1947 में कबायली नक़ाब में जब पाक फौज ने कश्मीर पर धावा बोला तो पाक़ फौज़ को निर्णायक शिकस्त देकर संपूर्ण कश्मीर पर आधिपत्य जमाने के स्थान पर पं. नेहरू ने एक तरफा युद्ध विराम का ऐलान किया और दुर्भाग्यपूर्ण तौर पर रणनीतिक ब्लंडर अंजाम देकर पं. नेहरू कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों ने कश्मीर विवाद पर भारत विरोधी नज़रिया अपनाया, किंतु सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में तीन बार भारत के पक्ष में वीटो करके भारतीय कश्मीर को पश्चिमी राष्ट्रों की सैन्य दखंलदाजी से बचा लिया।

कम्युनिस्ट चीन ने 1950 में तिब्बत पर सैन्य आधिपत्य जमा लिया। इसके विरुद्ध नेहरू सरकार खामोश बनी रही और चीन और भारत के मध्य सदियों से कायम रही बफर स्टेट तिब्बत का चीन में विलय होने दिया। भारतीय राजसत्ता के आदर्शवादी नरम चरित्र को भांपकर चीन सरकार ने सरहद पर मैकमोहन लाइन को दरकिनार करके आक्साई चीन तथा लद्दाख के अन्य सीमावर्ती भारतीय इलाकों पर अपना कब्जा जमा लिया। भारतीय राजसत्ता के नरम चरित्र के कारण ही 1962 में चीन ने भीषण हमला कर दिया। इस हमले के दौर में भारत के प्रति तत्कालीन विश्व की दोनों महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ ने दोस्ताना रुख दिखाया। तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति जॉनएफ कैनेडी और तत्कालीन सोवियत प्रधानमंत्री निकिता खुरुश्चोव ने भारत को सैन्य मदद देने का ऐलान कर दिया। दो महाशक्तियों द्वारा भारत का समर्थन और मदद का ऐलान करने से चीनी हुकूमत ने घबरा कर सीजफायर की घोषणा की। भारतीय राजसत्ता के नरम चरित्र को दृष्टिगत रखते हुए ही कश्मीर को सैन्य शक्ति के बलबूते हथियाने के लिए पाक़ राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने ऑपरेशन जिबराल्टर के तहत 1965 में सैन्य हमला किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाक़ फौज़ को शिक़स्त दी और इच्छोदिल नहर को पार करते हुए भारतीय सेना लाहौर तक पंहुच गई। पाक़िस्तान वस्तुतः अमेरिका के मिलिट्ररी एलान्य सैंटो का सदस्य देश था और पश्चिमी हथियारों से लैस मुल्क था।

गुटनिरपेक्ष भारत को किसी मुल्क की सैन्य मदद हासिल न थी। ताशकंद में समझौता अंजाम दिया, जिसमें भारत को अपने सैन्य विजित इलाके छोड़ने पड़े। ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की असामायिक मृत्यु हो गई। वर्ष 1966 इंदिरा गांधी के शासन का दौर प्रारम्भ हुआ और 1971 के बांग्लादेश युद्ध में पाक़ फौज़ को भारतीय सेना ने निर्णायक तौर पर पराजित किया। तकरीबन 93 हजार पाक़ फौजियों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया। 1972 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री जुल्फीकारअली भुट्टो के मध्य शिमला समझौता संपन्न हुआ, किंतु 93 हजार पाक़ फौजियों को वापस करने के बदले में भारत ने अपने लिए कुछ भी हासिल नहीं किया। यदि भारतीय राजसत्ता का चरित्र आदर्शवादी तौर इतना अधिक नरम और उदार ना हुआ होता और व्यावहारिक तौर पर कुछ सख्त मिज़ाज का हुआ होता तो कश्मीर और गिलगित के इलाके आज पाक़ के आधिपत्य में ना होकर हमारे देश के भू-भाग होते और कश्मीर के रक्तरंजित विवाद का निदान 1972 के शिमला समझौते के तहत ही हो गया होता। कूटनीतिक तौर पर जो भी ऐतिहासिक गलतियां पं. नेहरू के कार्यकाल में हुईं, वस्तुतः उसी स्तर की कूटनीतिक गलतियां उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने भी की।

चीन और पाकिस्तान की सैन्य आक्रमकता और कुटिल साजिशों का प्रतिउत्तर देने में भारतीय राजसत्ता का नरमपंथी चरित्र सदैव आड़े आता रहा है। 1984 में इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी केंद्र में सत्तासीन हुए और तत्कालीन विदेश सचिव वैंकटेश्वरन की बुद्धिमत्तापूर्ण कूटनीतिक सलाह को ठुकरा कर 1987 श्रीलंका में सैन्य दखंलदाजी दी। सैन्य दखंलदाजी का प्रबल विरोध करने पर समस्त कूटनीतिक परम्परा को दरकिनार करते हुए तत्कालीन विदेश सचिव वैंकटेश्वरन को राजीव गांधी द्वारा विज्ञान भवन में खुले आम बर्खास्त किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारें भी वस्तुतः भारतीय राजसत्ता के नरमपंथी चाल चरित्र और चेहरे को कदाचित परिवर्तित नहीं कर सकी। वाजपेयी सरकार द्वारा पाक़ सरकार के प्रति मैत्रीपूर्ण उदार कूटनीति अपनाने के कारण राष्ट्र को 1999 में करगिल युद्ध झेलना पड़ा। 13 दिसंबर 2001 को भारतीय राजसत्ता के सर्वोच्च शिखर भारतीय संसद पर पाक़ द्वारा पोषित जेहादियों ने हमला किया। संसद की सुरक्षा में तैनात अनेक सुरक्षा कमांडों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी, किंतु वाजपेयी सरकार अपने नरम चरित्र के कारण पाक़ प्रायोजित इस आक्रमण का समुचित जवाब नहीं दे सकी। 26 नवबंर 2008 में मुंबई नगरी पर पाक़ आईएसआई द्वारा प्रायोजित नृशंस हमले का कोई जवाब मनमोहन सरकार ने पाक़ को नहीं दिया।

2014 के आम चुनाव के तत्पश्चात में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार अस्तित्व में आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रथम कार्यकाल में उरी में पाक़ द्वारा परिपोषित जेहादियों द्वारा एक भीषण हमला किया गया। इस आतंकवादी आक्रमण में भारत के 19 सैनिक शहीद हो गए. जिसमें 28 सितंबर 2016 को पाक़ अधिकृत कश्मीर की सरजमीन पर आईएसआई द्वारा संचालित जेहादी आतंकवादी शिवरों पर भारतीय सैन्य कमांडो टुकड़ी ने बेहद कामयाब सर्जिकल स्ट्राइक अंजाम दी। 14 फरवरी 2019 को फुलवामा में भारतीय सुरक्षा बल पर पाक़ पोषित जेहादियों ने हमला करके 40 से अधिक सुरक्षा सैनिकों को शहीद कर दिया। जेहादी आक्रमण के खिलाफ कार्यवाही करते हुए भारतीय वायुसेना ने पाक़ के बालाकोट में संचालित जेहादी शिवरों पर बमबारी की। मोदी सरकार ने पाक़ प्रायोजित जेहादी हमलों के जवाब में सैन्य कार्यवाही अंजाम देने की सैन्य रणनीति अख्तियार की है और भारतीय राजसत्ता के नरमपंथी आचरण को परिवर्तित करने का कुछ प्रयास किया है, किंतु कश्मीर में विगत 32 वर्षों से पाक़ हुकूमत द्वारा संचालित प्रॉक्सीवार का निर्णायक तौर पर खात्मा करने की रणनीति का सृजन किया जाना चाहिए और यह तभी मुमकिन है कि जब भारतीय राजसत्ता के पराम्परागत नरमपंथी चाल चरित्र चेहरे को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया जाए।

( लेखक विदेश नीति के जानकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं। )

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