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प्रमोद भार्गव का लेख : आस्था से विज्ञान तक शिव

शिव को विदेशी वैज्ञानिकों ने भी ब्रह्मांड में जीवन का आधार माना है। जीवन के अस्तित्व से लेकर अंत तक सब में शिव की अवधारणा समाई हुई है, इसीलिए स्विट्जरलैंड में स्थित भौतिकी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला लैब सर्न में नटराज की मूर्ति लगी हुई है। जो आस्था में विज्ञान की द्योतक है। इस मूर्ति के नीचे लिखी इबारत में वैज्ञानिक फ्रिटजॉफ कैप्रा ने कहा है कि नृत्य करती यह मूर्ति हमारे समय में भौतिक शास्त्र की आधुनिक तकनीक के रूप में ब्रह्मांडीय नृत्य (कॉस्मिक डांस) को रेखांकित करती है।

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प्रमोद भार्गव

संपूर्ण संस्कृत वांग्मय में शिव साधु रूप में हैं। माया मोह से लगभग निर्लिप्त हैं। शिव अपने शरीर पर जो वस्तुएं धारण किए हैं, उनमें भी वैभव के प्रतीक नहीं झलकते। उनके शरीर पर राख मली हुई है। जटा-जूट धारी हैं। कई सर्प उनके गले और हाथों में गहनों की तरह शोभायमान हैं। बर्फ की सघनता से आच्छादित हिमालय में उनकी आश्रयस्थली है। साधनालीन शिव की आंखें सदैव बंद रहती हैं। हालांकि वे त्रिनेत्रधारी हैं, लेकिन उनका तीसरा नेत्र अपवादस्वरूप आपातस्थिति में ही खुलता है। इस समय शिव रौद्र, यानी गुस्से में होते हैं और कभी-कभी तांडव नृत्य भी करते हैं। इस नृत्य का शाब्दिक अर्थ देवता का नृत्य या नृत्य करते देवता है। इस नृत्य का चित्राकंन विश्व प्रसिद्ध नटराज की मूर्ति में किया गया है। ऐसी मान्यता है कि शिव ने यह नृत्य केरल के चिदंबरम नामक स्थान पर किया था। प्राचीन भौगोलिक धारणा के अनुसार इस स्थल को विश्व का केंद्र माना जाता है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि हमारे जिज्ञासु ऋषि-मुनियों को दुनिया का केंद्र जानने की इच्छा थी।

नटराज की प्रतिमा में शिव की महिमा प्रदर्शित है। नटराज की मूर्ति के वृत्ताकार घेरे में चारों तरफ अलंकृत अग्नि व मछली जैसे चिह्न प्रस्तुत हैं। ये चिह्न पृथ्वी पर जीवन और विनाश को प्रदर्शित करने के प्रतीक हैं। नटराज के ऊपर अर्द्धचंद्र व जटाओं में गंगा ब्रह्मांड व पृथ्वी की सृजन की कथा बयान करते हैं। नटराज के दाहिने हाथ में डमरू व अभय मुद्रा प्रदर्शित है। यह विश्व में घटित होने वाले घटनाचक्रों का प्रतीक है। बाईं भुजा में आधृत अग्नि शिव के रौद्र रूप को दर्शाती है। साथ ही यह अग्नि के महत्व को भी चिह्िनत करती है। आमतौर पर नटराज की मूर्ति को एक बालक पर खड़े होकर नृत्य करते दिखाया गया है। बालक के रूप में यह अपस्मरा नामक दानव का वध है। शिव की खुली जटाएं, नेत्रों में झलकता आवेग, बालक पर सधे हुए एक पैर से खड़े होकर संतुलित नृत्य का संयोजन और स्थिर मुद्रा भाव, वैसे तो शिव का तांडव नृत्य है, लेकिन जब इसी मुद्रा को मूर्त रूप दिया जाता है तो यही शिव कहलाते हैं, नटराज पत्थर पर उत्कीर्ण नटराज की ये कलाकृतियां अजंता व एलोरा की गुफाओं में भी देखने को मिलती हैं।

यही नहीं शिव को विदेशी वैज्ञानिकों ने भी ब्रह्मांड में जीवन का आधार माना है। जीवन के अस्तित्व से लेकर अंत तक सब में शिव की अवधारणा समाई हुई है, इसीलिए स्विटजरलैंड में स्थित भौतिकी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला लैब सर्न में नटराज की मूर्ति लगी हुई है। जो आस्था में विज्ञान की द्योतक है। इस मूर्ति के नीचे लिखी इबारत में वैज्ञानिक फ्रिटजॉफ कैप्रा ने कहा है कि नृत्य करती यह मूर्ति हमारे समय में भौतिक शास्त्र की आधुनिक तकनीक के रूप में ब्रह्मांडीय नृत्य (कॉस्मिक ड्रांस) को रेखांकित करती है। कैप्रा मानते हैं कि शिव हमें स्मरण दिलाते हैं कि दुनिया में कुछ भी मौलिक या स्थाई नहीं है। सब कुछ भ्रामक और निरंतर परिवर्तशील है। आधुनिक भौतिकी भी कहती है कि सभी सजीव प्राणियों में आरंभ और अंत तथा जन्म एवं मृत्यु की प्रक्रिया निरंतर है। यह सि़द्धांत अकार्बनिक पदार्थों पर भी लागू होता है। ऊर्जा के सभी कण भी नृत्य की अवस्था में रहते है। हलचल भरे यही कण निर्माण और संहार की स्थितियों को संचालित करते है। इसीलिए शिव को संहार का देवता भी माना जाता है।

शिव के नटराज रूप के सिलसिले में स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, ऋृषि जब यज्ञ कर रहे थे, तभी निर्वस्त्र शिव गुजरे। ऋषि पत्नियां इस रूप को देखकर विचलित हो गई और वे शिव के पीछे भाग खड़ी हुई। फलतः ऋषि क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत यज्ञ व योग के बल से एक बार एक नाग और एक दानव को शिव को नियंत्रित करने के लिए लगा दिया। शिव ने वाक्य को पकड़कर मारा और उसकी खाल उतारकर स्वयं ओढ़ ली। यह प्राकृतिक अवस्था से सभ्यता की ओर बढ़ने का कदम था। नाग को शिव ने गले में डालकर प्रकृति के संंरक्षण का संदेश दिया। अंत में वे दानव को परास्त कर उसकी पीठ पर सवार हो नृत्य करने लगे। यह नृत्य शिव द्वारा अहंकार को त्याग कर सरल जीवन जीने का संदेश है। इसे ही शिव के नटराज रूप में तांडव नृत्य कहा गया। यह ऋषियों की तपस्या से एक भिन्न मार्ग को दर्शाता है।

पुराणों में शिव की कल्पना एक ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के रूप में की गई है, जिसका आधा शरीर स्त्री तथा आधा शरीर पुरुष का है। शिव का यह स्त्री व पुरुष मिश्रित शरीर अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण के अनुसार शिव को इस रूप-विधान में परम पुरुष ब्रह्मात्मक मानकर, ब्रह्म से भिन्न उसकी शक्ति माया को स्त्री के आधे रूप में चित्रित किया गया है। शिव का रूप अग्नि एवं सोम अर्थात सूर्य एवं चंद्रमा के सम्मिलन का भी रूप है। यानी पुरुष का अर्धांश सूर्य और स्त्री का अर्धांश चंद्रमा के प्रतीक हैं। यह भी पुराण सम्मत मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिव और शक्तिरूपा पर्वती हुए थे। कथा में यह भी है कि इसी दिन शिव अत्यंत क्रोधित हुए और संपूर्ण ब्रह्मांड के विनाश के लिए विश्व प्रसिद्ध तांडव नृत्य करने लगे। शिव स्वयं यह मानते हैं कि स्त्री-पुरूष समेत प्रत्येक प्राणी की ब्रह्मांड में स्वतंत्र सत्ता स्थापित है। इसे ही वैयक्तिक रूप में ब्रह्मात्मक या आत्मपरक माना गया है।

अर्द्धनारीश्वर के संदर्भ में जो प्रमुख कथा प्रचलन में है, वह है, जब ब्रह्मा ने सृष्टि के विधान को आगे बढ़ाने की बात सोची और इसे साकार करना चाहा, तो उन्हें इसे, अकेले पुरुष रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं लगा। तब उन्होंने शिव को बुलाकर अपना मंतव्य प्रकट किया। शिव ने ब्रह्मा के मूल भाव को समझते हुए उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिए। अर्थात स्त्री और पुरुष के सम्मिलन या सहवास से सृष्टि के विकास की परिकल्पना दी। इस सूत्र के हाथ लगने के बाद ही ब्रह्मा सृष्टि के क्रम को निरंतर गतिशील बनाए रखने का विधान रच पाए।

अर्द्धनारीश्वर यानी आधे-आधे रूपों में स्त्री और पुरुष की देहों का परस्पर आत्मसात हो जाना। शिव-गौरी का यह महा-सम्मिलन है,जो सृष्टि के बीज को स्त्री की कोख, अर्थात प्रकृति की उर्वरा भूमि में रोपता है। सृष्टि का यह विकास क्रम अनवरत चलता रहे, इसीलिए सृष्टि के निर्माताओं ने इसमें आनंद की उत्तेजक सुखानुभूति भी जोड़ दी है। सृष्टि के इस आदिभूत मातृत्व व पितृत्व को पुराणों की प्रतीकात्मक भाषा में पार्वती-परमेश्वर या शिव-पार्वती कहा गया है, अर्थात शिव-शक्ति के साथ संयुक्त होकर अर्द्धनारीश्वर बन जाते हैं, इसलिए शिव से कहलाया गया है कि शक्ति यानी स्त्री को स्वीकार किए बिना पुरुष अपूर्ण है। अर्धनारीश्वर की तरह एकाकार हुए बिना हम अपने जीवन अर्थात काल को आनंद या सुख की अनंत अनुभूति के साथ जी ही नहीं सकते। मनुष्य जीवन में सुख अनंत काल तक बना रहे, इस हेतु स्त्री-पुरुष का एकालाप भी युगों में बने रहना जरूरी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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