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लघुकथा : संवेदना

प्रतिदिन प्रवचन के आगे-पीछे फिल्मी गानों की तर्ज पर भजनों का कैसेट बजता रहता,

लघुकथा : संवेदना
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मंगला रामचंद्रन-
पिताजी कराहते हुए बड़ी कठिलाइयों के साथ जो बोल पाए, उसका तात्पर्य था, ‘बेटा जरा बाहर से आ रही आवाज कम करवा दो।’
घर से फलांग-भर दूर मैदान में धार्मिक आयोजन चल रहा था। प्रतिदिन प्रवचन के आगे-पीछे फिल्मी गानों की तर्ज पर भजनों का कैसेट बजता रहता, जिसे लाउडस्पीकर पूरे इलाके में पहुंचा रहे थे।
प्री-बोर्ड और अन्य परीक्षओं की तेयारियां करने वाले छात्रों के पास सिवाय कुढ़ने के और कोई चारा नहीं था।बिस्तर पर पडे बीमार, कृशकय पिता की पीड़ा मुझसे देखी नहीं गई। मैं आयोजन-स्थल पर पहुंचा और संकोच के भार से दबा हुआ दीन-हीन शब्दों में अपनी परेशानी बताई।
‘भाई साहब, लगता है आप आस्तिक नहीं हैं, वरना इन भजनों पर लोग-झूम-झूमकर गाते नहीं थकते हैं।’ आठ-दस के झुंड में खडे एक व्यक्ति ने कहा।‘वह सब ठीक है, पर अभी मेरे पिताजी जिस शारीरिक और मानसिक अवस्था में हैं, उसमें उन्हें शांत वातावरण में रहना आवश्यक है अन्यथा मैं आपके पास आकर यह नहीं कहता।’ मैं डर-डरकर बोल रहा था।
‘उम्र के इस छोर पर आकर भी उन्हें आस्तिकता शोर लग रही है तो उनके कानों में रूई ठूंस दो या कहीं दूर ले जाकर रखो।’
उनका रूखा आदेशात्मक लहजा था।उनके वे शब्द कानों में गोली की तरह लगे। घर आकर अपने कानों में रूई के फाहे रख उन शब्दों को दफन किया। फिर दर्द से परेशान पिता के दोनो कानों में रूई के फाहे लगा दिए।
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