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विकेश कुमार बड़ोला का लेख : धरा के कण-कण में विराजते श्रीराम

पांच अगस्त को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर की नींव में चांदी की ईंटें अपने हाथों से रखीं। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी भारतवर्ष के सर्वाधिक भाग्यशाली राजनेता बन गए, जिन्हें श्रीराम के मंदिर निर्माण से पूर्व उसका शिलान्यास रखने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर के लिए संपूर्ण अयोध्या नगरी का भव्य श्रृंगार किया गया।

विकेश कुमार बड़ोला का लेख : धरा के कण-कण में विराजते श्रीराम
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राम मंदिर भूमिपूजन

विकेश कुमार बड़ोला

जब भारतीय संस्कृति के संवाहकों में श्रीराम मंदिर के शिलान्यास के लिए इतना उत्साह है तो कल्पना की जा सकती है कि मंदिर निर्माण पूर्ण होने के उपरान्त वैश्विक जनमानस कितना आनंद अनुभव करेगा। भारत में विगत नौ-दस शताब्दियों से सरयू नटी के तट पर बसी अयोध्या में श्रीराम मंदिर को अनेक परराष्ट्रीय आक्रांताओं ने अपनी-अपनी साम्राज्य विस्तार लिप्सा के अनुरूप ध्वस्त किया और मुसलिम साम्राज्य काल में जन्मभूमि स्थल को पूरी तरह विखण्डित कर उस पर दूसरा ढांचा खड़ा कर दिया गया। अंग्रेजों के शासनकाल में श्री रामजन्मभूमि स्थल पर हिन्दुओं और मुसलिमों के अलग-अलग अधिकार दावों के उभरने के कारण स्वतंत्र भारत मंे भी विवाद बना रहा। 9 नवंबर 2019 को न्यायपालिका ने विवाद का अंत करते हुए विवादित स्थल को श्रीराम के जन्म का स्थान घोषित किया और आदेश दिया कि उक्त स्थल पर बहुप्रतीक्षित श्रीराम मंदिर का निर्माण शीघ्र आरंभ करे।

पांच अगस्त को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर की नींव में चांदी की ईंटें अपने हाथों से रखीं। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी भारतवर्ष के सर्वाधिक भाग्यशाली राजनेता बन गए, जिन्हें श्रीराम के मंदिर निर्माण से पूर्व उसका शिलान्यास रखने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर के लिए संपूर्ण अयोध्या नगरी का भव्य श्रृंगार किया गया। अयोध्या के घर-घर को रामायण कथा से संबंधित चित्रों से संवारा गया। उत्तर प्रदेश शासन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंदिर के निर्माण के संबंध में समस्त व्यवस्थाएं कीं। योगी जी स्वयं तपस्वी हैं। उन्होंने मंदिर संस्थापना से पूर्व इसके भूमि पूजन के लिए अयोध्या का उस प्रकार कायाकल्प किया जिस प्रकार इस आधुनिक युग में किसी मुख्यमंत्री के लिए संभव हो सकता था। श्रीराम के प्रति एकत्र इस अप्रतिम लौकिक श्रद्धा का अनुसरण पूरे भारतवासियों ने भी किया और अपने-अपने घरों पर श्रीराम के नाम के दीए जलाए। भारत ही नहीं बल्कि विदेशों और यहां तक कि अमेरिका में भी श्रीराम मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम के हर्षातिरेक में उत्सव जैसा वातावरण था।

श्रीराम मंदिर निर्माण की दिशा में संपन्न शिलान्यास का प्रथम चरण निश्चित रूप में अधिसंख्य भारतीयों के लिए गहन गौरव की अनुभूति है। कोरोना से त्रस्त विश्व और भारत में श्रीराम और उनके जीवन से संबंधित आदर्शों के अनुसरण से लोगों में स्वास्थ्य संबंधी शक्तियों का संचार अवश्य होगा। इसका प्रमाण हैं वे हजारों साधु-संत जो श्रीराम के आदर्शों की कुंजी का अनुशीलन करते हुए जीवन की कठिन से भी अधिक कठिन चुनौतियों को सुगम ज्ञात विधियों के माध्यम से पराजित करते हुए आए हैं। आज जब श्रीराम का मंदिर बनाने के लिए लोकतांत्रिक विधि के माध्यम से आरंभिक चरण का कार्य पूर्ण हो गया है और भावी निर्माण चरण भी निर्विघ्न पूरे होंगे तो हर्ष में लोग यह कदापि नहीं भूलें कि मंदिर संस्थापना के लिए हमारे हजारों साधु-संतों का योगदान, बलिदान और श्रमदान सर्वोपरि है। उनके इस उपकारी ऋण से भारतवासी कभी भी उऋण नहीं हो सकते। मंदिर निर्माण की आधारशिला रखे जाने के उपरान्त जनता को उन नेताओं और कारसेवकों के योगदान को भी सदैव याद रखना होगा, जिन्होंने तत्कालीन अभाजपायी केंद्र और राज्य शासकों के अत्याचार के उपरान्त भी श्रीराम जन्मस्थान के लिए हिन्दुओं के अधिकार की मांग को शक्तिहीन नहीं होने दिया।

त्रेता युग में घटित राम लीला के संबंध में कालांतर से विद्वतजनों के जितने भी आत्मिक उद्बोधन निकले, उनसे श्रीराम और रामकथा अनंद सिद्ध हो गई। पता नहीं त्रेता युग से कितने साधु, संत, महात्मा, तपस्वी, ऋषि, मुनि, रामकथा वाचक तथा विद्वान हुए हैं जिन्होंने अपनी-अपनी योग्यतानुसार रामकथा का मधुर, सरस व जीवंत वर्णन किया। रामायण की कथा है ही इतनी अद्भुत कि इसे जितनी बार सुनो-देखो, यह उतनी बार मनुष्य को मानवीयता की श्रेष्ठ शिक्षा से परिपूर्ण करती है। आज ही नहीं, बल्कि युगों-युगों से श्रीराम का जीवन-महात्म्य मनुष्यों को व्यक्तिगत और सामाजिक रूप में प्रतिक्षण जीवन से संबंधित सकारात्मक और उपयोगी शिक्षाओं से अभिसिंचित करता रहा है। स्वयं श्रीराम और उनकी जीवन कथा से संबंधित आदर्श शिक्षा इतनी गुणात्मक है कि युगों-युगों से होते आए इनके बखान के लिए पृथ्वी सहित अन्य लोकों के जैविक-अजैविक अलंकरण कम पड़ गए। राम शब्द अपनी महिमा के प्रताप से ब्रह्माण्ड के कण-कण में समाया हुआ है। राम शब्द का व्यवहार मानव रूप में अवतरित विष्णु द्वारा इस प्रकार हुआ कि यह जीवन के प्रत्येक सद्गुण और उपयोगी कार्य का चिरपर्याय बन गया। जीवन के दुर्गुणों के शमन के लिए भी राम शब्द सर्वाधिक अचूक विधि बन गया।

श्रीराम का जानकी, पिता दशरथ, भातृगण, कुटुंबीजन, बंधु-बांधव, अयोध्यावासी, रघुकुल, कुलगुरु वशिष्ठ, गुरु विश्वमित्र और वनवास अवधि में अनेक ऋषियों के साथ मनुष्य जीवन और इसको प्रभावित करने वाले लौकिक-पारलौकिक कारकों के संबंध में जो भी संवाद संपन्न हुआ, वह आध्यात्मिक ज्ञान का मूल है। इस संवाद को जितनी बार आत्मसात किया जाए, यह उतनी बार नई-नई शिक्षा प्रदान करता है और जीवन जीने के सर्वोत्तम ढंग सिखाता है। श्रीराम त्रेता युग से लेकर इस कलयुग तक मनुष्यों को आत्मिक-आध्यात्मिक रूप में शक्तिशाली बना रहे हैं। क्षणभंगुर काया के साथ मृत्युलोक अर्थात पृथ्वी पर विचरण करने वाले मनुष्यों को बैकुंठलोक में चिरस्थान प्राप्त करने की मानवीयता योग्यता श्रीराम ही प्रदान करते हैं। श्रीराम ईश्वर और मनुष्य दोनों के अनुसार जीवन-बोध की शिक्षा देते हैं। अतः उनके द्वारा वर्णित प्रत्येक ज्ञान संदेश पर ध्यान लगाने से निश्चित रूप में मनुष्य का उद्धार होगा। स्वयं श्रीराम ने भी तो सब कुछ जानते-समझते हुए आजीवन विनम्रतापूर्वक शांत-प्रशांत निशब्द रहते हुए वरिष्ठों, गुरुओं, साधु-संतों और तपस्वियों के ज्ञान को आत्मसात किया। इसीलिए वे मर्यादा के उत्तम पुरुष भी सिद्ध हुए। अतः अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण पूर्ण हो जाने के उपरान्त इस युग में भी भारतीय लोगों के मध्य श्रीराम की शिक्षा, व्यवहार, आचरण, विनम्रता और मर्यादा का प्रसार होने लगेगा तो निश्चित रूप में रामराज्य साकार हो उठेगा तथा भारत स्वयंमेव विश्व गुरु की भूमिका में अवतरित हो जाएगा। ऐसा होगा तो राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के अंदर से बुराइयां मिट जाएंगी और मानवीय जीवन ईश्वरीय विधि व्यवस्था के अनुरूप सार्थक सिद्ध हो सकेगा।

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