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लघुकथा : गहरा विश्वास

इतने विश्वास और गहरे रिश्ते के बावजूद हम पर बार बार ये खतरे क्यों मंडराने लगते हैं?

लघुकथा : गहरा विश्वास

डॉ. कमल चोपड़ा-

अपने घर की तरफ वह मुड़ा ही था कि सामने से आते हुए हफीज भाई से भेंट हो गई। दुआ सलाम के बाद हफीज भाई ने कहा, भाई हरिराम! मैं तुम्हारे घर से चला आ रहा हूं। तुम्हें पता ही होगा कि शहर में कई जगह दंगे हो रहे हैं और किसी भी वक्त यहां भी दंगा हो सकता है। इसलिए मैं अपनी बेटी अमीना को तुम्हारे घर छोड़ आया हूं। वैसे तो यह मुसलमानों का मुहल्ला है पर मेरा घर मेन रोड पर सबसे पहले पड़ता है। बाहर से हमला हुआ तो सबसे पहले मेरे ही घर पर होगा। तुम्हारा घर अंदर है और महफूज है इसलिए..।

क्या हुआ? तुम्हारी आंखों में आंसू? हफीज भाई, मैं भी तुम्हारे ही घर से लौट रहा हूं। दरअसल, मैं भी अपनी बेटी सरला को तुम्हारे घर यह सोचकर छोड़ आया हूं कि इस मुहल्ले में हमारे धर्म के लोगों के तो बस दो-चार घर ही हैं। मेरी बेटी मेरे घर से भी ज्यादा तुम्हारे घर में सुरक्षित रहेगी।
हमारी इज्जत सांझी है, सुख-दुख सांझे हैं, फिर भी..? मेरे होते तुम चिंता मत करना। तुम्हारी बेटी, मेरी बेटी। एक दूसरे के गले लग गए थे वे दोनों। विवशता और गहरा प्यार दोनों की आंखों से पानी बनकर बह निकला था। इतने विश्वास और गहरे रिश्ते के बावजूद हम पर बार बार ये खतरे क्यों मंडराने लगते हैं?
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