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महेश राजा की दो लघुकथाएं

ईमानदारी का अफसोस, जरूरत

महेश राजा की दो लघुकथाएं
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1. ईमानदारी का अफसोस

वे बहुत ही शरीफ और नेकदिल इंसान थे। उनकी ईमानदारी की बड़ी चर्चा थी। उनकी मिसालें दी जातीं। एक दिन उनके घर जाना हुआ।बातचीत के दौरान मैंने उनकी तारीफ की तो उन्होंने एक उसांस ली। बोले, ‘यार, कई बार तो लगता है ईमानदारी जी का जंजाल बन कर रह गई है। सब खोखलापन ही तो है। सामने भले ही तारीफ करते रहें पीठ पीछे सब कहते हैं, कैसा मूर्ख है। हाथ आई लक्ष्मी को ठुकराता है। आज के युग में भी बड़ा ईमानदार बना फिरता हैं।’
थोड़ा ठहरकर वह फिर बोले, ‘साथ के सब ऊंची बिल्डिंग वाले हो गए हैं। और यहां छत ठीक करवाने के पैसे नहीं हैं। पिछले माह ही हजार रुपए देकर छत ठीक करवाई थी, अब फिर टपक रही है। शायद वह भी मेरी ईमानदारी का मजाक उड़ा रही है। अब तो लगता है, मैं ही कहीं गलत तरीके से तो अब तक जीता नहीं रहा। पड़ोसी के यहां एलसीडी टीवी देख कर छोटा बच्चा भी जिद कर रहा था। वाइफ बार-बार एक वॉशिंग मशीन न लेने के लिए ताने देती रहती है।
मेरी भी इच्छा होती है कि लेंटर वाला अच्छा सा मकान हो, कार न सही तो ठीक-ठाक स्कूटर ही हो। साइकिल पर निकलता हूं तो साथ के सब हंसी उड़ाते हैं। अब अफसोस होता हैं कि मैं लिखी गई किसी पुराने जमाने की आदर्श कहानी जैसी लगता हूं, जो आज के युग में अनफिट है।’
उनसे विदा लेकर मैं लौट आया। न जाने क्यों मुझे उन पर दया आई। साथ ही इस बात की खुशी भी हुई कि आज के युग की दशा के कारण भले ही उनके दिल में अपनी ईमानदारी को लेकर अफसोस आया हो, पर वे अपनी राह छोड़ नहीं पाएंगे और ऐसे व्यक्तियों के दम पर ही शायद जमाना टिका हुआ है।

2. जरूरत
आज नगर पालिका के चुनाव का दिन था। वोटिंग क्षेत्र पर वोट देने पहुंचा तो देखा, खूब भीड़ भाड़ थी। वार्ड नंबर बीस से जो जो प्रत्याशी खड़े थे, वहां जो भी मतदाता आते, उनसे हाथ जोड़ कर उन्हें वोट देने के लिए कहते। मतदाता मुस्कुराते हुए अंदर चले जाते।
वह एक ओर खड़े सोच रहे थे कि ये लोग कितने स्वार्थी होते हैं। वोट के लिए दस दस बार घर आकर हाथ पैर जोड़ते हैं और जब जीत जाते हैं तो फिर मुड़ कर उस गली की तरफ भी नहीं देखते।तभी उनका नंबर आ गया और वे अंदर चले गए। एक मित्र मिल गए। बाहर आकर सामान्य बातों के दौरान उनसे पूछा, ‘किसे जीता रहे हैं। किसे वोट दिया?’
वे बोले, ‘मैं उसे वोट देकर आ रहा हूं, जिसे सचमुच इसकी जरूरत थी। बाकी तो सब ठीक हैं। उस बेचारे ने कितनी हिम्मत से बगैर किसी पार्टी फंड या धन्ना सेठों से रुपए जुटाकर चुनाव में खड़े होने के लिए स्वयं को तैयार किया होगा। बेचारा निर्दलीय है, सबसे कम बुराइयां उसमें ही नजर आर्इं मुझे। अब जीतने के बाद वह भी औरों जैसा हो जाएगा या नहीं, यह तो वही जाने।’
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