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लघुकथा : पत्थरदिल पिता

आंखों में आंसू तो तब भी नजर नहीं आए जब पिता का देहांत हुआ था

लघुकथा : पत्थरदिल पिता
ब्रह्मवीर सिंह
विराट सक्सेना, नाम के अनुरूप ही काया के मालिक थे। साढ़े छह फीट की हाइट। घनी लंबी मूंछें। पुराने महाभारत के भीम जैसी काया। सख्त इतने कि कभी-कभार ही मुस्कुराते। आंखों में आंसू तो तब भी नजर नहीं आए जब पिता का देहांत हुआ था। सपाट भाव से उन्होंने मुखाग्नि दी थी।
उनकी एक ही बेटी थी शारदा। विराट उसे बेहद प्यार करते थे। लोगों की दिलचस्पी थी कि विराट उसकी विदाई के वक्त रोएंगे या नहीं। शारदा के विवाह की घड़ी आ पहुंची। शंका थी सो डरते हुए विराट की पत्नी वृंदा ने पूछा, ‘सुनिए, शारदा की विदाई के वक्त आप रहेंगे ना?’ विराट बाघ जैसी आवाज में गुराए, ‘पागल हो क्या? इतने सारे काम हैं। पूरा मोहल्ला है। मैं क्या करूंगा?’
पत्थरदिल पिता को देख वृंदा के आंसू निकल गए। पुत्री राह तकती रही। पिता नजर नहीं आए। पूरा मोहल्ला रोया। शारदा के भाई रोए, सारे रिश्तेदारों की आंखें गीली हुर्इं। विराट कहीं नहीं दिखे। गुस्से से भरी वृंदा ने गहरी सांस ली और विराट को खोजने लगी।
विराट नजर नहीं आए। वह ऊपर वाले कमरे में पहुंची। दरवाजा बंद था। दरवाजा खोला। विराट का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। वह फफक-फफककर रो रहे थे।
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