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लघुकथा : भूकंप

अभी वह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा ही था कि सहसा बदहवास सी पत्नी कमरे में आई, जल्दी बाहर निकलिए। बिलकुल भी अहसास नहीं हो रहा क्या, भूकंप आ रहा। चलिए तुरंत।

लघुकथा : भूकंप
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प्रियंका गुप्ता-
अभी वह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा ही था कि सहसा बदहवास सी पत्नी कमरे में आई, जल्दी बाहर निकलिए। बिलकुल भी अहसास नहीं हो रहा क्या, भूकंप आ रहा। चलिए तुरंत।
वो उसकी बांह पकड़ कर लगभग खींचती हुई उसे घर से बाहर ले गई।पत्नी को यूं रुआंसा देख कर जाने क्यों ऐसी मुसीबत की घड़ी में भी उसे हंसी आ गई। बाहर लगभग सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था।
एक अफरा-तफरी का माहौल था। कई लोग घबराए नजर आ रहे थे। कुछ छोटे बच्चे तो बिना कुछ समझे ही रोने लगे थे।
सहसा उसे बाऊजी की याद आई। वो तो चल नहीं सकते खुद से, और इस हड़बड़-तड़बड़ में वह उनको तो बिलकुल ही भूल गया।
वो जैसे ही अंदर जाने लगा कि तभी उसके पांव मानो जमीन से चिपक गए। बाऊजी की जिंदगी की अहमियत अब रह ही कितनी गई है। वैसे में भी दोनों उनकी सेवा करते करते थक गए हैं। ऐसे में अगर भूकंप में वो खुद ही भगवान को प्यारे हो जाएं तो उस पर कोई इलजाम भी नहीं आएगा।
अभी कुछ पल ही बीते थे कि सहसा पत्नी की चीख से वो कांप उठा। उनका दुधमुंहा बच्चा अपने पालने में ही रह गया था।
अंदर की ओर भागते उसके कदम वहीं थम गए। वह गिरते-गिरते बच गया था। एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता की गोद में उसका लाल था। जाने भूकंप का दूसरा तेज झटका था या कुछ और, पर वह गिरते-गिरते बच गया था।

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