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लघुकथा : समय का फेर

आज जहां यह आलीशान होटल बना है, वह जमीन दस बरस पहले तक उन्हीं के पुरखों की निशानी थी।

लघुकथा : समय का फेर
सुरजीत सिंह
उसने फाइव स्टार होटल के सामने खड़े होकर उस पर दृष्टिपात किया। उसकी आंखों के सामने अतीत के दृश्य तैर गए। आज जहां यह आलीशान होटल बना है, वह जमीन दस बरस पहले तक उन्हीं के पुरखों की निशानी थी।
जब मेट्रो शहर का विस्तार होने लगा और आस-पास की खेती की जमीनों के अच्छे दाम मिलने लगे तो किसान धड़ाधड़ जमीनें बेच रातों-रात माला-माल होने लगे। जिन्होंने पुरखों की निशानी समझ जमीन को बेचना गवारा नहीं किया, वह भी धन के दबाव से ज्यादा देर तक अविचलित नहीं रह सका।
भू माफियाओं ने प्रलोभन के जाल में फांस उन्हें भी जमीन बेचने पर मजबूर कर दिया। बेशुमार धन आया। महंगी गाड़ियां आर्इं। आलीशान कोठियां खड़ी कीं। ऐशो-आराम में पैसे उड़ने लगे। भौतिक सुख-सुविधाओं में आकंठ डूब गया। उद्देश्यहीन जिंदगी और अंधा-धुंध खर्च से पैसा कब तक बचा रहता।
ऐसे तो कुबेर का खजाना भी रीत जाए। ...और ज्यादा दिन नहीं गुजरे, जब एक दिन वह सड़क पर आ गया। नियति का फेर देखिए, आज इस होटल में गार्ड की वैकेंसी निकली थी और वह इसके लिए इंटरव्यू देने आया था।
ऊंह...उसने दीर्घ नि:श्वास छोड़ते हुए गर्दन झटकी और चेहरे पर एक अफसोस, हाथ में फाइल लिए भरी मन से वह दरवाजे के भीतर दाखिल हो गया।
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