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लघुकथा : स्मृति चिन्ह

वह शो-पीस की वैरायटी के लिए मशहूर है।

लघुकथा : स्मृति चिन्ह
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शहर के बड़े बाजार में मेरे दोस्त की दुकान है। वह शो-पीस की वैरायटी के लिए मशहूर है। कहीं कोई कार्यक्रम हो तो सब उसकी दुकान का रुख करते हैं। फुरसत के पलों में मैं अपने दोस्त की दुकान पर जा बैठता हूं। ऐसे ही बैठे हम दोनों गप्पें हांक रहे थे कि एक सरकारी गाड़ी दुकान के सामने आकर रुकी।
एक भद्र महिला उतरी और उसके पीछे-पीछे ड्राइवर बहुत सारे स्मृति चिन्ह उठाए आ खड़ा हुआ। काउंटर पर रखवाने के बाद उसे भद्र महिला ने वापस गाड़ी के पास जाने का आदेश दिया। इसके बाद वह महिला बड़े रौब से मेरे दोस्त को कहने लगी कि इनके पैसे लगाओ और मुझे दे दो।
वह बेचारा कहता रहा कि ये स्मृति चिन्ह उसके किसी काम नहीं आएंगे, लेकिन वह अड़ी रही और कहती रही कि हम इन स्मृति चिन्हों का क्या करें? वह पैसे लेकर ही गई। कौन थी यह भद्र महिला? मैंने उसके जाते ही पूछा। एक उच्चाधिकारी की पत्नी। मैं हैरान रह गया कि क्या कार्यक्रमों में बड़े प्यार से दिए जाने वाले महंगे स्मृति चिन्हों का यही उपयोग होता है? यह सदैव मेरी स्मृति में जुड़ गया।
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