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लघुकथा : भाई

मगर खोखले रिश्तों का अनर्गल प्रलाप सुन बेवजह की कड़वाहट से उसका मन अत्यंत आहत हुआ।

लघुकथा  : भाई
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वह बड़े जेठ के घर गई थी, मिलते रहना चाहिए यही सोचकर। मगर खोखले रिश्तों का अनर्गल प्रलाप सुन बेवजह की कड़वाहट से उसका मन अत्यंत आहत हुआ। वह रुआंसी हो उठकर चली आई। हालांकि सामान्य रहना चाहती थी मगर जिन रिश्तों को बरसों अपने त्याग और संयम से सींचती रही उन्हें दरकते देख ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं था।
समय था उसके पास, इसलिए मां से मिलने पहुंच गई। घर पहुंची तो मां बाऊजी ने उसे हाथों हाथ लिया। उसके बच्चों की उम्र का छोटा भाई वरुण दौड़ कर पानी लाया। उनके बीच आकर वह कुछ पल के लिए मन का दर्द भूल गई। फिर भी शायद उसके स्वर में थोड़ी बहुत वेदना शेष थी। मैं चाय बनाकर लाता हूं, कहता हुआ वरुण रसोई में घुस गया। चाय बनने के लिए रखने वाली आवश्यक खटपट की आवाजें रसोई से आनी बंद हुईं तो वरुण ने उसे पुकारा दीदी चीनी कितनी डालूं?
तुम्हें पता तो है एक चम्मच। नहीं, नहीं, यहां आकर बताओ। वह अनमनी सी उठकर चली गई, क्या बात है? पहले आप बताओ क्या बात हुई है, जो आप इतनी उदास हैं?वह चुप रही तो वरुण पुन: बोला जरूर आप उधर गई होंगी? दी! क्यूं और किसलिए? जिन्हें रिश्तों की गहराई का अहसास नहीं वे लोग कभी दिल से नहीं जुड़ सकते।
आप व्यथित न हों हम सब हैं न आपके पास। कहते हुए छोटे भाई ने बड़ा बनकर उसे बच्चों की तरह अपने से ऐसे सटा लिया जैसे वह नन्हीं सी बच्ची हो। बहन भाई का रिश्ता भी कितना अनूठा होता है जो बात मां बाऊजी भी नहीं समझ सके उसे इस बुद्घू भाई ने भांप लिया। यह सोचते ही उसके मन का सारा अवसाद धुल चुका था।
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